बर्ड फ्लू और बीकानेर, खुली स्कूलें,सड़कों पर भीड़, मक्खन जोशी के बहाने

हरीश बी. शर्मा

बीकानेर से कोरोना की रुखसतगी का अभी तक पता भी नहीं चल पाया है कि बर्ड-फ्लू आ धमका। पंछी रोज मर रहे हैं, लेकिन क्यों मर रहे हैं। इस सवाल का जवाब भोपाल से आएगा। हैरत की बात है कि बीकानेर में प्रतिष्ठित पशु चिकित्सा एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय होने के बावजूद जांच के लिए पक्षियों के नमूने भोपाल भेजे जा रहे हैं। अगर इस तरह के विश्वविद्यालयों में ऐसी लैब तक नहीं है, जहां बर्ड फ्लू की जांच हो सके तो सरकार को यहां के संसाधन और विशेषज्ञों की फिर से समीक्षा करनी चाहिए।

हालांकि, कोरोना के मरीज भी रिपोर्ट हो रहे हैं, लेकिन अब दहशत नहीं रही है। शहर की सड़कें भरी रहने लगी है। जाम लगने लगा है। मास्क लगाए लोग भी सट-सटकर चलने के लिए मजबूर है। भीड़ बढ़ती जा रही है। स्कूलें खुलने लगी है। सरकार ने भले ही नौवीं से बारहवीं तक की स्कूलें खोलने की बात कही हो, लेकिन गुप-चुप पढ़ाई शुरू हो गई है। अभिभावकों और निजी स्कूलों की जुगलबंदी के आगे सरकार और प्रशासन करे भी तो क्या। लोग मिलने लगे हैं, पहली बतालवण ही यह होती है कि आप चपेट में आए क्या।

लेकिन यह सप्ताह बीकानेर में आपराधिक घटनाओं की दृष्टि से उल्लेखनीय रहा। भ्रष्टाचार और रिश्वत के मामले सामने आए। चोरियां-दर-चोरियां हुई। मुकाम, सुजानदेसर और कोटगेट पर मंदिरों में चोरियां हुईं। एटीएम, ज्वेलरी शॉप में भी चोरी की घटनाएं हुई। हालांकि सीसीटीवी की फुटेज मिलने से पुलिस का काम आसान हो गया है, लेकिन नई एसपी के आने के साथ ही इस तरह की आपराधिक घटनाएं कहीं अपराधियों की तरफ से चुनौती तो नहीं है कि एक कांस्टेबल को ट्रक वाला पांच सौ मीटर तक घसीट कर ले जाता है। छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और एक नवजात को झाडिय़ों में फेंकने की घटनाएं भी हुई है। दोनों ही घटनाएं समाज को शर्मसार करने वाली है, लेकिन क्या समाज को शर्म आएगी। छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना के बाद एक बार माहौल गर्माया। कहीं से फांसी देने की बात सामने आई तो किसी ने ऐसे अपराधी की पैरवी नहीं करने जैसी मांग भी उठाई और कहा कि वकीलों को पैरवी नहीं करनी चाहिए। भावुक होने तक यह सब रहा, फिर समाज अपनी-अपनी राह हो लिया। हालांकि, पुलिस ने तीन दिन में चालान पेश कर दिया।

इस बीच बीकानेर में ग्रामीण राज संस्थाओं के बाद अब पालिका चुनाव भी होने को है। देशनोक, श्रीडूंगरगढ़ और नोखा पालिका के चुनाव की चौसर में इस बार आरएलपी का दावा भी है तो नोखा से विकास मंच के तेवर भी कमजोर नहीं पड़े हैं। इधर, गोविंद मेघवाल को कांग्रेस संगठन में बड़ी भूमिका दी गई है। वे जयपुर संभाग में बतौर उपाध्यक्ष काम करेंगे। जाहिर है, राजधानी में रहेंगे। सरकार के आसपास रहेंगे। दूसरी ओर बीकानेर में कांग्रे्रस की नई टीम के बाद अब राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार शुरू हो गया है। इस बीच नगर निगम ने सक्रियता दिखाते हुए विकास कार्यों का शिलान्यास करवा दिया। केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और महापौर सुशीलाकंवर राजपुरोहित ने नवनिर्माण का शिलान्यास किया। सुगबुगाहट यह भी है कि एक जगह तो नगर विकास न्यास की है। काबीना मंत्री डॉ. बी. डी. कल्ला भी इस सप्ताह तूफानी दौरे पर रहे। कृषि विधेयक के विरोध पर बीकानेर में माहौल बनना शुरू ही हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद आंदोलन एकबारगी थम-सा गया है।

लोहड़ी फसलों का त्योहार है। वैसे इस देश में सारे त्योहार फसलों से ही जुड़े हैं। दीपावली और होली तो हैं ही। इस बार फसल उगाने वाला दिल्ली बॉर्डर पर बैठा था, उसकी लोहड़ी कैसी रही होगी, यह भी किसी को पूछना चाहिए। बीकानेर में यह त्योहार पंजाबियों से जुड़ा है। परंपरागत रूप से शगुन मनाए गए। मळमास भी पूरा हुआ।

जननेता मक्खन जोशी को याद करते हुए उनकी स्मृति में बने प्रन्यास ने गंगाजल और तुलसी बांटने के आयोजन की शुरूआत की। पूर्व में मक्खनजी की स्मृति में व्याख्यानमाला भी शुरू की गयी थी। बीकानेर की राजनीति में मक्खन जोशी ऐसे कद्दावर नेता थे, जिन्हें वह नहीं मिला जिसके वे पात्र थे। आने वाली पीढिय़ां मक्खन जोशी को याद रखें, इसके लिए ठोस प्रयास करने होंगे। वरना मक्खन जोशी ही क्यों जल्द ही गोकुलप्रसाद पुरोहित, महबूब अली, नंदलाल व्यास, भवानीशंकर शर्मा आदि को भी समाज भुला देगा। सोच कर देखें कि जिस शहर में हर सप्ताह फिल्मी हस्तियों का जन्मदिन और पुण्यतिथि गीत-संगीत के आयोजनों के साथ मनाई जाती है, उस शहर के नेताओं को कोई याद नहीं करता। धन्य है यह कृतघ्नता।
यहां सतत संघर्ष विफलता, कोलाहल का यहां राज है
अंधकार में दौड़ लग रही, मतवाला यह सब समाज है

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