कथारंग : हिन्दी साहित्य परिशिष्ट अंक : 50

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मधु आचार्य ‘आशावादी’  मोबाइल नंबर- 9672869385

नाटक, कहानी, कविता और जीवनानुभव पर 72 पुस्तकेंं हिन्दी और राजस्थानी में लिखी हैं। साहित्य अकादमी नई दिल्ली का सर्वोच्च राजस्थानी पुरस्कार संगीत नाट्य अकादमी का निर्देशन पुरस्कार, शम्भु शेखर सक्सैना, नगर विकास न्यास के टैस्सीटोरी अवार्ड से सम्मानित।

व्यंग्य  :  जनाब, मैं यहां भी अध्यक्ष हूं

आज फिर शहर में एक काव्यगोष्ठी थी। तीन दिन से आयोजन चल ही रहे थे। एक दिन सर्वभाषा काव्य संगम, दूसरे दिन कहानी पाठ और तीसरे दिन अनुवाद पाठ। तीन दिन, रोज तीन घंटे, तीन भाषाएं, तीन गुना तीन लोग और अखबारों में अगले दिन तीन कॉलम खबर। ये गणित नवाब के समझ नहीं आया, तीन ही तीन। उसने तो बचपन में राजस्थानी कहावत सुनी थी— तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा। पर यहां तो तीन का योग उनके लिए रंग जमा रहा था। अरे हां, उनकी 60 साल में कुल जमा तीन ही पुस्तकें छपी थी। तीन लोगों के लिए अशुभ होता होगा मगर रूपेश जी के लिए तो शुभ था। नवाब को यही लगा।
आज चौथे दिन नवाब के पास फिर से एक निमंत्रण आया था। सेठ पूरणमल स्मृति श्रद्धांजलि सभा का। मंत्री जी उसमें मुख्य अतिथि थे। अध्यक्षता सेठ जी के पुत्र की थी। इस आयोजन में काव्य से सेठ जी को श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाने थे। निमंत्रण पत्र के नीचे लिखे नाम पढक़र नवाब चौंक गया। कमाल है! यहां भी अध्यक्ष के रूप में रूपेश जी निमंत्रण दे रहे थे। संस्था थी नगर गौरव समिति।
नवाब का सिर चकरा गया। तीन दिन के आयोजन सृजन संस्था से थे और उसके अध्यक्ष रूपेश जी थे। उस तीन दिवसीय आयोजन में नवाब भागीदारी कर के आया था। तीन का गणित भी तभी समझ आया था।
वो तो साहित्य के आयोजन थे। यहां श्रद्धांजलि सभा थी। उसमें काव्य सरिता बहनी थी सेठ पूरणमल के सम्मान में। नेताओं और सेठों की भागीदारी मुख्य रूप से थी। ये गणित समझ से बाहर था।
नवाब नामुराद गणित के जाल में उलझा था तभी उसके दो मित्र आ गये। एक सेठ के यहां मुनीमी करता था और दूसरे को खुद के बढ़े साहित्यकार होने का घमंड था। साहित्यकार था या नहीं, ये मामला संदिग्ध था।
आते ही मुनीम ने सवाल 303 की तरह दागा।
– अरे नवाब, किस मुसीबत में उलझे हो? बढ़े परेशान दिख रहे हो। अमां यार, क्या बात हो गई?
– क्या बताऊं मुनीम, गणित के फेर में उलझा हूं।
– गणित, कैसी गणित?
– तीन की गणित।
– बात समझ नहीं आई। अगर पात्र समझता है तो खोलकर बता।
– यार, तीन भाषा, तीन घंटे, तीन दिन समझ आ गये। पर दो संस्था समझ नहीं आई। दो संस्था, एक अध्यक्ष। ये गणित तो बिगड़ा हुआ ही दिख रहा है।
– आज भांग पीकर आये हो क्या नवाब!
– ये कैसे?
– तुम क्या बोल रहे हो मेरी तो समझ ही नहीं आ रहा।
– मेरे गणित समझ नहीं आ रही।
– मतलब, हम दोनों आज नासमझ हो गये हैं।
दोनों हंसने लगे।
इस नासमझी की बातों के मध्य ही कथित बड़े साहित्यकार जी ने एंट्री मारी।
– मुझे बताओ, मैं समझता हूं सब।
मुनीम हंसा।
– हंस क्यों रहे हो मुनीम?
– तुम समझाओगे?
– हां। लोग मुझे यूं ही बड़ा साहित्यकार नहीं मानते।
– मानते? यूं कहो तुम ही ये कहते हो।
– देखो बहस मत करो। नहीं तो बात दूसरी पटरी पर चली जायेगी। अभी तो गणित पर हो रही है, फिर साहित्य पर हो जायेगी।
– उससे तो गणित उलझनी ही है, ऐसी उलझेगी की परमात्मा भी आकर सुधार नहीं पाएगा। क्यों नवाब, गलत तो नहीं कह रहा?
नवाब चकरा गया।
– क्या हुआ नवाब, अचंभा किस बात का?

– मुनीम भाई, मेरी उलझी गणित भी साहित्य की ही है।
मुनीम ने सिर पीट लिया।
– वो मारा।
– क्या मारा। किसने मारा!
– अरे, मैंने मुहावरा मारा।
– फिर ठीक है।
तीनों ही हंस दिये।
कथित साहित्यकार अब मूड में आ गये। अपनी मुद्रा को गंभीर बनाया, जैसे कोई बड़े चिंतक हों। फिर गंभीर वाणी में बोलना आरंभ किया।
– साहित्य का मसला है तो नवाब तुम मुझसे बात करो। इन बातों को ये मुनीम क्या समझेगा।
इस बात पर मुनीम को गुस्सा आ गया। पर उसके बोलने से पहले ही उन्होंने टोक दिया।
– ये अपने अपने क्षेत्र की बात है। अब कोई मुझसे हिसाब किताब की बात करे तो मैं उसमें अयोग्य हूं। मना कर दूंगा। ठीक इसी तरह तुम्हें साहित्य में दखल नहीं करना चाहिए। इसलिए बुरा भी मत मानो।
इस बात को सुन मुनीम चुप हो गया। कथित साहित्यकार अब नवाब की तरफ मुड़ा।
– अब तुम मुझे बताओ, बात क्या है? मैं निदान करता हूं तुम्हारी समस्या का। साहित्य एक जटिल विषय है और इसके अपने सिद्धान्त हैं। हर कोई इसके मसले नहीं सुलझा सकता।
नवाब ने प्रवचन सुन जवाब दिया।
– आपकी बात सोलह आने सच है।
– मैं तो सच ही कहता हूं।
– बिल्कुल।
– समझो नवाब, हम बुद्धिजीवियों के साथ बैठते हैं। सब ध्यान रखना पड़ता है। नहीं तो हमें साहित्यकार मानेगा कौन?
– सौ टका खरी बात है।
– लिहाजा मुझे बताओ समस्या। इसकी उम्र तो नोटों का हिसाब लिखते और मिलाते ही बीती है। उससे आगे बुद्धि है नहीं।
– हरेक हर काम नहीं कर सकता।
– तुम समझदार हो, इसीलिए पूरी बात समझ गये।
नवाब मुस्कुरा दिया। समझदार का खिताब जो मिला था।
– कहो, क्या पूछ रहे थे!
– मैं तीन दिन साहित्यिक आयोजन में गया था। वो रूपेश जी हैं ना।
– हां।
– उनके आयोजन थे।
– वो तो आयोजन ही करते हैं। इसी में उनको लाभ है।
– साहित्यिक आयोजनों से लाभ? बात कुछ समझ नहीं आई।
– इतनी सीधी बात समझ नहीं आई, कमाल है।
– आप ही ज्ञानार्जन करें।
कथित साहित्यकार जी का सीना गर्व से फूल गया। ज्ञानी की उपाधि मिली थी, वो भी बिना पैसे दिये।
– अरे नवाब, इस युग में होने से ज्यादा दिखना जरूरी होता है। वो आयोजक हैं और आयोजनों से ही बड़े साहित्यकार बने हुए हैं। लिखना उनके बस की बात नहीं। आयोजन होता है तो अखबार में फोटो छपता है। खबर छपती है। लोग नमस्कार करते हैं। फिर वो खबरों की कटिंग वाट्सअप से लोगों को भेजते हैं। फेसबुक पर लगाते हैं। अपना प्रचार खुद करते हैं। ये लोग साहित्य के माफिया हैं। बड़ी संख्या में ऐसे लोग साहित्य में आ गये हैं।
– माफिया, ये बात समझ नहीं आई।
– देखो, ये आयोजनों से लोगों को अवसर देते हैं। अवसर देने के बदले उनसे बढ़ी रकम वसूलते हैं। वो रकम घर चलाने के काम तो आती ही है, साथ में खुद के आयोजन भी हो जाते हैं। माफिया इसलिए भी वे बाद में कहते हैं, मेरा शिष्य या शिष्या है। इसे मैंने तैयार किया। अवसर दिया। जीवन भर पूजा कराते हैं। स्थायी क्लाइंट बनाते हैं।
– स्थायी कैसे?   – सप्ताह में एक दिन उसके घर जाते हैं, खास भोजन करते हैं।
– ओह!
– अब ऐसे 15 शिष्य और शिष्या तो हैं ही। सब पर भार भी नहीं पड़ता। एक का महीने में सिर्फ दो बार नंबर आता है।
नवाब साहित्य की इस गणित को समझ मुस्कुराने लगा। साहित्य ना हुआ गोया दुधारू गाय हो गया। साहित्य माफिया की परिभाषा भी इस बहाने समझ आ गई।
– क्या सोचने लगे हो नवाब?
– इनके प्रतिपक्ष में भी तो कोई साहित्य माफिया होता होगा?
– ये तो स्वाभाविक है। किसी धंधे पर आज के युग में एकाधिकार नहीं होता। देखादेखी नये व्यापारी भी धंधे में आते ही हैं।
– अच्छा। रूपेश जी के सामने भी कोई है क्या?
– है ना!
– कौन?
– वो तुम्हारे खास मोहन जी।
– हां, वो भी नये लोगों के लिए आयोजन करते हैं।
– उनके आयोजनों में भाग लेने वाले दूसरे हैं। श्रोता भी दूसरे हैं।
– बिल्कुल ठीक पहचाना।
– दोनों का ही धंधा अच्छा चल रहा है।
– हां।
– इन दोनों की लड़ाई भी तो जग-जाहिर है।
कथित साहित्यकार जी हंसने लगे।
– इसमें हंसने की क्या बात हुई?
– तुम बहुत भोले हो नवाब!
– कैसे?
– वो दिखावा है। ताकि दोनों की दुकानें चलती रहे।
– मतलब?
– अरे, दोनों भीतर से एक हंै। दिखावा तो लोगों को फंसाने के लिए है।
– ओहो!
– तुम्हें वो बात मालूम नहीं है क्या?
– कौन सी?
– विदेश के दो विरोधी अखबारों वाली।
– नहीं। आप हमें बता दीजिए।
– अभी बताता हूं।
अब साहित्यकार जी पूरे रंग में आ गए थे।
– नवाब! विदेश में एक अखबार निकलता था। खूब बिकता था। लाखों पाठक थे। उसके सामने कोई अखबार नहीं था तो उसने प्रिंट मीडिया पर एकाधिकार कर लिया। पाठकों के सामने भी कोई विकल्प नहीं था।
– बड़ा अखबार था फिर तो वो?
– बिल्कुल। एकाधिकार के कारण उसने अखबार के दाम बढ़ा दिए। विज्ञापन छापने के पैसे भी मुंह मांगे लेने लगा। पाठक और विज्ञापनदाता करे भी तो क्या?
– सही है। विकल्पहीनता में ये तो होता ही है। मनमर्जी चलती है और दूसरों को उसे सहना पड़ता है। चारा ही नहीं कोई।
– तो उस बड ़े अखबार के विरोध में एक नया अखबार चालू हुआ। उसने विज्ञापन की दर भी कम रखी और अखबार के दाम भी। लोगों को विकल्प मिल गया। उन्होंने उसे हाथों हाथ लिया। प्रसार उस अखबार के बराबर हो गया।
– वो तो होना ही था।
– नये अखबार की खबरों का तेवर तीखा था। लगभग खबरें पुराने अखबार से हटकर थी। कई तो उसके विपरीत भी होती थी।
– अच्छा।
– दोनों में जंग शुरू हो गई।
– वर्चस्व के लिए लड़ाई तो होनी ही थी।
– केवल खबरों में ही नहीं, हर मामले में जंग हो गई।  – समझा नहीं।
– दोनों ने एक-दूसरे पर अलग विषयों पर अदालतों में मुकदमे कर दिये। उनका प्रचार भी अखबारों में जमकर किया।
– फिर क्या हुआ?
– इस गहमागहमी से पाठक प्रभावित हुआ। जो एक अखबार खरीदता था वो अब दोनों खरीदने लगा। उसमें उत्सुकता रहती कि देखें दूसरे अखबार ने क्या लिखा है।
– वाह! कमाल हो गया।
– कमाल यहीं नहीं रुका। आगे भी बढ़ा।
– कैसे?
– दोनों अखबारों के अधिक और बराबर पाठक हो गये तो अब विज्ञापनदाता भी मजबूर होकर दोनों अखबारों में विज्ञापन देने लगा।
– उसके लिए ये तो जरूरी था।
– बस, दोनों अखबार उस देश के मुख्य अखबार बन गये।
– ये तो होना ही था।
– नवाब, असली बात तो अब सामने आएगी।
– वो क्या?
– बताता हूं, धैर्य रखो।
– मेरे पास तो यही है। साहित्यिक आयोजनों में जाने से और कुछ सीखा या नहीं, धैर्य जरूर सीख गया। वहां सहन करने की मजबूरी होती है।
कथित साहित्यकार मुस्कुरा दिया।
– तो साहित्यकार महोदय, अब आगे की कथा तो सुनाइए।
– प्रियवर नवाब, वही सुना रहा हूं।
– मैं उसे सुनने को आतुर हूं।
– तुम्हारी आतुरता समझ सकता हूं।
– तो अब जिज्ञासा शांत कीजिए।
– अभी करता हूं।
साहित्यकार जी गम्भीर मुद्रा में आ गये और प्रवचन के अंदाज में रुकी बात को फिर से आरंभ किया।
– एक खबर पुराने अखबार में छपी। वैसी ही नये में थी। एक पड़े लिखे के बारे में खबर थी। उस पर कुछ आरोप लगे थे।
– अच्छा!
– उसने दोनों अखबारों को पत्र लिखा कि ये खबर झूठी है। इसका खंडन छापें। दोनों ने छापने से इंकार कर दिया। गुस्से में उस व्यक्ति ने न्यायालय में वाद दायर कर दिया। मुकदमा शुरू हो गया। नीचे के कोर्ट से आरंभ होकर विदेश के सबसे ऊँचे कोर्ट तक तीन सालों में पहुंच गया। अब मामला गम्भीर हो गया। वहां दस्तावेज पेश हुए तो पता चला कि दोनों अखबारों का मालिक एक ही था।
नवाब अचंभे में पड़ गया।
– वाह, ये तो कमाल की बात है। एक व्यक्ति एक पाठक, एक विज्ञापनदाता से दो वसूली करता रहा। ये सच है क्या?
– सच है या नहीं, इससे तुम्हें और मुझे क्या लेना देना। तुम तो इसे एक उदाहरण समझो।
– चलो समझ लिया।
– ठीक वैसी ही बात इन दोनों साहित्य माफिया में है। बाहर से विरोध, भीतर गठजोड़। आई बात समझ में?
नवाब हंस दिया।
– आ गई समझ। अब इनके आपसी विवाद की बातें सुन समय बर्बाद नहीं करूंगा।
– समझदार हो।
दोनों और मुनीम हंसने लगे।
मुनीम बोला।
– तुम्हारी मूल समस्या तो तुमने अभी तक नहीं बताई नवाब! अब वो भी बता दो। ये साहित्यकार कहलाते हैं, बीच में ही दूसरी बातें शुरू कर दी। अपने साहित्य के गुटों की बात आते ही ये सब भूल जाते हैं। गुटबाजी में साहित्यकारों  को सबसे ज्यादा मजा आता है।
नवाब मुस्कुराकर बोला।
– वो तो मैं समझ गया आज। रूपेश जी और मोहन जी के विवाद का सच अखबारों की कहानी से जान गया। इन साहित्यकारों की गुटबाजी में रुचि जान गया। ये सब जानने के बाद मुझे पक्का भरोसा हो गया कि मेरी समस्या का निदान ये कर देंगे। चुटकी में कर देंगे। मुनीम, ये रोग तेरे बस का नहीं, ये तय है।
– तो बता इनको समस्या।
कथित साहित्यकार जी बोले।
– बताओ नवाब!
अब नवाब मूल बात पर आया।
– मैं तीन दिन तक लगातार रूपेश जी के साहित्यिक आयोजनों में गया।
– हां।
– आज फिर एक शोक सभा का निमंत्रण मिला। सेठ पूरणमल जी की शोक सभा है।
– हां, है ना! मुझे भी उसमें जाना है।
– उस शोक सभा का आयोजन जो संस्था कर रही है उसके अध्यक्ष भी रूपेश जी हैं।
– हां है। इसमें कौनसी समस्या?
– एक साहित्यिक संस्था का अध्यक्ष किसी दूसरे काम की दूसरी संस्था का अध्यक्ष कैसे?
– अरे नवाब, सामान्य सी बात है।
– मुझे तो असामान्य लगी।
– इसमें कुछ भी असामान्य नहीं। भाई, ये पार्ट टाइम जॉब है।
– पार्ट टाइम जॉब! समझ नहीं आया माजरा।
– भाई, तुम हमारे शहर के असीम प्रसाद को नहीं जानते।
– जानता हूं ना। जिनके नाम के आगे लोग और वे खुद धड़ल्ले से समाज सेवी लगाते हैं।
– ठीक पहचाना, वही।
– उनका जिक्र क्यों?
– तुमको पता है, वो कितनी संस्थाओं के अध्यक्ष हैं?
– नहीं। पचास तक की तो मैंने गिनती की थी, बाद में गिनना छोड़ दिया।
– क्या कह रहे हो?
– सही कह रहा हूं।
– ऐसा कैसे?
– वो छोटे मोटे नेता भी हैं।
– ये पता है।
– लोग उनके पास समस्या लेकर या कोई नया काम शुरू करने का प्रस्ताव लेकर जाते, तो जानते हो वो क्या कहते?
– वो कहते, इसके लिए हमें पहले एक संस्था बनानी होगी। ताकि उसके लेटर हेड से पत्र व्यवहार कर सकें। प्रेस नोट जारी कर सकें। लोग मान जाते हैं उनकी बात। फिर वो कहते, चलो संस्था बनाओ।
– फिर?
– फिर क्या, वो कहते अध्यक्ष मैं और बाकी पदाधिकारी तुम लोग बन जाओ। संस्था बन जाती। इस तरह वो अनगिनत संस्थाओं के अध्यक्ष हैं।
तीनों ही खुलकर हंसे। मुनीम बोला।
– वाह। सेवा का नायाब तरीका है ये।
– सच में सुनकर मजा आ गया।
नवाब वापस मूल सवाल पर आया।
– वो पार्ट टाइम जॉब वाली बात अधूरी रह गई।
– उस पर भी आता हूं।
– आओ ना फिर!
– कमाई के लिए कुछ तो करना ही पड़ता है। $गैर-साहित्यिक कार्य भी। उसे साहित्यिक संस्था से करें तो बदनामी होती है। इसके लिए अलग दुकान खोलनी ही पड़ती है। उस दुकान से वो आयोजनों का ठेका लेते हैं। लमसम दाम

तय होते हैं और दूसरों के आयोजन वो कर देते हैं। इससे व्यक्तिगत आमदनी भी हो जाती है। अच्छा पैसा मिल जाता है। अब हरेक आयोजन तो कर नहीं सकता और इनको आयोजन में पीएच.डी. मिली हुई है। आयोजन करते हैं और पैसा कमाते हैं।
– ये बात है, अब समझा!
– तुमको शायद मालूम नहीं।
– क्या?
– ये रूपेश जी पांच और मोहन जी सात संस्थाओं के अध्यक्ष हैं।
– मतलब इनके पास पांच और सात दुकानें हैं। आयोजनों के बढ़े व्यापारी हुए फिर तो।
– इसमें कोई शक ही नहीं।
– जय हो साहित्य की।
– तो नवाब, तुम चलोगे शोक सभा में?
– इतना जानने के बाद मेरी तो हिम्मत नहीं। दुकानों पर जाऊं, खरीददारी करूं, ये अब नहीं होगा। आपने कहा था, आप जाओगे।
– हां।
– क्यों?
– तुम नहीं समझोगे। जाऊंगा और सेठ पूरणमल जी पर रूपेश, मोहन की तरह कविता पढूंगा। भाषण भी दूंगा।
– ये बात समझ से परे है।
– बिल्कुल परे नहीं, समझदारी की बात है।
– मुझे भी बताओ।
– तुम काम्पिटीटर नहीं हो इसलिए बता देता हूं।
– बड़ी मेहरबानी।
– दरअस्ल सेठ पूरणमल जी के बेटे अपने पिता पर हर साल 51 हजार का साहित्यिक पुरस्कार भी देते हैं।
– ओह!
– हम तीनों रेस में हैं। अब तो समझे?
– समझ गया।
– तो मैं अब चलूं?
– जरूर।
– तुम तो चलोगे नहीं। और मुनीम तुम?
– नवाब की तरह में भी काम्पिटीटर नहीं।
– ठीक है। मेरे लिए दुआ करना।
– जरूर।
कथित साहित्यकार जी निकल लिये।
नवाब सिर पीटने लगा। साहित्य के नाम पर सरेआम दुकानदारी। कोई सीआरपीसी नहीं, जो इस व्यभिचार को रोके। सहने के अलावा कोई चारा ही नहीं।

शाइरी में सच के हामिल
ख़लीक़ अहमद ख़लीक़

पैदाइश -1919,  वफ़ात -24 मई 2003

सीमा भाटी,  मोबाइल नंबर- 9414020707

उर्दू रचनाकार सीमा भाटी का राजस्थानी, उर्दू ,हिंदी तीनों भाषा में समान लेखन। आपका कहांनी संग्रह, कविता संग्रह, और एक राजस्थानी उपन्यास भी आ चुका है। इन्हें राजस्थान उर्दू अकादमी जयपुर का प्रतिष्ठित अल्लामा इक़बाल अवार्ड 2017 उर्दू साहित्य में मिला।

उर्दू अदब की तारीख़ हमेशा इस बात की गवाह रही है कि शेरो अदब हो या इल्म व फ़न और ज़िन्दगी के दीगर शुअबों हो, बीकानेर की सर ज़मीन ने वक़्तन वक़्तन ऐसे मर्दे मुज़ाहिद पैदा किये हैं जिन्होंने उर्दू अदब के लिहाज से बीकानेर का नाम मुल्क़ी और आलमी सतह पर रोशन किया है। एक वक़्त में इस रेगिस्तान इलाक़े में जहाँ मक़ामी ज़बान बोली जाती रही, वहाँ उर्दू शेरो अदब के नख़लिस्तान का तसव्वुर करना ही दुशवार था मगर यहाँ चंद ऐसे शाइर हुए जिनकी नुमाया ख़िदमात ने इस सरज़मीं पर उर्दू ज़बान का पौधा लगाया और उसे अपनी शाइरी से सींच कर हमेशा हरा भरा रखने की क़ाबिले तारीफ़ कोशिशें की, उन चंद शाइरों में ख़लीक़ अहमद ख़लीक़ साहब का नाम बड़े ऐहतराम से लिया जाता है।
ख़लीक़ साहब की शाइरी को क़ुबूले ख़ासो आम का दर्ज़ा हासिल था। आपने तमाम अस्नाफे सुख़न पर क़ुदरत हासिल रखते हुए तमाम असनाफ़ पर यकसा कहा है उनकी शख़्सियत पर मैं यहाँ एक बात और अयां करना चाहती हूँ कि ख़लीक़ साहब जब ग़ज़ल कहते तो एक बेहतरीन ग़ज़ल गो नज़र आते और जब वो नज़्म कहते तो उनकी शख़्सियत से एक नज़्म गो शाइर का अक्स झलकता था |
इलाक़ा (शेखावटी ) कस्बा सिघांना में रहने वाले ख़लीक़ अहमद ख़लीक़ साहब की पैदाइश 1919 में हुई थी, आपकी परवरिश के साथ इब्तदाई तालीम व तरबियत भी आपके नाना साहब के साये में हुई, जो कि ख़ुद अरबी फ़ारसी और उर्दू के जिद आलिम थे। इसलिए हम कह सकते हैं कि इल्मो अदब ख़लीक़ साहब को घुटी में मिला है जिसके असरात आपकी छोटी उम्र से ही नज़र आने लगे थे, स्कूली तालीम के दौरान आपको मौलवी हुसैन राना जैसे उस्ताद की सरपरस्ती मिली जिनसे आपने उर्दू की तालीम हासिल की। और ये ही वजह कि उनके घर में इल्म अदब के माहौल,एक क़ाबिल उस्ताद की रहनुमाई और पुरजोर शिद्द्त ने ख़लीक़ साहब को बेहतरीन शाइर बना दिया। हालांकि आप तालीम मेट्रिक से ज़्यादा हासिल नही कर पाए थे, जयपुर में पुलिस महकमे में भी काम किया लेकिन रास नही आया आख़िर यू.आई .टी बीकानेर में मुलाज़मत करने के बाद सीनियर ड्राफ्ट मेंन के ओहदे से रिटायर भी हो गए। खुद हालाँकि डिग्री ना कर पाए लेकिन आपके साहबजादे आज कामयाब डॉक्टर है।
ख़लीक़ साहब आलिमों-फ़ाज़िल ख़ानदान के चश्मों चिराग़ थे आपको मौलवी युसूफ अली खां अज़ीज़ आगही कि शागिर्दी का सर्फ़ हासिल था। जो कि ग़ालिब स्कूल के शाइर थे। इस तरह ख़लीक़ साहब का ग़ालिब साहब के शागिर्द भी कहे जाने लगे। जो कि बाद आपकी शख़्सियत से साफ़ तौर पर झलकने भी लगा था। आपने अपने अदबी सफ़र को इतना तेज़ी से तय किया कि जल्द ही दुनिया – ए -अदब में आपको एक मुमताज़ मक़ाम हासिल हो गया। आपका एक मज़्मुआ कलाम “सरमाया हयात “के उनवान से 1995 में शाए हुआ। चाहे कितनी और कैसी भी मुश्किलें ज़िन्दगी में आ जाए, जो अपनी राह ख़ुद तलाश करते है उन्हें किसी सहारे कि ज़रूरत नही पड़ती। ऐसे शख़्स किसी क़ीमत पर अपनी खुद्दारी को दांव पर नही लगाते और ख़लीक़ साहब उनमें से एक थे।

नज़्म के चंद अशआर आपकी नज़र ..

“बिकी होगी हज़ारों मन मिठाई
गरीबों को मगर ना हाथ आई
नये कपड़े ना घर में रोशनी है
उदासी मुफ़लिसी और ख़ामोशी है
ख़ुशी भर भर के लाई दीपावली
गरीबों की है लेकिन रात काली
ज़माना पूजता है राम को कब
फ़क़त हैं लक्ष्मी को पूजते सब “

ख़लीक़ साहब साफ़ सुथरी ज़बान के मालिक थे। बुलंद पाया शाइर होने के तमाम वजह आपकी शाइरी की मज़हर थी, कलाम में ख़ास मिठास के साथ साथ गज़ब का अंदाज़े बयां था जो आपकी ग़ज़लों में चार चाँद का काम करती थी। आपकी ग़ज़लों में हुस्न व इश्क़ था तो एक जाज़बियत भी थी जो आपकी ख़ुल्क़ मिज़ाजी का सुबूत देती थी आपका दौर एक ऐसा दौर था जब अहले ज़बान को सोहबतों और महफ़िलों का माहौल मिलता था। दिन रात शेरों सुख़न की महफिलें सजती थी। अहले इल्मों अदब के शख़्स के अलावा आम आवाम का भी शेरों सुख़न से ज़बरदस्त लगाव था और अशआर का बख़ूबी समझते भी थे। जो लोग आला इल्म हासिल करने से महरूम रह जाते हैं उन्हें इस तरह की सोहबतें और महफिलें एक अच्छा फ़ाज़िल इंसान बना देती है और ख़लीक़ साहब की ज़िन्दगी भी इन तमाम हालात से होकर गुज़री थी |
ख़लीक़ साहब का 1950 से शेरो सुख़न का सिलसिला शुरू हुआ। आपने बहुत से शाइरों के कलाम पर तनक़ीद की मगर उन्हें कमतरी का अहसास कभी नही करवाते थे।
आप रिवायत पसंद इंसान थे जिन्हें अपनी रिवायत से बग़ावत करना ना क़ाबिले बर्दास्त था। ख़लीक़ साहब ने मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत पर लिखा और बेहतरीन लिखा। मगर आपका बहुत कलाम मतबूआ है और जितना कलाम आपका शाए हुआ उस से भी ज़्यादा अभी हाथ से लिखे हुआ बाक़ी पड़ा है। जो की ना अभी तक छपा और ना ही अभी तक कहीं पढ़ा गया था।
कुछ अशआर आपकी नज़र …..

“गए थे मयकदों का जो उठाने
नशे में चूर होकर आ रहे हैं …

“ख़लीक़े ज़ार वो खाने की है चीज़
तभी तो लोग रिश्वत खा रहे हैं “…
आपने हम्द, नअत मन्क़बत, सलाम, मरसिया, नज़्म, ग़ज़ल, क़तआत, रुबाइयात, गीत, दोहे वगैरह असनाफ़े सुख़न में तबअ आज़माई की थी। 1989 में हरियाणा के शहर गुड़गांव में अंजुमन फ़रोग़ उर्दू के जानिब से आपका इस्तक़बाल भी हुआ था। जिसमें बहुत लोगों ने शिरक़त की।
ख़लीक़ साहब का अपना एक ख़ास नज़रिया था, ख़ुद का अपना एक तकाज़ा था जिस पर वो हमेशा क़ायम रहते थे किसी भी मुशाइरे या कहीं भी जाते तो पूरे ठसके के साथ ,बे क़द्री करना और सहना बिल्कुल पसंद नही थी। तमाम हालत के बावजूद भी आपने हमेशा अपनी शाइरी को ज़िन्दगी का आईना माना। इसलिए ख़लीक़ साहब का नाम और मक़ाम तारीख़े शेरो सुख़न में हमेशा क़ायम व महफूज़ रहेगा।
आख़िर में चंद अशआर …

“धोखा है किसी शेर पे मुलम्मे का चढ़ाना
हर हाल में बेजा है, हक़ीक़त का छुपाना”

“इक ऐब हो तो उस का छुपाले कोई “ख़लीक़े ”
सारे जहां की ऐब हैं इक मुफलिसी के साथ”

“इतनी सी दास्तान है अपनी तो ए” ख़लीक़”
राहत ने जब मिटाया, मुसीबत जला गई …”

डॉ. प्रमोद कुमार चमोली  मोबाइल नंबर- 9414031050

नाटक, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य, स्मरण व शैक्षिक नवाचारों पर आलेख लेखन व रंगकर्म जवाहर कला केन्द्र की लघु नाट्य लेखन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान। अब तक दो कृतियां प्रकाशित हैं। नगर विकास न्यास का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान

कुछ पढते.. कुछ लिखते…  (लॉकडाउन के दौरान लिखी गई डायरी के अंश)

मेरी डायरी : भाग 15

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा

डॉ. प्रमोद कुमार चमोली

दिनांकः17.04.2020

     कल देर से उठने की ग्लानि से आज सुबह जल्दी उठने के कारण मुक्त हो चुका था। सुबह जल्दी उठना आपको कई तरीके से प्रेरित करता है। आज कुछ व्यायाम किया। ऐसा महसुस हो रहा है कि कई दिनों से घर में पड़े-पड़े वजन कम से कम चार से पांच किलो तो बढ़ गया है। पिछले दो साल से नियमित व्यायाम से अपनी उम्र को छकाने का प्रयास किया था किन्तु इस कोरोना काल ने बड़ी ही विकट स्थिति पैदा करदी है। करीब आधा घंटा के इन्टेंस वर्कआउट के बाद थकान तारी हो गई थी । तुरंत स्नानादि से निवृत्त होने से एक बार पुनः ताजगी का संचार हो गया था। रात को पंचायत का एक ही सीरियल देखा था। आज के लिए तय किया था कि गीता के अंतिम अध्याय को पढ़कर गीता अध्ययन पूर्ण किया जाएगा।

     फिलहाल सुबह-सुबह अखबार से बाबस्ता हूँ। आज की खबरों में कुछ खास नहीं है। इधर लॉकडाउन में के बाद 20 अप्रेल से ऑनलाईन मोबाइल फ्रिज इत्यादि ऑन लाइन खरीदने की छूट होगी। ऑनलाईन खरीदना शुरू होगा लेकिन बाजार बंद रहेंगे। बात गलत सी लगती है। लोकल दुकानदारों के हिसाब से यह खबर अच्छी प्रतीत नहीं हो रही है। बंद में सभी बंद होना चाहिए। ऐसी कौनसी मजबूरी है जिसके तहत ऑनलाईन कम्पनियों को कार्य करना दिया जाए और लोकल को लॉकडाउन में रोका जाए। आज राजस्थान में 55 नए संक्रमित मिले हैं। बहरहाल एक खुशी की बात यह है कि कोरोना के कारण भारत में रिकवरी रेट 11 प्रतिशत है जबकि अमेरिका में 7.5 प्रतिशत भी है। इसी बीच राहुल गांधी ने ज्यादा टेस्ट करने की बात कही है। बात तो सही ही लगती है पर आपको एक बार मीडिया और सोशियल मीडिया आपको नीचे गिरा दे ंतो आपकी बातों अर्थ कम होने लगते है।

     इसके बाद गीता के अंतिम अध्याय को पढ़ना प्रारम्भ कर दिया। इस अध्याय का नाम मोक्ष सन्यास योग है। इस अध्याय में कुल 78 श्लोक हैं। डॉ. राधाकृष्णन ने इस अध्याय को ‘निष्कर्ष की संज्ञा दी है। दरअस्ल यह अध्याय सम्पूर्ण गीता का समेकन भी है। इस अध्याय के प्रारम्भ में भगवान से सन्यास के बारे अर्जुन पूछते हुए कहते हैं कि

सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।

त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।।

     हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक-पृथक जानना चाहता हूँ। श्री भगवान कहते हैं – कुछ कवि (विद्वान) तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं पर दूसरे विचारक सभी कर्मों के फल-त्याग को त्याग कहते हैं।

     भगवान कहते हैं कि बुद्धिमान लोग सन्यास का अर्थ इच्छा द्वारा प्रेरित कर्मों का त्याग समझते हैं सब कर्मों के फलों के त्याग को विद्वान लोग त्याग कहते हैं। व्यक्ति को अपने नियत कर्तव्य अपना करने चाहिए तथा उसके प्रति सम्पूर्ण आसक्ति  तथा फल को त्याग करना चाहिए ऐसा त्याग सात्विक माना जाता है। आगे भगवान अर्जुन को करने योग्य कर्मों के बारे मंे बताते हैं। कर्म प्रकृति का एक कार्य है। इसे समझाते हुए भगवान अर्जुन को कहते हैं कि सब कर्मों को करने के लिए आवश्यक पांच उपकरण स्थान,कर्ता, साधन, चेष्टाएं और भाग्य होते हैं। विकृत मन वाला मनुष्य इस स्वयं को कर्ता समझने लगता है।

     ज्ञान और कर्म का भेद बताते हुए भगवान कहते हैं जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, वह सात्त्विक ज्ञान है। जो ज्ञान सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग देखता है वह राजस ज्ञान है तथा जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस ज्ञान है। इसी प्रकार जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है। बहुत परिश्रम से युक्त तथा अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया। परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को बिना विचारे केवल अज्ञान से आरंभ किए जाने वाले कर्म को तामस कहा जाता है।

     भगवान बुद्धि के भेद बताते हुए कहते हैं कि कर्म और अकर्म भेद को जानने वाली, भय और अभय को समझने वाली,  आत्मा को बंधन और बंधन से मुक्त करने वाली वस्तुओं को जानने वाली बुद्धि सात्विक बुद्धि कहलाती है। इसी प्रकार धर्म अधर्म, करणीय अकरणीय कार्यों को गलत ढंग से समझने वाली बुद्धि राजसिक बुद्धि कहलाती है तथा जो बुद्धि धर्म को अधर्म समझे तथा सत्य के विपरीत देखती है वह तामसिक बुद्धि कहलाती है। आगे भगवान अर्जुन को तीन प्रकार के सुखों के बारे में बताते हुए कहते हैं कि सात्विक सुख वह सुख है जो आत्मा को स्पष्ट रूप से समझने के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। राजसी सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है तथा तामसी सुख निद्रा आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न ऐसा सुख जिसके कारण आत्मा भ्रम में रहती है।

     भगवान चार वर्णो के बारे में बताते हैं। डॉ. राधाकृष्णन इन चार वर्णों को मनुष्य के स्वाभाव और स्वधर्म से नियत किए गए विभिन्न कर्तव्यों की संज्ञा देते हैं। पृथ्वी पर उत्पन्न सभी प्राणी तीन गुणों सत, रज और तम से युक्त होते हैं। चारो वर्णो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रों की गतिविधियाँ उनके स्वाभाव से उत्पन्न गुणों के कारण अलग-अलग होती हैं। यहाँ डॉ. राधाकृष्णन और खुलासा करते हुए कहते हैं कि चार वर्णो की ये बातें हिन्दु समाज की कोई विलक्षण वस्तु नहीं है। यह सब पर लागू होती है। यह वर्गीकरण मानव-स्वाभाव के प्रकारों पर आधारित है। चारों वर्णों में से प्रत्येक की कुछ सुनिर्दिष्ट विशेषताएँ हैं, भले ही उन्हें आत्यांतिक और अनन्य नहीं समझना चाहिए। ये सदा जन्म द्वारा निर्धारित नहीं होती।

     सिद्धि व परमसिद्धि को स्पष्ट करते हुए भगवान कहते हैं कि अपने अपने कर्मों में लगा मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है। जिस परमात्मा से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है उसकी आज्ञा के अनुसार मन, वाणी और शरीर से उसके के ही लिए स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करते हुए मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। कर्मयोग द्वारा सिद्धि के बारे में बताते हुए कहते हैं कि अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता। आगे वे सिद्धि को प्राप्त व्यक्ति ज्ञान की सर्वोच्च निष्पति ब्रह्म को प्राप्त करने के बारे मे बताते हैं। विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, अपने आप को संयम में रखते हुए शब्द और इन्द्रियों के विषयों को त्यागकर और राग द्वेष को छोड़कर, एकान्त में निवास करता हुआ, अल्पहारी व्यक्ति ध्यान और एकाग्रता रखते हुए वैरग्य की शरण लिए हुए, अंधकार, बल, घमण्ड, इच्छा, क्रोध, सम्पति और ममत्व को त्याग कर शान्तचित्त वाला ब्रह्म के साथ एकाकार करता है। ब्रह्म के साथ एकाकार करना सर्वोत्तम भक्ति है।

     अर्जुन को समझाते हुए भगवान कहते हैं कि जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा

जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा। शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमात्मा अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है। संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

     आगे उपदेश पालन के अर्थों को स्पष्ट करते हुए भगवान कहते हैं कि तप और श्रद्धा रहित आज्ञापालन नही करने वाला तथा मेरी बुराई करने वालों को यह ज्ञान मत बताना। यह परम रहस्य जो मेरे भक्तों को सिखाता है। वह मेरे प्रति अधिकतम भक्ति दिखाता है। जो हमारे इस संवाद का अध्ययन करेगा वह ज्ञानयोग द्वारा मेरी पूजा कर रहा होगा और जो श्रद्धा के साथ इसे सुनेगा वह भी आनन्दमय लोक को प्राप्त होगा। हे अर्जुन क्या तूने एकाग्रता के साथ इसे सुना है? क्या तेरी अज्ञान के कारण उत्पन्न घबराहट दूर हो गई है। उक्त समस्त को सुनकर अर्जुन कहते हैं कि-

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।

हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा

     इस पर संजय कहते हैं कि –

     हे राजन्! श्रीहरि (जिसका स्मरण करने से पापों का नाश होता है उसका नाम हरि है) के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूं।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्था पार्थो धनुर्धरः ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।

     हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है।

     गीता का उपदेश योग है। इस उपदेश को देने वाला योगेश्वर है। जब मानव आत्मा प्रबुद्ध और ब्रह्म के साथ एक हो जाती है, तब सौभाग्य और विजय, कल्याण और नैतिकता सुनिश्चित हो जाती है। गीता को जीवन में पहली बार पढ़ा है। क्यों पढ़ा है इसका कोई जबाब मेरे पास नहीं है। एक कारण तो मित्रवर स्व. अजय पिल्लई का आग्रह मय पुस्तक तो रहा ही है। लेकिन इसके आगे क्या है? वह कुछ स्पष्ट नहीं है। शायद यह लॉकडाउन का असर हो। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि लॉकडाउन नहीं होता तो शायद की इस महानतम पुस्तक को पढ़ पाता। यहाँ इतना भी स्पष्ट करदूँ कि अभी तो केवल पढ़ा ही है इसे जानना अभी बहुत दूर की बात लगती है। इतना जरूर कह सकता हूँ कि यह सभी में समभाव पैदा तो आसानी से कर सकती है। जब सभी का विकास और विनाश परमपिता के हाथ में है, जीवन में व्याप्त हर घटना के मूल मे उसकी उपस्थिति है। ऐसे में अपने सम्मुख प्रत्येक जीव के भीतर के कृष्ण को देखना समभाव का मूल है। इसे पढ़ने के बाद यह प्रतीति दृढ हुई है। सरल भाव में गीता सवालों और जबाबों की प्रक्रिया है। हम सवाल पूछना सीखना चाहते हैं या जब-जब मुसीबत में पड़ते हैं तब-तब अपनी मुसीबत दूर करने के लिए कुछ खोज करने लगते हैं। सीधा कह दूँ तो वह खोज गीता हो सकती है। गीता अपने अंदर विराजिल भगवान के अंश को पहचानने की बात कहकर उससे प्रश्न करने का आह्वान करती है। बहरहाल आज इतना सब करते-करते रात के 11 बज चुके हैं। आँखों में नींद भी तारी होने लगी है। आज के लिए बस इतना ही।

-इति-

ऋतु शर्मा  :  मोबाइल नंबर- 9950264350

हिन्दी व राजस्थानी में समान रूप से कविता-कहानी लिखती हैं। हिंदी व राजस्थानी में चार किताबों का प्रकाशन। सरला देवी स्मृति व कर्णधार सम्मान से सम्मानित

साक्षात्कार : रेणूका व्यास ‘नीलम’ से

हिन्दी व राजस्थानी में समान रूप से लिख रहीं रेणूका व्यास ‘नीलम’ अपने रचनाकर्म से संभावनाएं जगाती हैं। शिक्षण और अध्यात्म में स्वयं को व्यस्त रखते हुए अनूभतियों को कविता कहानियों में अभिव्यक्त हो रही रेणुका व्यास की अब तक पांच कृतियां आ चुकी हैं। आपको अनेक संस्थाओं ने सुदीर्घ साहित्य सेवाओं के लिए सम्मानित भी किया है। प्रस्तुत है लॉयन एक्सप्रेस के साहित्य परिशिष्ट ‘कथारंग’ के लिए रेणूका व्यास ‘नीलम’ की कवयित्री-कथाकार ऋतु शर्मा से बातचीत
हर व्यक्ति जीवन में आया प्रेरणा बना : रेणूका व्यास ‘नीलम’

प्रश्न 1. : पढ़ाई में सदैव अव्वल आने वाली डॉ.रेणुका व्यास किस तरह साहित्यकार बनी?

उत्तर : सच कहूं तो पढऩे के शौक ने ही पढाई में अव्वल बनाया और उसने ही साहित्यकार। क्योंकि पढते-पढते ही मैं, हाई स्कूल के दिनों में ही लिखने लगी थी। पर यह बात अलग है कि वह सब बहुत भावुकता से भरा था। साहित्य नहीं कह सकते आप उसे। पर लिखने की शुरुआत वहीं से हुई। कभी स्कूल, कॉलेज की मैगजीन में छप गए तो कभी छोटे-मोटे अखबार में। कभी किसी ने सराह कर रास्ता दिखा दिया तो कभी जिम्मेदारियों ने रोक दिया, व्यस्तताओं ने भटका दिया। बस इसी तरह भटकते- अटकते अपने लेखन की गाड़ी चल निकली।

प्रश्न 2. आप अपनी प्रेरणा किसे मानती हैं?

उत्तर : मेरी प्रेरणा इतने अधिक लोगों से आती है कि सिर्फ एक या दो व्यक्ति मेरी प्रेरणा की सूची में नहीं आते। सैकड़ों व्यक्ति रहें हैं मेरे जीवन में, जिनसे मैंने सकारात्मक सीखा है या सीखना चाहा है। यहां तक कि मुझे नापसंद करने वाले व्यक्ति भी मुझे कुछ देकर ही गए हैं। इसलिए मेरी प्रेरणा वो हर एक शख्स है जो मेरे जीवन में आया, क्योंकि उसने मेरे जीवन में कुछ ना कुछ सकारात्मक जोड़ा।

प्रश्न 3. आपकी प्रिय विधा कौनसी है और क्यों ?

उत्तर : एक लेखक के रूप में, आज तक मैं जितना अपने आप को समझ पाई हूं, उस हिसाब से मैं कह सकती हूं कि कविता मेरे सबसे करीब है। कविता बहुत सहजता से मेरे भावों को कंसीव भी करती है और अभिव्यक्त भी। फिर देखिए ! इंसान हर पल बदलता है, इसलिए आगे का मुझे पता नहीं। हाँ, एक पाठक के रूप में, मैं गद्य खूब शौक से पढ़ती हूँ ।

प्रश्न 4. लेखन केवल कल्पना मात्र है या यथार्थ का समिश्रण भी है।

उत्तर : अगर लेखन कोरी कल्पना हुआ तो वह जीवन से बहुत दूर चला जाएगा और यदि सिर्फ यथार्थ की अभिव्यक्ति हुआ तो इतिहास सा तथ्यात्मक और बहुत खुरदरा हो जाएगा। मुझे लगता है साहित्य ना तो जीवन से दूरी है और ना जीवन की कोमलता को लहूलुहान कर देने वाला यथार्थ है। साहित्य तो यथार्थ की पथरीली जमीन में, जगत को सुन्दर बनाने वाले पुष्पों को खिलाने का सुनहरा सपना है। साहित्य तो मनुष्य की पीठ थपथपाने वाला प्रेरणा की ऊष्मा भरा वह हाथ है , जो जीवन में ऊर्जा भरता है। इसलिए साहित्य में यथार्थ भी शामिल है और कल्पना भी।

प्रश्न 5. आप जब अपने आस पास होने वाली किसी घटना को देखती हैं, महसूस करती हैं तो किस तरह से संवेदनाओं की अभिव्यक्ति परिपक्व होती है? क्या है आपकी रचना प्रक्रिया?

उत्तर : जो चल रहा है उसे देखना, महसूसना, समझना और फिर अभिव्यक्त करना, यह है मेरी रचना प्रक्रिया है। तत्काल कुछ नहीं घटता मेरे अंदर। कोई भी घटना, विचार, वस्तु या दृश्य पहले मेरे अंतस की भट्टी में पकता है, तब कहीं जाकर लेखन में अभिव्यक्त होता है।

प्रश्न 6. एक लेखक के लिए अध्ययन का कितना महत्व है?

उत्तर : अध्ययन ही तो लेखक को लेखक बनाता है। अध्ययन से ही लेखक अपनी जड़ों से जुड़ता है। अपनी परंपरा को पहचानता है। अध्ययन से ही लेखक को अपने -आप को समझने का मौका मिलता है। वह अपने लिखे की दिशा को भी अध्ययन के माध्यम से ही जान पाता है। बिना अध्ययन के लेखक दूर तक नहीं जा सकता।

प्रश्न 7. क्या आप मानती हैं कि पुरुष और महिला लेखन में फर्क होता है ?

उत्तर : अगर लेखक अपनी लेखन प्रक्रिया में ‘मनुष्य’ की तरह सोच पाता है तो निश्चय ही उसके लिखे में स्त्री लेखक और पुरुष लेखक जैसे खांचे नहीं हो सकते। अन्य स्थिति में तो आप कभी निरे नर, तो कभी कोरी मादा की तरह एकांगी ही लिख पाएंगे। याद रखना चाहिए कि ऐसा लेखन समाज और मनुष्य की सोच में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं ला सकता। मनुष्य को धर्म जाति, लिंग के खांचों में बांटकर देखना और लिखना, सही नहीं है। हाँ, कभी-कभी बहुत सुलझी हुई लेखिकाओं के लिखे में भी लिंग विशेष की तरफ झुकाव दिखता है, मेरी सोच में वह अंतर उनकी सोच के संकुचन का प्रमाण नहीं होता, बल्कि उनके अ नुभव की प्रामाणिकता या अनुभूति की इंटेनसिटी के स्तर के कारण दिखता है।

प्रश्न 8. आलोचना के स्तर को लेकर आप कितनी सहमत हैं? क्या आपको लगता है की आलोचना से सृजन में सुधार होता है?

उत्तर : यह एकदम सही है कि जिस गति से लिखा जा रहा है उस गति से मूल्यांकन नहीं हो रहा। लिखे का सम्यक मूल्यांकन होना बहुत जरूरी है। सम्यक मूल्यांकन से लेखक को तो दिशा मिलती ही है, लेखन में भी परिपक्वता आती है। जो लिखा गया है उसका मनुष्य और समाज के विकास में क्या योगदान है, यह सब भी आलोचना ही तय करती है। आलोचना बहुत जरूरी है।

प्रश्न 9. हाल ही में आपकी दो राजस्थानी कृतियों का लोकार्पण हुआ है जिसमें आपने ‘प्रेम’ को विषय रूप में चुना है।क्या कारण रहा इसका?

उत्तर : यह सब सम्यक आलोचना का ही कमाल है। मैंने तो बस लिखा। उन विषयों पर लिखा, जो मेरी संवेदना के तारों को झनझनाते रहे हैं। वैसे प्रेम सदा से कवियों का पसंदीदा विषय रहा है। यह एक ऐसा शाश्वत विषय है जिस पर खूब लिखा गया है और लिखा जाएगा। क्योंकि प्रेम ही तो वह धागा है जो सृष्टि की हर एक शै को दूसरे से जोड़े हुए है। प्रेम को एक वृहद परिप्रेक्ष्य में सोचना और अनुभव करना मुझे लुभाता है। बस इसीलिए .. ।

प्रश्न 10.  हिन्दी के वर्तमान लेखन में आप सबसे अधिक किस से प्रभावित हैं और क्यों?

उत्तर : कोई एक लेखक नहीं बता पाऊंगी। कविता में मुझे वरिष्ठ साहित्यकारों में डॉ नंदकिशोर आचार्य, और युवाओं में बाबुशा कोहली, के अलावा मणि मोहन, विवेक चतुर्वेदी बहुत भाते हैं। गद्य साहित्य में मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका, ममता कालिया, गीताश्री, मधु कांकरिया, मनीषा कुलश्रेष्ठ, प्रयाग शुक्ल और प्रभात त्रिपाठी को पढऩा मुझे अच्छा लगता है।

प्रश्न 11. आपने सबसे ज्यादा किसे पढ़ा है और किस साहित्य से प्रभावित रहीं है बताएं।

उत्तर : प्रारंभिक दौर में मैंने बंगाली लेखकों को खूब पढा। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय तो मेरे कॉलेज टाइम के अतिप्रिय लेखक हैं, जिन्होंने एक स्त्री के रूप में मुझे खुद पर गर्व करना सिखाया। रवीन्द्रनाथ टैगोर बंकिमचन्द्र चटर्जी भी पढ़े। हजारीप्रसाद द्विवेदी की लेखनी पर तो मैं बेमोल बिक जाऊँ। चाहे उनके निबंध हों या उपन्यास, सभी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। मैं उन्हें बार-बार पढती हूँ । फिर महादेवी वर्मा, रामधारी दिनकर, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, अज्ञेय और हरीश भादाणी जी के गीत भी मुझे भाते हैं । राजस्थानी साहित्य में देवदास रांकावत जी, अन्नाराम सुदामा के अलावा मधु आचार्य जी सहित समकालीनों को भी पढने की कोशिश करती हूँ।

प्रश्न 12. ‘अध्यात्म का जीवन से जुड़ाव’ इस बारे में आप क्या विचार रखती हैं ?

उत्तर : अगर खलकर कहूं तो अध्यात्म जीवन का वह आयाम है जो मनुष्य की चेतना के विकास से जुड़ा है। यह मनुष्य को अन्दर से ग्रोथ करता है। अध्यात्म मनुष्य के अस्तित्व को सम्पूर्ण सृष्टि के संदर्भ में परिभाषित करता है। बिना किसी संप्रदाय से जुड़े भी वह आपको सच्चे अर्थों में धार्मिक बनाता है क्योंकि तब आप सृष्टि के गरिमामय हिस्से के रूप में अपने आप को पहचानने का नजरिया प्राप्त कर लेते है। सभी में अनुस्यूत एकत्व के धागे को महसूस कर पाते हैं । अध्यात्म एक संपूर्ण मनुष्य होने का दायित्व आपके कांधों पर टांगता है। अगर इससे भी आगे कहूँ तो यह आपको सकारात्मक रूप से ट्रांसफार्म करता है।

प्रश्न 13 .आपके साहित्यिक जीवन से जुड़े कुछ ऐसे पल जो आपके लिए अविस्मरणीय हैं हमसे साझा कीजिये ।

उत्तर : जब मेरी किसी रचना को पढकर पाठक मुझे फोन करता है तो वह मेरे लिए बहुत आनंददायी पल होता है। ऐसा कई बार हुआ है। एक बात और- 2008 में जब आदरणीय सरल विशारद जी दैनिक भास्कर में थे, तब मैने अपना एक आर्टिकल छपने के लिए भेजा था। उस समय उनसे कोई परिचय नहीं था मेरा। आर्टिकल तो नहीं छप सका, क्योंकि वह अपेक्षित विधा में नहीं आ रहा था पर सरल विशारद जी के हाथ से लिखा एक पोस्टकार्ड मेरे ससुराल के पते पर मुझे मिला, जिसमें उन्होंने लिखा कि हमारे बंद समाज में किसी लेखिका ऐसा सोचना और लिखना मेरे लिए सुखद आश्चर्य है। आशीर्वाद के साथ उन्होंने मुझे लेखन से निरंतर जुड़े रहने की सलाह भी दी। यह मेरे लिए बहुत बडा कॉम्पलीमेंट था। आज भी वह पोस्टकार्ड मेरी फाइल में सहेज कर रखा हुआ है। दरअसल अपने लोगों की स्वीकृति बहुत मायने रखती है। क्योंकि यह एक खुरदरा सच है कि हम बहुत पास की चीजें नहीं देख पाते हैं। अपने नजदीक के लोगों को हम बहुत चलताऊ अंदाज़ में लेते हैं।

प्रश्न 14. स्त्री विमर्श के बारे में आपका क्या कहना है?

उत्तर : स्त्री के विषय में, स्त्री के दृष्टिकोण से कही गई बात स्त्री विमर्श है। ध्यान रखें कि यह सत्य का सिर्फ एक कोण है, संपूर्ण सत्य नहीं। संपूर्ण सत्य तो बहुत से कोणों के मिलने से बनता है। पर कभी-कभी जब हम संपूर्ण सत्य को समझने की प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं, तब अलग-अलग कोणों को समझना भी जरूरी होता है। और फिर स्त्री तो इस दुनिया का आधा महत्वपूर्ण अंग है, निश्चय ही उसका दृष्टिकोण मायने रखता है।

प्रश्न 15. एक महिला जब लिखती है तो उसको पढऩे वाले उसे उसकी जिंदगी से जोडऩे लगते है,ऐसा क्यों होता है और कहाँ तक सच है ?

उत्तर : लिखो और छोड़ो। जिसे जो सोचना है, सोचे।स्त्री को दूसरों की नजरों से अपना मूल्यांकन करना छोडऩा होगा। अपनी संवेदनशीलता को अपनी कमजोरी बनने से रोकना होगा।

प्रश्न 16. राजस्थानी भाषा को मान्यता न मिलने के पीछे आप क्या कारण मानती हैं ?

उत्तर : राजनीतिक इच्छाशक्ति का तो अभाव है ही।
जन साधारण की उदासीनता भी है। फिलहाल राजस्थानी की मान्यता का आंदोलन साहित्यकारों और कुछ पढ़े लिखे लोगों का आन्दोलन है। इसे जन सामान्य से कैसे जोड़ता जाए? इस पर विचार और क्रियान्वयन जरूरी है। आप गुजराती भाषाभाषियों को देखिए, कोई भी गुजराती चाहे कितना ही उच्च शिक्षित हो, बड़ी
निश्चिंतता के साथ अपने जीवन में गुजराती बोलता है और पढता है। इतने शानदार अखबार और पत्र- पत्रिकाएं गुजराती में निकलते हैं कि आप देख कर दंग रह जाएं। हमें भी पढने- लिखने और बोलने से कौन रोक सकता है? इतना हम करें तो सरकारों पर तो दबाव बनेगा ही। आज नहीं तो कल, जनसमूह की आवाज पर ज्यादा समय तक हथेली नहीं रखी जा सकती।

प्रश्न 17. साहित्यिक पुरस्कार के चयन के बारे में आपका क्या कहना है ?

उत्तर : बड़े लोगों की बड़ी बातें। कुछ ज्यादा नही पता। हाँ, इतना कह सकती हूँ कि योग्य के हाथ में सम्मान स्वयं सम्मानित होता है। जुगाड़ आदि के द्वारा अयोग्य के नाम के साथ जुडक़र सम्मान अपनी विश्वसनीयता खो देता है।

प्रश्न 18. आज जितना लिखा जा रहा है उतना पढ़ा नहीं जा रहा क्या कारण मानती हैं आप ?

उत्तर : आज का जीवन दृष्टिकोण! आज की भागम-भाग की जिंदगी और महत्वाकांक्षाओं से भरी जीवन शैली ने कौनसी अच्छी चीज हमारे जीवन में छोड़ी है? हम हर अच्छी चीज से दूर होते जा रहें हैं। तो किताबें भी दूर होंगी ही। हमें अपने घरों में पुस्तकें पढऩे का माहौल निर्मित करना होगा। बच्चों को बाल्यकाल से ही पुस्तकों से जोडऩा होगा।

प्रश्न 19. अपनी साथी महिला लेखिकाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी ?

उत्तर : ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले ख़ुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।। इतना अच्छा करें कि आपको नजऱअंदाज करना नामुमकिन हो जाए।

-चांदनी मेहता(चारू)

 हिन्दी में कविता और कहानी लेखन में विशेष रूचि,पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

कविता: रूको जरा,

ठहरो तो सही,

थम भी जाओ,

मौन क्यो हो,

कुछ तो बोलो,

तुम्हारी खामोशी,

तुम्हारा ये मौन,

कब तक आखिर कब तक,

सुनो रूको जरा,

कुछ तो बोलो,

चोका-चूल्हा ओर रसोई,

हर दम हर पल खोई खोई,

कभी तो अपने एहसासो को,

कभी तो अपने जज्बातो को,

छटपटाते,सुलगाते,अरमा को,

मुखर वाणी मे बह जाने दो,

सुनो रूको जरा,

ना डरो,कुछ तो हिम्मत करो,

ना मारो,ना मर जाने दो,

अपनी कोख में पलने वाली,

नन्हीं,कोमल,अजन्मी ,

निरपराध बालिका प्यारी सी,

लड़ना सीखो,लड़ जाओ ना,

अपने कदमों को मोड़ लो ना,

गलबहियाँ ड़ाल वो झूम लेगी,

तुम्हारी चिंता ओर परेशानी,

उनसे नही वो अन्जानी,

रूको जरा तुम,थम जाओ ना,

भ्रूणहत्या का पाप कमाओ ना,

रुक जाओ ना,

रुक जाओ ना

 

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