कथारंग : राजस्थानी साहित्य परिशिष्ट : 49

अरज : ‘लॉयन एक्सप्रेस’ लगौलग आप नैं खबरां सूं जोड़्यां राख्यौ है। इण सागै ई अब साहित रा सुधी पाठकां वास्ते भी कीं करण री मन मांय आई है। ‘कथारंग’ नांव सूं हफ्ते में दोय अंक साहित रे नांव भी सरू करिया है। एक बार राजस्थानी अर फेर हिंदी। इण तरयां हफ्ते में दो बार साहित री भांत-भांत री विधावां में हुवण आळै रचाव ने पाठकां तांई पूंगावण रो काम तेवडिय़ो है। आप सूं अरज है क आप री मौलिक रचनावां म्हांनै मेल करो। रचनावां यूनिकोड फोंट में हुवै तो सांतरी बात। सागै आप रौ परिचै अर चितराम भी भेजण री अरज है। आप चाहो तो रचनावां री प्रस्तुति करता थकां बणायोड़ा वीडियो भी भेज सको। तो अब जेज कांय री? भेजो सा, राजस्थानी रचनावां…

घणी जाणकारी वास्ते कथारंग रा समन्वय-संपादक संजय शर्मा सूं कानाबाती कर सकौ। नंबर है… 9414958700

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ऋतु शर्मा,  मोबाइल 9950264350

साहित्य सर्जण रे साथे समाज रे काम में भी सक्रिय, राजस्थानी-हिन्दी में बरोबर कहाणी कविता लिखै। मंच संचालण रो खासो अनुभव, लोक संस्कृति री चेतना जगावण वास्ते बणायोड़ी गणगौर समिति रा अध्यक्ष, युवा उद्यमी। सरला देवी स्मृति अर कर्णधार सम्मान सूं सम्मानित।

कहाणी  :  असर

राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय, शेरपुर में कक्षा 12वीं री छात्रा माधवी सात साल बाद पाछी शेरपुर में आई तो उणी स्कूल में सैकिंड ग्रेड टीचर ही। रोडवेज री बस सूं गांव री जमीं माथे पग धरियो तो मन हुयो जमीं ने निवण करे। वा नीचे झुकी अर रज ने आपरे माथे लगाय ली।
उण ने लखायो जाणै वा दुनिया रा उण भागसाळी लोगों में है, जकां ने इसा मोका मिळै। जिकी स्कूल में पढ़ी, बठै ई पढावणो।
साल भर पैली वा जद शिक्षा विभाग में लागी तो सोच्यो भी नीं हो क इयां भी हुय सके। घर आळा तो इणी में ई राजी हा क बीएड करता ही नौकरी मिळगी। सरकार बदळणे रे पछै बदळियां हुवण लागी तो माधवी रो नंबर भी लाग्यो। उण रे नांव रो आदेस आयो तो साथी बोल्या, ‘कीं लेय-देय’र आदेस रुकवाय लो…शेरपुर घणो अळघो है…’
पण माधवी मुळकती बोली, ‘म्हारे गांव सूं अळघो नीं…तीन किलोमीटर…’
स्कूल आळां ने ठाह पड़ी तो पार्टी हुई, माधवी ने सगळा बधाई दी। शेरपुर उण रे गांव सूं तीन किलोमीटर दूर हो अर माधवी रोजीना आपरी सखियां सागे रोडवेज री बस सूं स्कूल आवा-जावी करती। वे भी कांई दिन हा, बस री उडीक में जिके नीम री नींबोळी खावण नै सगळा नीम सूं झूम जांवता, वो नीम आज भी हरियो-भरियो हो। नीम ने देखतां ई उण री यादां रा पन्ना खुलगया। उण ने सै सूं पैली अशोक री याद आई। अशोक बांदरे आळे जियां नींम माथे चढ़ जांवतो हर नीचे नींबोळियां फेेंकतो। अशोक…अब कठै हुवेला? वे भी कांई दिन हा, बस री उडीक में जिके नीम री नींबोळी खावण नै सगळा नीम सूं झूम जांवता, वो नीम आज भी हरियो-भरियो हो। नीम ने देखतां ई उण री यादां रा पन्ना खुलगया। उण ने सै सूं पैली अशोक री याद आई। अशोक बांदरे आळे जियां नींम माथे चढ़ जांवतो हर नीचे नींबोळियां फेेंकतो। अशोक…अब कठै हुवेला?  वा स्कूल रे अेन साम्हीं खड़ी ही। स्कूल रो वो ईज बोर्ड। वो ईज फाटक अर वो ही मैदान, जठे झंडारोहण हुया करतो हो। वा प्रिंसीपल रे कमरे कांनी गई तो लागे हो क आज भी वा अठै पढ़ण वाळी माधवी है, जिकी प्रिंसीपल ने परेसान करबा जचे जद पूग जांवती। कदै स्कूल री छुट्टी बेगी करण री बात करती,  तो कदेई छोरा री शिकायता। क्यूंके छुट्टी रे पछै रोडवेज बस पूण घंटा बाद ई आंवती। अर जे 20 मिनट पैली छुट्टी हुय जांवती तो बस पांच मिनट बाद ही मिळ जांवती। प्रिंसीपल आशुतोष झा उण ने देखतां ई केंहता आयगी नेती, तू तो सरपंच बण जाये। माधवी चौधरी, रोल नंबर 24 कक्षा बारहवीं ए।  प्रिंसीपल रे कमरे साम्हीं गई तो कुर्सी माथै आशुतोष झा ई बैठ्या हा। उण में कीं घणों बदळाव नीं आयो। दूबळा तो वे पैली भी हा अर आज भी लाग्या। हरखीजती माधवी बोली, ‘मे आई कम इन सर…’‘कम इन…’ ‘सर, वो कांई है क म्हारी कक्षा में छोरा पढ़ाई करण नीं दे, आप छोरा अर छोर्यां री क्लासां न्यारी-न्यारी कर दो… ’प्रिंसीपल चैरो उठायो। साम्हीं खड़ी छोरी री आवाज तो सैंधी ही पण डील सूं वा छोरी नीं लुगाई लागे ही। लाल बोर्डर री असमानी साड़ी में ऊभी आ कुण हुय सके। ओ सवाल आशुतोष झा मन ई मन करियो, जित्तै ई माधवी बोलगी, ‘पाय लागूं… म्हैं माधवी चौधरी। माधवी चौधरी, रोल नं. २४, कक्षा बारहवीं अे। पिछाणो म्हनैं…’ केंवता माधवी आशुतोष झा रे पगां लागी तो झा सर आपरे पुराणे अंदाज में बोल्या, ‘अरे नहीं-नहीं, दूर रहो बेटी। हमारे यहां कन्याएं पैर नहीं छूती…और तुम तो साक्षात् देवी हो…माधवी…बैठो-बैठो।’माधवी वास्ते आ नूंवी बात नी ही। वे इसी ई बातां करता। ‘सर…म्हारी ज्वाइनिंग…’‘अरे वाह भाई…गजब…’आशुतोष झा रे चैरे पर जियां रोसनी बधगी हुवै, वे घंटी बजाई। कमला बाई दौड़ती आई तो बोल्या, ‘अरे सभी को बुलाओ भई…देखो यहां शिक्षक बनकर कौन आया है…’कमलाबाई माधवी ने गौर सूं देखतां बोली, ‘तू मधी है नीं…किसनारामजी री बेटी’ माधवी आगे बधी अर पगेलागणां करिया तो कमलाबाई रा कंठ भर आया। थोड़ी देर में तो प्रिंसीपल रूम में सगळा हा। घणखरो स्टाफ वो ई हो। दो-तीन रिटायर हुया हा अर कीं री बदळी। ‘…म्हनैं जियां ई शेरपुर रो आदेस मिळियो, खुद ने रोक नीं सकी…आप सब म्हारा गुरुजन हो…आपरे कारणे ई म्हैं अठै तांई पूग सकी हूं…निवण है आप सब ने’सगला ताळियां सागे माधवी रो स्वागत करियो। आशुतोष झा तो हरख सूं भरिया घरां सनेसो करवाय दियो क माधवी घरां ई जीमेला। ‘माधवी बेटा, अब आप कमला बाई के साथ मेरे घर जाओ, वहां कुछ देर विश्राम करो, भोजन करने के बाद चाहो तो निकल जाना, कल से आपको विधिवत् रूप से कक्षाएं लेनी हैं…’‘म्हैं आज सूं भी त्यार हूं सर…’‘कल से…’ आशुतोष झा रो आदेस हो।‘जी सर’कमला बाई सागै प्रिंसीपल कक्ष सूं बारै नीसरी तो माधवी बोली, ‘बाई जी अेक बार पूरी स्कूल तो दिखा दो…देखूं तो सरी सात साल में कांई कांई बदळ्यो है…’‘घणो ई बदळग्यो बेटी…’‘वो तो म्हनैं भी दीसे…’‘पण तू नीं बदळी…’‘याद नीं आवै वे दिन…’माधवी ने लाग्यो जाणै वे दिन केंवती कमला बाई अेक कांटो लगायो है। उणरी बातां ने समझणे री कोसिस करती माधवी बोली,‘..समै रे सागै बधणो ही समझदारी है कमला बाई…’ वे भी कांई दिन हा, बस री उडीक में जिके नीम री नींबोळी खावण नै सगळा नीम सूं झूम जांवता, वो नीम आज भी हरियो-भरियो हो। नीम ने देखतां ई उण री यादां रा पन्ना खुलगया। उण ने सै सूं पैली अशोक री याद आई। अशोक बांदरे आळे जियां नींम माथे चढ़ जांवतो हर नीचे नींबोळियां फेेंकतो। अशोक…अब कठै हुवेला? वे भी कांई दिन हा, बस री उडीक में जिके नीम री नींबोळी खावण नै सगळा नीम सूं झूम जांवता, वो नीम आज भी हरियो-भरियो हो। नीम ने देखतां ई उण री यादां रा पन्ना खुलगया। उण ने सै सूं पैली अशोक री याद आई। अशोक बांदरे आळे जियां नींम माथे चढ़ जांवतो हर नीचे नींबोळियां फेेंकतो। अशोक…अब कठै हुवेला?  वा स्कूल रे अेन साम्हीं खड़ी ही। स्कूल रो वो ईज बोर्ड। वो ईज फाटक अर वो ही मैदान, जठे झंडारोहण हुया करतो हो। वा प्रिंसीपल रे कमरे कांनी गई तो लागे हो क आज भी वा अठै पढ़ण वाळी माधवी है, जिकी प्रिंसीपल ने परेसान करबा जचे जद पूग जांवती। कदै स्कूल री छुट्टी बेगी करण री बात करती,  तो कदेई छोरा री शिकायता। क्यूंके छुट्टी रे पछै रोडवेज बस पूण घंटा बाद ई आंवती। अर जे 20 मिनट पैली छुट्टी हुय जांवती तो बस पांच मिनट बाद ही मिळ जांवती। प्रिंसीपल आशुतोष झा उण ने देखतां ई केंहता आयगी नेती, तू तो सरपंच बण जाये। माधवी चौधरी, रोल नंबर 24 कक्षा बारहवीं ए।  प्रिंसीपल रे कमरे साम्हीं गई तो कुर्सी माथै आशुतोष झा ई बैठ्या हा। उण में कीं घणों बदळाव नीं आयो। दूबळा तो वे पैली भी हा अर आज भी लाग्या। हरखीजती माधवी बोली, ‘मे आई कम इन सर…’‘कम इन…’ ‘सर, वो कांई है क म्हारी कक्षा में छोरा पढ़ाई करण नीं दे, आप छोरा अर छोर्यां री क्लासां न्यारी-न्यारी कर दो… ’प्रिंसीपल चैरो उठायो। साम्हीं खड़ी छोरी री आवाज तो सैंधी ही पण डील सूं वा छोरी नीं लुगाई लागे ही। लाल बोर्डर री असमानी साड़ी में ऊभी आ कुण हुय सके। ओ सवाल आशुतोष झा मन ई मन करियो, जित्तै ई माधवी बोलगी, ‘पाय लागूं… म्हैं माधवी चौधरी। माधवी चौधरी, रोल नं. २४, कक्षा बारहवीं अे। पिछाणो म्हनैं…’ केंवता माधवी आशुतोष झा रे पगां लागी तो झा सर आपरे पुराणे अंदाज में बोल्या, ‘अरे नहीं-नहीं, दूर रहो बेटी। हमारे यहां कन्याएं पैर नहीं छूती…और तुम तो साक्षात् देवी हो…माधवी…बैठो-बैठो।’माधवी वास्ते आ नूंवी बात नी ही। वे इसी ई बातां करता। ‘सर…म्हारी ज्वाइनिंग…’‘अरे वाह भाई…गजब…’आशुतोष झा रे चैरे पर जियां रोसनी बधगी हुवै, वे घंटी बजाई। कमला बाई दौड़ती आई तो बोल्या, ‘अरे सभी को बुलाओ भई…देखो यहां शिक्षक बनकर कौन आया है…’कमलाबाई माधवी ने गौर सूं देखतां बोली, ‘तू मधी है नीं…किसनारामजी री बेटी’ माधवी आगे बधी अर पगेलागणां करिया तो कमलाबाई रा कंठ भर आया। थोड़ी देर में तो प्रिंसीपल रूम में सगळा हा। घणखरो स्टाफ वो ई हो। दो-तीन रिटायर हुया हा अर कीं री बदळी। ‘…म्हनैं जियां ई शेरपुर रो आदेस मिळियो, खुद ने रोक नीं सकी…आप सब म्हारा गुरुजन हो…आपरे कारणे ई म्हैं अठै तांई पूग सकी हूं…निवण है आप सब ने’सगला ताळियां सागे माधवी रो स्वागत करियो। आशुतोष झा तो हरख सूं भरिया घरां सनेसो करवाय दियो क माधवी घरां ई जीमेला। ‘माधवी बेटा, अब आप कमला बाई के साथ मेरे घर जाओ, वहां कुछ देर विश्राम करो, भोजन करने के बाद चाहो तो निकल जाना, कल से आपको विधिवत् रूप से कक्षाएं लेनी हैं…’‘म्हैं आज सूं भी त्यार हूं सर…’‘कल से…’ आशुतोष झा रो आदेस हो।‘जी सर’कमला बाई सागै प्रिंसीपल कक्ष सूं बारै नीसरी तो माधवी बोली, ‘बाई जी अेक बार पूरी स्कूल तो दिखा दो…देखूं तो सरी सात साल में कांई कांई बदळ्यो है…’‘घणो ई बदळग्यो बेटी…’‘वो तो म्हनैं भी दीसे…’‘पण तू नीं बदळी…’‘याद नीं आवै वे दिन…’माधवी ने लाग्यो जाणै वे दिन केंवती कमला बाई अेक कांटो लगायो है। उणरी बातां ने समझणे री कोसिस करती माधवी बोली,‘..समै रे सागै बधणो ही समझदारी है कमला बाई…’‘जणां ई तो…थनै देख’र लागे है…’‘कांई लागे…’‘कीं नीं…म्है तो अेक बात बतावणी चावूं क इण गांव रो स सरपंच इण दिनां अशोक है…’‘अशोक…वो बांदरो…’ माधवी पूछ्यो। ‘हां, जको सगळां रे बीचै केंवतो, ब्यांव करसूं तो माधवी सूं…अर तू उण ने केय दियो क 12 पास हुज्यावै तो बात करी…नीं जणै मूंडो ना दिखाइ…’‘हुई क नीं उण री बारवीं…’‘हुया करै…थारै जांवता ई तो कीं दिन मन लगाय’र पढ़ाई करी…फेर भी पार नीं लागती दिसी तो राजनीति करण लाग्यो….घणो अदावे झा साब ने…’‘क्यूं…’‘वो केवै क जे प्रिंसीपल चांवतो तो पैली बार में ही बारवीं पास हुय सकतो हो…’ कमलाबाई बोली। ‘चोखी बात है…फेर ब्यांव करियो क नीं…’‘थे कर लियो?’माधवी कीं नीं बोली‘उण ने थां जिसी कोई दूजी नीं मिळी…’माधवी ने धक्को लाग्यो। उण ने लाग्यो क कठैई शेरपुर आवण रो उण रो फैसलो गळत तो नीं है। उण रे साम्हीं अशोक सूं जुडिय़ा सै परसंग आवण लाग्या। मांय बैठ्यो डर हावी हुवण लाग्यो। वा बोली, ‘प्रिंसीपल सर रे घरां चालां…’कमलाबाई प्रिंसीपल रे घरां छोड’र गई पण अशोक री बात्यां माधवी रे गळे घालगी। गांव में ही प्रिंसीपल एक किराये रे घर में आपरी जोड़ायत सागै रेंवता। बेटे री अहमदाबाद में नौकरी ही। प्रिंसीपल सर रो दो साल बाद रिटायरमेंट हो।  दोनूं डेण आप रो समै निसारे हा। झा साब री जोड़ायत माधवी ने देख’र  घणी हरखी। माधवी ने लाग्यो क अब थोड़ी देर आराम करणो चाइजै। उण वास्ते अेक कमरो खोल दियो पण कमलाबाई उण री यादां ने छेड़ दी ही। यूं लागे हो जियां क यादां री बरसात हुवण लागी। अशोक नीम रे डाळे ने जोर सूं हिलावंतो अर नींबोळियां झर-झर नीचे आवण लागती। माधवी, लिछमी, राधा अर सरोज हुवो चाये सूरज, विजय आद। रोडवेज री बस आवण सूं पैली नींबोळियां री लूट मचती अर फेर गांव तांणी नींबोळियां सागे मारग कटतो। ‘अशोक अजे तांणी ब्यांव नीं करिया…पण क्यूं’ माधवी मन ई मन में सवाल करियो। उण ने सवाल रो जवाब नीं मिळियो। ‘कठैई उण ने उडीक तो नीं है…?’‘गेली बातां करे है तू भी…’सोच रे सागर में डूबती-तिरती माधवी आपरे की सवालां साम्हीं ही हार चुकी है, उण री आंख लागण आळी ही क झा साब री आवाज सुणीजी। ‘अरे देखिये तो आज हमारे घर कौन आए हैं…’‘पाय लागूं ताईजी…’ अेक आवाज जाणी-पिछाणी सी माधवी रे कानां में पड़ी। माधवी उठ’र कमरे सूं बारै आई तो झा साब रे सागे अशोक खडिय़ो हो। अशोक उण ने देखे अर वा अशोक ने। साफो बांध्यो अशोक कीं मातो लागे हो। माधवी ने देखतां ई हाथ जोड़तां बोल्यो, ‘स्वागत है सा…आपरी स्कूल में आप रो स्वागत…’माधवी इचरज में ही, मन री घबराहट ने लुकांवता बोली, ‘अ-अ-अशोक’‘हां हां मैं अशोक—‘अशोक…ओ कांई भेस बणाय लियो है?’‘सरपंच हां…’ अशोक अकड़तो बोल्यो। ‘वा तो ठीक है, पण अे साफा बीजा, हर समै?’‘लागणो चाइजै…’ अशोक री बात पूरी हुंवती क माधवी बोल पड़ी, ‘लाग्या रे लाग्या…. हाल थारी आदत नीं गी…कांई चोखां लागे…’अशोक बोल्यो, ‘बांदरे सूं तो ठीक हूं…’माधवी सरम सूं लाल हुयगी।  ‘चालो भाई, भोजन करां…’ झा साब बोल्या।
‘माधवी, स्कूल में पढ़ावण आई है क फरला…’
‘ना रे किसा फरला, अर फेर सरपंच थारे जिस्यो हुवै तो मरणो है कांई…’
‘फेर रेवण री वैवस्था…’
अशोक रो सवाल वाजब हो। गांव में तो अब कोई नीं हो। पापा री मिरतु रे बाद मां अर माधवी स्हैर में जाय बसी। गांव में तो कांई करता। स्हैर में माधवी री पढ़ाई भी ठीक सूं हुयगी। अशोक रे सवाल पर माधवी सोचती बोली, ‘अपडाउन ही करसूं…दो घंटा भर रो रास्तो है सैर रो…’
‘इयां थोड़ी हुवै…नौ बजी री स्कूल में सात बजी घर सूं निकळो अर पांच बज्यां घरां पूगो…’
‘तो कांई हुयो…नौकरी तो करणी ही पड़सी…’
‘पैली ई केयो, नौकरी ना करी…’
‘थारे जियां सरपंच कुण बणांवतो’
‘पांच साल री सरपंची…फेर?’
‘आ तो राजनीति री सरुआत है…’
‘अरे भई भोजन करो, भोजन में विलंब नहीं होना चाहिए।’ इयां केंवता झा साब दोनूं ने जीमण वास्ते बुलाया।
जीमतां-जीमतां भी दोनां में बातां चालती रैयी। अशोक बतायो क सिंझ्या उण ने जयपुर वास्ते निकळणो है तो स्हैर में छोड देसी। माधवी कीं कहती उणसूं पैली ई अशोक बोल्यो, ‘कोई हर्ज हुवै नीं तो…’
‘नीं इसी कोई बात नीं है…’
जीमणे रे बाद अशोक माधवी ने लेय’र पंचायत गयो। सरपंच साब अर मैडम री वठै घणी आवभगत हुई। माधवी रो गांव भी दूर नीं हो, उण रे पिता किसनाराम ने सगळा जाणता हा। अशोक आपरे कमरे में माधवी सागे पूग्यो तो आपरी कुर्सी माथै नीं बैठ कने पडिय़े सोफे पर माधवी सागे बैठग्यो।
माधवी बोली, ‘अरे खुद री कुर्सी पर बैठ…’
‘नीं…अठै ई ठीक हूं…’
‘अरे म्हैं देखणो चावूं…कुर्सी माथै बैठ्यौ बांदरो कियां लागै…’
‘फेर ठीक है…’ संको करतो अशोक आपरी कुर्सी माथै बैठ्ग्यो तो माधवी री आंख्यां सजळ हुयगी।
‘आज घणीं राजी हूं…’
‘तो वादो करो…’
‘कांई…?’
‘अबकी बारवीं पास हुय जाऊं’
‘सारो गांव भूंडेला…’
‘इण बात री म्हनैं कीं फिकर नीं है…’
माधवी बात ने घुमावणी चावै ही। उण ने ठाह हो क अबै अशोक कांई बात कर सके। अशोक रो जवाब सुण’र माधवी चुप हुयगी।
‘तो कांई सोच्यो?’
‘सात साल हुयग्या…बावळी बातां मत कर…’
‘म्हनैं बारवीं करणी है बस…जे आ बावळी बात है तो है…’
सुणतांई माधवी रे चैरे माथै पसीनो चिलकबा लाग्यो। उण रे साम्हीं कीं चितराम बणना सरू हुया। उण ने लाग्यो जियां कमरो घूम रैयो है। वा खुद री सांभ करतां बोली, ‘पाणी…’
अशोक घंटी बजाय’र पांणी मंगायो जद तांणी माधवी खुद ने सांभ लियो हो। पाणी पीवण रे बाद उण रे चेरै पर कीं सांयती निजर आई तो अशोक पूछ्यो, ‘कांई हुयो…?’
‘कीं नी…’
‘बारवीं करणी है…’
‘पण क्यूं करणो चावै?’
‘था री चावना ही नीं…’

‘वा तो मजाक री बात ही…’
‘जाणूं हूं…पण म्हनैं लागे मजाक नीं ही…’
‘कमलाबाई बतावे ही क माधवी भी ब्यांव नीं करिया…’
‘इण रो मतलब ओ तो नीं है क म्हनैं थारी उडीक है…’
‘तो कांइ हुय सके…देखो म्हें भी ब्यांव नीं करिया…’
‘पण म्हारा ब्यांव हुयग्या है।…’
‘पण कमलाबाई तो बतावे ही…’
‘उणां ने म्हैं ही बतायो…’
‘कूड़?’
‘केई दफै कूड़ बोलण में ई सार हुवै।’
‘तो साच कांई है…’
‘ब्यांव हुयो पण छोड दी म्हनंै…परित्यक्ता कोटे सूं टीचर बणी हूं…’
‘कुण सूं…अर छोडी क्यूं…’
‘जूनी बात है अशोक…अबार जावण दे…’
‘म्हनैं सुणनी है..’
‘वो भी बारवीं पास नीं हो, ब्यांव हुंवता ई म्हैं उणने बारवीं पास करावणी चाही…’
‘फेर…’
‘वो बोल्यो क घणी आवै थारे जिसी…’
‘ओह…’
‘म्हैं उणीं रात वो घर छोड आई…’
उण दिन थारी बोत याद आई। मन खराब हुयो तो बो हुयो। ठाह है अशोक, उण सूं म्हारो बाळपणै में ही ब्यांव हुयग्यो हो। पढ़ ली तो पिताजी ने चिंता ही क कठै ई वचन नीं जावै। वे मां सूं कौल करायो क माधवी रा ब्यांव चैनारामजी रे बेटे राजेश सूं हुवै। म्हैं मां री बात राखी, पण वो म्हारी बात नीं राख सक्यो।
माधवी आ केंवती आपरी निजरां नीची कर ली। अशोक कनै कोई जवाब नीं हो। पंचायत रो चपरासी चाय बणाय ने लेय आयो।
‘लो चाय पीयो, फेर स्हैर चालां…’
माधवी चाय ने देखी फेर अशोक ने देख्यो अर मुळक दी। ‘अठै आई जणां घणी खुस ही। आपरी स्कूल अर आपरा लोगां रे बीचै हूं…पण म्हनैं लागे क म्हैं इण स्कूल में नीं पढ़ाय सकूंला…’
‘क्यूं…इसी कांई बात हुई…’
‘बात तो कीं नीं…पण भोळेपण में कयोड़ी बात गांव में आज भी चाले है..’
अशोक कीं देर सोचतो रैयो अर फेर आपरी गाडी कनै आय’र बोल्यो, ‘बात तो साची है, पण जे अशोक बारवीं करे ई नीं तो ? …चालो गाडी त्यार है…’
माधवी उण ने देख्यो अर गाडी मांय बैठगी। दो घंटां री इण जातरा ने दोनूं अेक-दूसरे सूं कीं नीं बोल्या। स्हैर में आवतां ई माधवी अशोक ने आपरे घर रो मारग बतावणी लागी। घर रे आगे छोड’र अशोक जावण लाग्यो तो माधवी बोली, ‘काल समै सर आय जासूं सरपंच साब…अर आप जयपुर सूं आवतां ई त्यार रैया… बारवीं पास करणी है।’
अशोक ने जाणे कांई हुयो, वो माधवी साम्हीं हाथ जोड़ दिया। जयपुर री सडक़ां माथे अशोक री गाडी फर्राटा भरे ही। आज उण में हरख अणमाप हो।

नगेन्द्र नारायण किराड़ू,   मोबाइल नम्बर 9460890205

राजस्थानी अर हिन्दी में कवितावां-कहाणियां लिखै साथै चोखा चित्रकार भी है। कई पत्र-पत्रिकावां में लेखनी प्रकाशित हूवै। अबार आपरे पिताजी स्व. भगवान दास किराड़ू रे साहित्य ने आम जन तक पहुचाणें रा लक्ष्य हाथां मे ले राख्यो है। रोजगार विभाग में काम करै है।

 

कविता  :  चांद रै मांय सूरज

 

थारी ललाटी री टीकी

 इयां लागै

जाणै चांद माथै सूरज

पळ-पळ करतो हींगळू

पळका मारै

नीं देख सकै

कोई भी कामी मिनख

थारै चैरै रो पळको

आंसुवां रै दिवलै सूं

उतारूं थारी आरती

थारै माथै री आकाशगंगा रै

 मांय लाल रंग

ऊषा री कमी पूरी करै

थारी पलकां रो झपकणो

आभै में बीजळी

दांई चमकै

अर हूं पढ़ लूं

बी चमकै रै मांय

 थारा समाचार

कै कद आवोला

म्हारै घरां भरतार।

 

कविता  :  जीवण

 

ना लिखणो आयो

ना पढणो आयो

ना हरैक तरै सूं

आगै बढणो आयो

आयो तो खाली

पिघळणो आयो

दिन-रात

भूखो-तिस्सो

खाली मरणो आयो

साची लिखूं

आज रै मिनख दांई

नीं आयो

दोगलो पण

सगळा सूं हाथा-जोड़ी कर

नेक नीयत सूं

जींवतो रैऊं औ

नीरस जीवण।

व्यास योगेश “राजस्थानी”,   मोबाइल : 8302242401

राजस्थानी अर हिंदी माय लगो लग लिखता रेवै। आप रै सम्पादन मांय हिंदी अर राजस्थानी माय नुवे लिखारा रो साझा काव्य संकलन भी देखण में आयो है । आप साहित्यिक पत्रिका मरु नवकीरण रै युवा विशेषंक रा अतिथि सम्पादक भी रिया।

 

लघुकथा :  महाराज बुलवा लियौ वकील…

आज बेला महाराज दिनुगे सूं ही घणा राजी हो रह्या हा। नहा धो’र दुकान पूग्या अर दुकान रै सामी पड्यो अखबार उठार बाचण लाग्यां, फटा -फट पन्ना पलटियां अर अखबार फेंक दियो।
अखबार रै साथै ही महाराज रो मुंडो भी उतरग्यो। बै घने दुखी मन सूं दुकान तो खोली पण नी झाड़ा झड़कावां नी कोई धूप अगरबत्ती, बस दुकान खोल’र चेला नै उडिकण लाग्यां।
साथै साथै अखबार कानी देखे अर बांणै नै चाण्डाळी चढ़े । थोड़ी ही देर मांय धीरे धीरे चेला भेळा हुवण लाग्या। सगळा चेला एक बीजे नै पूछे कि,’ महाराज आज उदास कियां है? आज सूं पैली तो महाराज ने कदेइ उदास नी देख्यो?”
पण आपस में खुस-फुस करे महाराज सूं पुछण रो कैरोई काळजो नी पड़े । चेला आपस मांय खपत कर ही रह्या हा इत्त में हरमेस ज्यूं रोळिया महाराज रुळता रुळता दुकान आ धमकियां।
रोळिया महाराज आज बेला महाराज नै शांत देख’र चेला ने पूछ्यो , “आज महाराज इता शांत कीकर है ?” चेला नसड़ी हिलावतां बोल्यां,”ठा नी महाराज, आज तो आया जणे सूं ही महाराज दुखी लागै। ”
रोळिया महाराज सूं पूछे बिना नी रहिजयी । रोळिया महाराज किं पूछता इत्ती ताल में एक वकील साब दुकान में आया, अर बेला महाराज री कुर्सी कनै बैठ गया। वकील साब ने देखतां ही चेला डर गया । वकील साब बेला महाराज नै पूछयो की, ‘काईं बात हुगी आज म्हारी जरूरत कियां पड़गी? ”
चेला भी सोचियो अबै तो आपांनै ठा पड़ जासी की, महाराज किन कारण उदास है ।
बेला महाराज आपरै दुख री गाथा सुणावण लाग्यां। महाराज बतायो की म्हैं परसो एक जळसे में घणो तैयार होर गयौ , लम्बो चोड़ो भाषण भी दिय,पण अगले दिन रै अखबार में कोई न्यूज़ नी ही । जद म्है संस्था रे पदाधिकारियों ने फोन मिलायो अर प्रेस विज्ञप्ति रो पूछ्यो तो ठा पड़ी कि काल मोड़ो होवणे रै कारण न्यूज़ नी लागी, काल रै अखबार में लगासी ।
म्है भी सोचियो आ तो स्वभाविक बात है पण आज म्है दिनुगे अखबार देख्यो तो न्यूज़ तो ही पण म्हारौ नांव कोनी हो मैं फेरू संस्था फोन कर पूछ्यो तो बै बतायो कि संस्था री विज्ञप्ति में तो सगळा रा नाम दिया है।
आ बात बोल’र बां पल्लो छाड़ लियो। म्हारौ नाम आज सूं पैली भी अखबार वाळा पांच सात बार काट चुक्या है, मन्नै अखबारवालां माथै मान-हानि रो दावों करणों है।”
आ बात सुणतां ही वकील साब माथै तईडो लियो अर हंसता – हंसता दुकान सूं निकळ रवाना हो गया।
चेला महाराज ने याद दिरायो कि दुकान मंगळ करने रो टेम हुग्यो। बेला महाराज भारी मन सू उठया बांरै लारै-लारै सगळा उठ’र आप आप रै घरां टूरग्या ।

लघुकथा :   मिनखपणो

आसाढ़ उतर’र सावण लाग्यो ही हो अर इंदर भगवोन भी आपरीमौजूदगी देखवण खातर छाटा नाखणा चालू कर दिया हां। छाटा रुकते ही घर आळा धक्का देर म्हनै घर सूं दूध लेवण नै भेज्यौ। म्है घर सूं निकळर देख्यो की चारां खानी कादो कीचड़ पाणी बे रियो है खाडा में भरिजियोडो पानी आवति जावती मोटर गाड्या रै चक्का सूं टकर- टकर उछळ रियो है म्है देख ही रियो थो जतां ही म्हारा पुराणा बेली रामलाल जी म्हनै देखने म्हारै खने आया अर पसवाड़े खड़ा हुग्यां । म्है बानै देखते ही पूछ्यो अर भाईसाहब काइ हाल चाल है….??
सब सही है -रामलाल जी बोल्यां
म्हनै तो कि सही नही लाग रियो है देश मॉय आपने क्या सही लाग्यो बताओ देखांण बै पाछा बात फोरता थकां पूछ्यो आप तो लिखारां बण गया! वैसे काइ लिखो आप …???
म्है सामे खाड़े ने देखतो बोल्यो जकी चीज़ खाड़े मॉय आय पड़े बीने लिख दा। अबार खाड़े में क्या है ….??? रामलाल जी पूछ्यो
-अबार तो खाड़े रा भाग खुलोड़ा है तरा तर भरोडो है
– फिर भी एक एक आधो म्हनै भी बता दो
मनखपणो, संवेनावां ,नेह, लोकतंत्र

 

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