अरज : ‘लॉयन एक्सप्रेस’ लगौलग आप नैं खबरां सूं जोड़्यां राख्यौ है। इण सागै ई अब साहित रा सुधी पाठकां वास्ते भी कीं करण री मन मांय आई है। ‘कथारंग’ नांव सूं हफ्ते में दोय अंक साहित रे नांव भी सरू करिया है। एक बार राजस्थानी अर फेर हिंदी। इण तरयां हफ्ते में दो बार साहित री भांत-भांत री विधावां में हुवण आळै रचाव ने पाठकां तांई पूंगावण रो काम तेवडिय़ो है। आप सूं अरज है क आप री मौलिक रचनावां म्हांनै मेल करो। रचनावां यूनिकोड फोंट में हुवै तो सांतरी बात। सागै आप रौ परिचै अर चितराम भी भेजण री अरज है। आप चाहो तो रचनावां री प्रस्तुति करता थकां बणायोड़ा वीडियो भी भेज सको। तो अब जेज कांय री? भेजो सा, राजस्थानी रचनावां…
घणी जाणकारी वास्ते कथारंग रा समन्वय-संपादक संजय शर्मा सूं कानाबाती कर सकौ। नंबर है… 9414958700
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स्व. गिरधारी लाल मालव
हाड़ौती अंचल रा लूंठा कहाणीकार गिरधारीलाल मालव रो राजस्थानी साहित में महताऊ योगदान है। आप गीत-गजल भी लिखता। 24 अक्टूबर 1937 में जलम्यां मालवजी 4 सितंबर 2016 में परलोक सिधारिया।
कहाणी : थारो घर संभाळ
ऊंका इसकूल की छुट्ट्यां होगी छी। फीर का लोगां सूं मलबा की ताण’र लोल्या लाग’री छी। मनख आपणी जनम भूम सूं दूरै होवै अर साता मं होवै तो आपणा सुखी जीवण ईं दरसाबा की घणी हूंस रै छै। कोई दन दुख सूं सूख’र कांकळ होयो डील आज सब सुख पार भर्यो-भर्यो ओप र्यो छो। वां दनां मं जे गांव खाबा दोड़ै छो ऊ आज सुख सूं तरपत मन की आंख्यां सूं बनराबन लागर्यो छो। ऊंनै अेक बड़ा सूट केस मं ओढ़बा-प्हरबा का कपड़ा भर्या अर नजीक ऊबी म्हारी सासू सूं मुळक’र बूझी – आप क्ह दे तो म्हूं म्हारा फीर नै मल्याऊं दो-च्यार दन? सारा जमारा मं आज प्हली बार बू की आडी सूं मल्यो घर को बड़ो-बूढ़ो मनख होबा को भाव भर्यो सनमान सासू ई रगळ-पगळ करग्यो। ऊंनै बछटण का दुख सूं गळेडू भरी आंख्यां ईं पल्ला सूं पूंछ’र माथै हाथ फेर्यो अर गळगचां होया गळा सूं बोली – बेगी ई आजे। थारी घणी याद आवैगी। म्हीं बी ऊं दन ई या बात समझ मं आई कै सांची प्रीत मनख ईं कतनै ऊंडै तांई भजो दे छै। ऊंको बी दादरो भर्यायो। म्हूं भर्या गळा सूं बोली – म्हूं बी आपनै अकेला छोड’र न्ह जाती पण कसोरपरा सूं दो-तीन बार मलबा आबा का समचार आग्या। सांची बात तो या छै कै म्हीं बी ताण’र याद आरी छै घरकां की। आप तो सब जाणो छो। फीर का तो रूंखड़ा बी कतना प्यारा लागै छै।
धूळ उड़ाती ज्यां गळ्यां मं बाळपणा की भाइल्यां की लारां छीणा-पाती खेली छी वै सदां ई मन मं बसी रै छै। फीर को यो सारो सुख तो आपनै बी भोग्यो होगो? होयाऊं छूं थोड़ा सा दन? लाड भर्या आपका भाव की बी घणी याद आवैगी। ओर की तो म्हूं कांईं जाणू पण म्हारी माई सूं बी सवाई माई यां म्हीं थांका रूप मलगी। फेर वांका पगां या क्हर छ्या कै होयाऊं छूं। होतो-होतो ई काम करज्यो। जादा पचैगा तो बेमार पड़ ज्यागा। समळर रीज्यो। जद म्हूं वां की लारां टेक्टर मं बैठ’र गांव मं उळी तो घणी बायरां नै तो ऊंको घूंघटो उघाड़-उघाडऱ देखी पण नीठ पछाण मं आई। रूपाळो मुळकतो गोळ उणग्यारो वां नै देख्यो ई न्ह छो। परण्या पाछै भोग्या दुख सूं पचक्या गाल अर पपड़ाया होटां को संवळायो मोळायो उणग्यारो वांकी आंख्यां मं बसर्यो छो। जे भरी जवानी को भरपूर सुख भोगतो मुळकतो गदरायो उणग्यारो बेगां-बेग पछाण मं कस्यां आतो? जद पोळ मं उळी तो पाछै झांकी तो हलबलो करतो बायरां अर बाळकां को अेक झूमको ऊंकै पाछै आतो दीख्यो। लुगायां काण्यां घूंघटा सूं घूंघटा अड़ार आमी-सामी बतळारी छी। छोटा छोरा-छोरी कोचंगी आंख्यां सूं झांक-झां’कर बचरम मं पड़ र्या छा कै अतनी रूपाळी तो म्हांका इसकूल की मेडमां बी कोई न्ह। अरै पण या कुण छै असी रूपाळी लुगाई? अेक छोरा नै दूसरा सूं आंख्यां फाड़’र धीरां सेक बूझी।
ऊं अणजाण नै बी सारा बाळकां मं आपणा ज्ञान की धाक जमाबा लेखै मूंडा कै दोनी आडी हथेळ्यां लगार पूछबा हाळा बाळक की संक्या को समाधान करतां क्ही – म्हीं तो कलक्टरणी लागै छै यार। ऊंको ध्यान बाळकां की मीठी-मीठी बातां मं रम र्यो छो जे ऊनै बी बाळकां की संक्या मेट दी। भायावो न्ह तो म्हूं थांका इसकूल की मेडम छूं अर न्ह कलक्टरणी। म्हूं तो थांका गांव की बेटी अर थांकी बहण छूं। फेर ऊनै या सोच’र कै ये कांई बी ल्यां बना यां सूं न्ह हटैगा। थेला मं सूं मीठी गोळ्यां की अेक थेली काढ’र सबकै तांई बांट दी। अर क्ह दी कै अब आप आपका घरां नै जावो। छोरा-छोरी ताळ्यां बजाता उछळता कूदता कलकारा करता पोळ बारै कढग्या। बायरां बी सब राम-राम कर’र बड़ी-बूढ़ी माथै हाथ फेर’र अर बर्याबर की गळै मल-मल’र चलीगी। सब बछट्यां पाछै ऊकी जीजी बाथ भर’र रोबा लागी तो ऊनै बरज दी। न्ह जीजी यो बगत रोबा को कोई न्ह स्वागत सत्कार अर परेम सूं गळै मलबा को छै। तू म्हारै माथै हाथ फेर’र अेक दो चूमा लगा देनै म्हारी माई? देख थारी बेटी कतना दनां मं आई छै? रोती-रोती आंख्यां पूंछ’र हांसती ऊंकी जीजी नै ऊंका गळा की बाथ भर’र जे चूमा लगाबो सरू कर्यो तो लगाती ई चलीगी। ऊंकी भोजाई नै भागी आर वै दोनी नाळी करी अर ऊंकै पगां लागबा लागगी। वा भोजाई का वारणां लेती आसीस री छी। थारो चूड़ो दोवड़ो अमर रीजे।
तू दूधां न्हाजे अर पूतां फळजे। ऊंका आसीस देबा नै देख’र ऊंका भाई जी अर भायो दूरा ऊबा मुळकता देखर्या छा। अतनै ऊंका च्यार साल का भतीजा नै बगल सूं ऊंकी बांथ आण भरी अर ऊंचो माथो कर्यां अपणायत सूं भुआ आडी झांकबा लाग ग्यो। ऊनै भोजाई का वारणा लेतो हाथ ऊंका माथा पै फेरबू सरू कर द्यो। बोली – बेटा थारो माथो सदां भगवान अस्यांई ऊंचो रखाणै। आज पूरो परवार भरत मलण को सो परेम भाव दरसा र्यो छो। सब चोड़ा आंगणां मं ई बैठ ग्या छा। भाई नै बूझी – गोलू आज आपणै कुण आया छै पावणा? गोलू च्यारू मेर झांक’र नीची आंख्या कर्यां बाप सू बोल्यो – भुवाजी-फूफाजी। ऊंकी बात सुण’र सारा का सारा राजी होग्या। ऊंका भाई जी तो अतना राजी होया कै हांसता-हांसता खांसबा लाग ग्या। अतना राजी तो वै कदीं बी न्ह देख्यां छा। पाछली सारी जिंदगाणी मं आज जस्या सुखी कदीं बी न्ह र्या होगा। ऊंकी भायली मोत्यां नै जड़ाऊ का कान मं धीरां सेक क्ही- जड़ाऊ काल्ह अनोखी कै सासरै रसोई छै। आपणा घरां मं समसत को नूतो छै।ऊंकी भायली मोत्यां नै जड़ाऊ का कान मं धीरां सेक क्ही- जड़ाऊ काल्ह अनोखी कै सासरै रसोई छै। आपणा घरां मं समसत को नूतो छै। सुण’र खुसी की मारी वा उछळती भा’गर ऊंकी माई सूं लूमगी। लाळच्या करती बोली – ऊऽऽऽ जीजी आपण बी चालैगा नै रसोई मं? माई बोली – वैऽऽऽ थारा भाईजी बैठ्या। वां सूं बूझ लै। माई की बात सुण’र ऊंका भाईजी मन सूं ई बोलग्या। ज्वांई जी बी अनोखी को सासरो देख्या वैगा।
वै अब तांई छान-मून सारो नजारो देखता बैठ्या छा। ससरा की बात सुणतांई बछक’र ससराजी की आडी झांकता बोल्या – न्ह, न्ह म्हारै जाबा की कस्यां बणैगी? म्हूं तो अबार पाछो जाऊंगो घरनै। वां जीजी अेकली ई छै। हाळी-ग्वाळ काम पै कोई न्ह। ढांडा-ढोर अेरणा छै। दूध बी काढ़णो छै। जीजी का बस को काम थोड़ो ई छै। फेर छोरो बी तो छै। जे …….। ऊंका भाईजी बीचा मं ई बोल्या – तो फेर भायो टेक्टर सूं छोड्य़ावै तो पूछल्यो? भायो बी भड़तांई नटग्यो। न्ह, न्ह म्हारै तो असाडी को सारो काम समेटणो छै। अस्यां रोतो फरूंगो तो जमगी फेर असाडी। जड़ाऊ भाईजी सुण’र बोल्या- तो म्हूं काळया सूं क्ह द्यूं छूं। तडक़ै गाड़ी जोर म्हैल्या वैगो। थां फेर थांकै जमै ज्यां तांई रसोई कै पाछै बी रूक सको छो। ऊंठी सूं अनोखी का ज्वांई जी म्हैल जावैगा। ऊनै रसोई मं जाबा कै लेखै पावणा फीर मं पहरबा का लत्ता कपड़ा अर साज-सणगार का सामान अेक सूटकेस मं जमाबू सरू कर द्या। ऊंकी जीजी नजीक आण ऊबी कमर पै दोनी हाथ धर्यां मुळकती बोली- चालणो तो क्हाल छै तू आज ई काइमी उळझगी? तडक़ैई धर लेगां अेक-दो जोड़ी। वां कांई ब्याव छै जे दो च्यार दन को सराजाम करां? जड़ाऊ बोली- तू तो थारा बी जे ले चालणा होवै वै यां लार धर दै। म्हूं तडक़ा का चक्कर मं न्ह पड़ूं। धाका-धीकी मं कोई चीज भूल जावैगां तो वां कुण सूं मांगता फरैगां। अर यो मांगबो चोखो लागैगो कीं? ऊकी भाभी बी आण ऊभी होई। ऊपर झांकर हाथ जोड़्यां आंख्यां मीच’र बोली – हे म्हारा दीनानाथ! नीठ जार ईं उणग्यारा पै हांसी बा’वड़ी छै। ईं नै असी की असी बणी रखाणजे म्हारा नाथ। जड़ाऊ आंख्यां उठार भाभी की आडी झांकी तो हांसी चालगी। ताळ्यां बजार बोली – भाभी हालतो आज ई आई छूं ।
अर अबार ई म्हीं खनाबा की पराथना भगवान सूं करबा लागगी नै? भाभी म्हारी बाथ भर’र हांसती बोली – थांई खनाबा की पराथना न्ह करणी पड़ै बाईजी। थां तो थांई रोक्यां न्ह रूकैगा। नणदोई जी की याद जादा दन थोड़ी ई ठह्रबा देगी। तीनूं जण्यां हांसी मं मगन होगी। वै रात पड़्यां अनोखी कै सासरै पूग्या। रसोई जीम्यां पाछै नाच कूद’र सबी सोग्या। काळ्यो तडक़ै ई रवाना कर द्यो छो। सारा ब्याई सगा जे रात रूकग्या छा वै न्हाबा-धोबा सूं नमट’र तडक़ा कै लेखै दाळ-बाटी को सतूनो जमाबा लाग ग्या छा। बायरां दसा जंगळ सूं नमट’र लाल दंत मंजन सूं हथेळ्यां भर्यां पंगत मं बैठी पटैलायां करबा लागगी छी। रात सूंई सारा ब्याई सगा अर बायरां की नजर जड़ाऊ पै जा जा’र ठहर जावै छी। दंत मंजन करती बेरां अनोखी, अनाखी की जठ्याणी अर जड़ाऊ अेक लै’ण मं ई बैठी छी। अनोखी की जठ्याणी जाण कर’र जड़ाऊ कै सोड़ै बैठी अर ऊंकी आडी झांकती हांसी। ऊंई हांसती देख-र जड़ाऊ बी हांसी। अनोखी की जठ्याणी घणी बतळाक बायर छी। वा जड़ाऊ कै कूहणी को ठल्लो देर हांसती बोली – बळो-बळो। थां म्हारी आडी जादा मत हांसबू करो। म्हारी नजर घणी बरी छै। सुण-र तीनू जण्यां जोर-जोर सूं हांसबा लागगी। अनोखी बोली – बळो-बळो। थांबी भाभी जी कांणा कांई क्हबा लागग्या? अरी अनोखी थारी भाइली तो आई जद सूं ई म्हारा भेजा पै चढऱी छै। कुण का छै ये ब्याण जी? अनोखी बोली – सांची क्हर्या छो भाभी जी। ईं को रूप अस्यो ई बळै छै। बाळपणा मं बी घणी नजर लागै छी। म्हां का गांव का दा’हजी देवलाल जी पटैल की अकलोती बेटी छै या। घणी लाडां मं पळी छै। का’री जड़ाऊ सांची छै नै? जड़ाऊ बोली- ब्याण जी मनख कांई बी कोई न्ह सम्या कै आगै। ऊ धनवन्ता नै दाणा मांगण्या करदे अर गेलै चालता ईं राजो बणादे। उस्यां तो म्हारा बाप कै दो हळां की पीवत जमीन की लारां ब्याज-बाढ़ी अर टेक्टर सूं ऊपर की कमाई बी छी अर खाबा हाळा म्हां च्यार ई मनख छा। धन की कमी कोई न्ह छी।
सारी ज्यात मं आदर-सनमान छो। लोगां का काम कै लेखै फरता ई रै छा। अेक दन स्याम की वै फरता-फरता आया अर म्हारी जीजी कै आगै बैठ’र बोल्या – या लै रै भाई कर्यायो आपणो काम बी। म्हूं वां ईं बैठी छी। उठर पाणी को लोट्यो भर’र लाई अर भाईजी ईं सूंप द्यो। जीजी नै बूझी – अस्यो कांई काम कर्याया? म्हूं जद बी दूसरां का काम कै लेखै जाऊं छूं तो म्हारो काम बी म्हनै याद रै छै। अर अब कै ऊ होग्यो। भाईजी क्हर्या छा। फरता-फरता म्हां गोपाल परै जा पूग्या। वां पटैल दीनानाथ जी कै यां ईं रूक्या छा। कांई मोइला मनख छै। क्हबा मं ई न्ह आवै। कार-बार बी आपण सूं तो स्वायो ई समझ। तीन मनख। दोनी जणा अर अेक छोरो। पटैल दीनानाथ जी कै यां ईं रूक्या छा। कांई मोइला मनख छै। क्हबा मं ई न्ह आवै। कार-बार बी आपण सूं तो स्वायो ई समझ। तीन मनख। दोनी जणा अर अेक छोरो। लडक़ो जरूर थोड़ो सांवळो छै। बात-चीत होई। वै बी राजी होग्या। म्हनै क्ही- आप छोरी देख्यावो। वै बोल्या – छोरी तो छोरी रै छै। छोरी को कांई देखबो। आपका घर-बार देख’र म्हानै कांई करणो छै। म्हांनै छोरी थोड़ी ई देणी छै। जे आपका घर-बार देखां। म्हांकै यो सगपण मंजूर छै। जे म्हनै तो बायरां मं गाळ्यां को गुड़ बांट’र पंचां की सागसी मं सगपण का सोदा की सांई का रूप मं छोरा का हाथ मं दो टका धर’र ब्याईजी सूं राम-राम करल्यो। ब्याव अर गूणा मं सासरै जाबो छोर्यां कै लेखै पावणा पीहर मं जाबो ई मानो। म्हूं बी दोनी बार च्यार-च्यार दन रै’र पाछी आगी छी। जे सासरा सूं म्हारो न्ह तो जादा लगाव होयो अर न्ह घरणा होई। खाता-पीता परवार का सहज-पोसक खाण-पीण अर ज्वानी की देळ पै पग धरती गूणै आई म्हारी देही को रूप जारजीट की ओडणी मं आर-पार ज्यूं की ज्यूं दीखै छो। जे म्हारा रूपाळपणा की गांव की लुगायां मं चरचा होती रै छी। अेक दन म्हांकै वै गूणा कै अेक साल पाछै रूणै लेबा आया छा। लावण्यां का दन छा। गैहूं कट र्या छा। बैल-गाड़ी सूं आया छा। गाड़ी सूं बैल छोड़’र म्हांका हाळी दा काळ्या ईं समळाता बोल्या छा – काळू जी भूखा मत मार घाल ज्यो बैलां ई।
क्हाल पाछोई गाड़ी कै जपणो छै यांकै तांई। दा काळ्या नै बूझी छी-जे तडक़ै ई जावैगा कीं? हाल अेक-दो दन तो रूकता? न्ह जी ! रोटी खार जावैंगा। अबार रूकबा की कांई मरबा की बी फुरसत कोई न्ह। गावा खेत मं फैलर्या छै। भाईजी नै क्ही छै कै भाया जा कोराणी नै ल्या जार। काम का दन छै। और न्ह तो चांद्या पोबा को’ई सायरो लागैगो। मनख छै क्हां अबार? मनख तो सूना कै भाव होर्या छै। अर फेर टैम बी आगी। रूणै लाबा की। जीजी’र म्हूं कूळा कै छै’टर सुणरी छी। स्याम की भाईजी माळ मं सूं आया तो म्हारी जीजी नै सारी बात बतादी। भाईजी सुण’र नमून खींचग्या छा। फेर नरी देर मं जार बोल्या छा – अरै पण कांचळी कापड़ो बी तो करणी पड़ैगो नै? अेक-दो दन को टैम मल जातो तो माजणा मुजब कांचळी-कापड़ो बी करता? म्हारै अेक ई तो बेटी छै। अर ज्यात समाज मं इज्जत छै आपणी। अब चंता करबा सूं कांई होवैगो? म्हारी जीजी समझारी छी। गूणा कै पाछै ज्वांई प्हली बार लेबा आयो छै। ऊंकै तांई नाराज करबो समझदारी कोई न्ह। गांव की दुकान सूं जस्यो बी मलै उस्यो उढ़ा-पहरार लारां करो। टैम पै मलजावै ऊई सूना को तार छै। ज्वांई राजी तो आपणी बेटी सुखी। फेर बेटी कै तांई तो सारै जमारै देता ई रै’गां। अब कै दुबारा सासरै जावै ऊंकै प्हली चोखा लत्ता-पोतड़ा लार धर लेगां। माई-बाप की बातां सुण’र म्हूं घणी दुखी होरी छी। ब्याण साब सासरै तो म्हूं कोरा आठ दन ई री छी। फेर भाग’र ई आणी पड़्यो। जड़ाऊ क्हरी छी। अनोखी की जठ्याणी नै बूझी – क्यूं? अस्यो कांई दुख आग्यो आठ दन मंई जे भाग’र आणी पड़़्यो? याई बात तो म्हं सूं गांव मं कोई बी न्ह बूझै छी। बूझैगी बी कुण? कोई सेवड़ै ई न्ह बैठै छी। आज आपनै बूझी अर कै ऊं दन अनोखी नै बूझी छी। जद म्हूं ईं की आबा की सुण’र यांका घरनै मलबा गी छी।
आई छी नै बणा। अनोखी क्हरी छी – बाबरा भांड होरी छी। न्ह तो माथा का बाळां मं तेल अर न्ह माथा पै चोखी ओढ़णी। होटां पै पापड़्यां जमरी छी। म्हूं ईं की आडी झांकी तो झांकती ई रै’गी। या जड़ाऊ ई छै कै ऊंकी नुकल-सकल की सांवळा उणग्यारा की कोई दूसरी मोट्यारड़ी। पण जद या डीडा’र म्हारा गळा कै लूमी तो म्हूं समझगी कै या जड़ाऊ ई छै अर कोई भारी दुख सूं दुखी छै। म्हूं ईं का मोरा पै हाथ फेरती री बसवासती बी री अर सोचती बी री। कै कोई हादसो होतो तो सुणता न्ह कीं? नरी देर मं म्हनै या पकड़’र चूंतरी पै बठाणी अर बूझी – अरी पण जे बी होयो होवै म्हीं पैड़ीवार बता? अब ब्याणजी म्हूं कांई बताती? जीं दन म्हूं सासरै पूगी ऊं दन सूं ई अन्याय सरू होग्यो छो। ऊं दन म्हंू स्याम की रोटी पोरी छी। बाप-बेटो दोनी रोटी खार्या छा। म्हारी सासू वांसूं बोली छी – देख भाया थारा भाईजी तो बूढ़ा’र छै। माळ मं वांकै अेकलां कै कोई देज्या। ईं लेखै माळ मं गावां की रूखाळी तो आपण माई-बेटा ई सोवैगा अर थारा भाईजी यां घर नै सोवैगा। लाडी अतना बड़ा मकान मं अेकली कस्यां सोवैगी? तो ईं मं अस्यो-कस्यो अन्याय होग्यो? अनोखी की जठ्याणी नै बूझी? अन्याय मन सूं न्ह होयो करवायो ग्यो छै। जड़ाऊ बोली। या ई तो म्हूं बूझरी छूं। म्हारी सासू कै तो डोकरा की लारां माळ मं जा सोती अर कै दोनी बाप-बेटा जा सोता। जरूरी थोड़ो ई छो कै डोकरो घरनै सोवै अर ये दोनी माई-बेटा माळ मं सोवै। या बात आप ईं अटपटी न्ह लागरी कीं? हां अटपटी तो छै। पण सासरा मं थोड़ी घणी तो बरदास करणी ई पड़ै छै बणा। यो कांई कै जरासो थेपबो, सूखा छाणा छनवाड़ सूं लार घर मं जमाबो, भाग फाट्यां सूं सरू होर डळतां दफैर तांई करती रै छी।
काम करती बगत तो दुख नै भूल्यां रै छी पण ज्यूं ई ठाली होती तो च्यारू मेर को सरणाटो म्हारा मन का अेकलपणा का सरणाटा मं मल’र भेजा मं अेक बरबूळ्यो उठातो जे केई बार तो मन मं घबराट अणा’र आख्यां कै आगै ऊंधेरो कर देतो। फेर जद कोई म्हीं उठातो तो तोल पड़तो कै म्हूं यां पड़ी छी। केई बार तो म्हूं होस मं आतां ईं च्यारूं मेर झांक’र खुद ई उठती अर गेलै लाग जाती।थेपबो, सूखा छाणा छनवाड़ सूं लार घर मं जमाबो, भाग फाट्यां सूं सरू होर डळतां दफैर तांई करती रै छी। काम करती बगत तो दुख नै भूल्यां रै छी पण ज्यूं ई ठाली होती तो च्यारू मेर को सरणाटो म्हारा मन का अेकलपणा का सरणाटा मं मल’र भेजा मं अेक बरबूळ्यो उठातो जे केई बार तो मन मं घबराट अणा’र आख्यां कै आगै ऊंधेरो कर देतो। फेर जद कोई म्हीं उठातो तो तोल पड़तो कै म्हूं यां पड़ी छी। केई बार तो म्हूं होस मं आतां ईं च्यारूं मेर झांक’र खुद ई उठती अर गेलै लाग जाती। अेक दन छनवाड़ सूं छाणा लेर आरी छी तो अस्यां ई आंख्यां कै आगै ऊंधेरो छाग्यो। म्हीं होस आयो तो दा गोबर्यो म्हीं उठार्यो छो। कोई दन म्हांकै हाळी छो। घणों अेमानदार छो। अर म्हां सूं घणो परेम रखाणै छो। बोल्यो- बाईजी कस्यां छो? भलांई म्हूं हांसर ई बोलूं छूं पण आंसू तो म्हारै ढुळकै ई ढुळकै। म्हनै हांसर ई क्ही – जीवती ई छूं रै दा गोबर्या। कांई करूं? हाथां कर्या कामड़ा दोस कुणी नै देय हाळी बात छै।
जे क्हां न क्हां देखल्यो नै? नत उठ आंसूं पूरबा सूं तो टूटो-फाटो कस्यो बी घर-धणी मल ई ज्यागो। दो दन सातां मं तो कटैगा। दा गोबर्यो मन की इमानदारी सूं बोल र्यो छो। हांऽऽ रै दा गोबर्या। यांऽऽ न्ह तो म्हूं हांस सकूं अर न्ह धाप’र रो सकूं। जे तो म्हूं ओर सबसूं दूणो-डोडो काम करूं छूं। पण भाभी चूला-चोका कै बारै अेक हाथ ठाम को बी ब्वारो न्ह सरकावै। जीजी सूं तो न्ह होवै देख। जदी तो क्हर्यो छूं बाईजी। कांन्कांई करो। दा गोबर्या नै जोर देर बात दुसराई। खुद ई खुद को दुख मेट सको छो। तू संाची क्हर्यो छै दा गोबर्या। पण ये काम खुद का खुद सूं न्ह होवै। ये काम तो फड़ू ई करै छै। देखो आबा द्यो टैम। ऊपर हाळा नै बी तो कांन्कांई सोच म्हैली होगी। दा गोबर्या नै म्हारै हीमत अणाई। अर देखो ब्याणजी! म्हारै अर दा गोबर्या कै बातां होयां पूरा पंदरा दन बी न्ह कढ़्या छा कै म्हांका गांव मं अेक ब्याव मंडग्यो। ब्याव मं चेनपर्या सूं अेक अस्यो पावणो बी आयो छो जीं कै बायर की खास छी। ऊं ब्याव मं तो या बी गी छी। कारी अनोखी? म्हनै ईं सूं सकतां-सकतां क्ही छी – देखां अनोखी तोल तो पड़ा। काम बण जावै तो संकट मटै। म्हनै क्ही- हां देखां म्हूं काटू छूं भाळ। अनोखी क्हबा लागी। कुण छै? कस्यां को छै? कतनी उमर को छै? म्हूं थोड़ो सो अैसान, थोड़ो सो सगोस, थोड़ी सी खुसी, थोड़ी सी संक्या का भेळ-साळ भाव सूं ईं की आडी झांकी तो ईंनै कांई तोल म्हारा मन का भाव कांई रूप मं पछाण्या जे म्हारी आडी झांक’र मुळकी अर म्हारा माथा पै हाथ फेर’र म्हूं बसवासी। बोली – चंता मत करै जड़ाऊ म्हूं छूं नै।
थारो डर बी सांचो छै। तू दूध सूं दाझी छै ईं लेखै तू छ्याछ फूंक-फूंक’र पीरी छै। अनोखी क्हरी छी। तू दा गोबर्या का घरनै चाल। म्हूं ऊंनै लेर आरी छूं। दा गोबर्या की ज्याग गांव का खूंट पै छी। म्हांका पाड़ा सूं नरी दूरै। म्हां दोनी दा गोबर्यो अर म्हूं ऊंकी ज्याग बारै चूंतरी पै बैठ्या छा। नरी देर पाछै या अर ऊ पावणों म्हानै आता दीख्या। ये दोनी बातां करता हांसता मुळकता आर्या छा। पावणो पैताळी-पचास साल को लोग कसीदो कढ़ी ज्यूंत्यां, धोळी फबूक धोवती, कमीज पहर्यां, मूठड़ा को स्याफो बांध्यां छो। गंगा-जमनी मूंछ्यां कै पाछै सूं धोळी बत्तीसी की मुळकण फांकतो ईं सूं बातां करतो आर्यो छो। या बी बीचा-बीचा मं ऊंकी आडी झांक’र मुळक जावै छी। ये दोनी नजीक आतां ईं म्हां दोनी बी उठ्या अर च्यारूं मनख दा गोबर्या की ज्याग मं उळग्या। आंगणां मं बछी खाट पै कथल्यो बछर्यो छो। सारा बैठ तांई दा गोबर्यो बोल्यो – आप सब बातां करो। अब म्हारो यां कांई काम? म्हनै अेक काम की याद आगी जे म्हूं कर्याऊं छूं। पावणो खाट पै बैठ तांई या बोली छी। थां दोनी बातां करो। म्हूं अबार आई। म्हनै ई को हाथ पकड़’र क्ही – न्ह, न्ह तू क्हां बी न्ह जावैगी। यां ईं रै’गी म्हांकै गोडै। आपण तीनूं ईं करैगां बाता। पावणा नै बी क्ही – न्ह, न्ह आप यां ईं बैठो। आप न्ह रैगा तो म्हां बातां कस्या करैगां। उस्या थोड़ी घणी तो म्हनै थांई बताई दी। फेर बी थांका बायना सूं बातां करबा मं म्हांनै आसानी रैगी। ईंनै क्ही – बातां कांई? आप तो आपकी बात जड़ाऊ कै सामै बता द्यो। फेर म्हानै कोई बात बूझणी होगी तो म्हां बूझलेगां। देखो मारा म्हारै दो बेटा अर अेक बेटी छै। वां की माई मर्यां पाछै म्हंनै बड़ा बेटा अर बेटी का गरण-गटेरा कर द्या। बेटी सासरै गी अर म्हूं बेटा-बू कै गोडै रै’बा लागग्यो।
जीं घर नै प्हली म्हां दोनी जणा चलावै छा ऊं घर नै अब बेटा-बू चलावै छै। प्हली म्हारी बात सरै रै छी। अब वां की बात सरै रै छै। वां की बात सरै रै’बा सूं बी म्हारै कोई दुख कोई न्ह। पण बात जद बेटा की बजाय बू की चालबा लाग जावै अर थेपबो, सूखा छाणा छनवाड़ सूं लार घर मं जमाबो, भाग फाट्यां सूं सरू होर डळतां दफैर तांई करती रै छी। काम करती बगत तो दुख नै भूल्यां रै छी पण ज्यूं ई ठाली होती तो च्यारू मेर को सरणाटो म्हारा मन का अेकलपणा का सरणाटा मं मल’र भेजा मं अेक बरबूळ्यो उठातो जे केई बार तो मन मं घबराट अणा’र आख्यां कै आगै ऊंधेरो कर देतो। फेर जद कोई म्हीं उठातो तो तोल पड़तो कै म्हूं यां पड़ी छी। केई बार तो म्हूं होस मं आतां ईं च्यारूं मेर झांक’र खुद ई उठती अर गेलै लाग जाती।थेपबो, सूखा छाणा छनवाड़ सूं लार घर मं जमाबो, भाग फाट्यां सूं सरू होर डळतां दफैर तांई करती रै छी। काम करती बगत तो दुख नै भूल्यां रै छी पण ज्यूं ई ठाली होती तो च्यारू मेर को सरणाटो म्हारा मन का अेकलपणा का सरणाटा मं मल’र भेजा मं अेक बरबूळ्यो उठातो जे केई बार तो मन मं घबराट अणा’र आख्यां कै आगै ऊंधेरो कर देतो। फेर जद कोई म्हीं उठातो तो तोल पड़तो कै म्हूं यां पड़ी छी। केई बार तो म्हूं होस मं आतां ईं च्यारूं मेर झांक’र खुद ई उठती अर गेलै लाग जाती।
अेक दन छनवाड़ सूं छाणा लेर आरी छी तो अस्यां ई आंख्यां कै आगै ऊंधेरो छाग्यो। म्हीं होस आयो तो दा गोबर्यो म्हीं उठार्यो छो। कोई दन म्हांकै हाळी छो। घणों अेमानदार छो। अर म्हां सूं घणो परेम रखाणै छो। बोल्यो- बाईजी कस्यां छो? भलांई म्हूं हांसर ई बोलूं छूं पण आंसू तो म्हारै ढुळकै ई ढुळकै। म्हनै हांसर ई क्ही – जीवती ई छूं रै दा गोबर्या। कांई करूं? हाथां कर्या कामड़ा दोस कुणी नै देय हाळी बात छै। जे क्हां न क्हां देखल्यो नै? नत उठ आंसूं पूरबा सूं तो टूटो-फाटो कस्यो बी घर-धणी मल ई ज्यागो। दो दन सातां मं तो कटैगा। दा गोबर्यो मन की इमानदारी सूं बोल र्यो छो। हांऽऽ रै दा गोबर्या। यांऽऽ न्ह तो म्हूं हांस सकूं अर न्ह धाप’र रो सकूं। जे तो म्हूं ओर सबसूं दूणो-डोडो काम करूं छूं। पण भाभी चूला-चोका कै बारै अेक हाथ ठाम को बी ब्वारो न्ह सरकावै। जीजी सूं तो न्ह होवै देख। जदी तो क्हर्यो छूं बाईजी। कांन्कांई करो। दा गोबर्या नै जोर देर बात दुसराई। खुद ई खुद को दुख मेट सको छो। तू संाची क्हर्यो छै दा गोबर्या। पण ये काम खुद का खुद सूं न्ह होवै।
ये काम तो फड़ू ई करै छै। देखो आबा द्यो टैम। ऊपर हाळा नै बी तो कांन्कांई सोच म्हैली होगी। दा गोबर्या नै म्हारै हीमत अणाई। अर देखो ब्याणजी! म्हारै अर दा गोबर्या कै बातां होयां पूरा पंदरा दन बी न्ह कढ़्या छा कै म्हांका गांव मं अेक ब्याव मंडग्यो। ब्याव मं चेनपर्या सूं अेक अस्यो पावणो बी आयो छो जीं कै बायर की खास छी। ऊं ब्याव मं तो या बी गी छी। कारी अनोखी? म्हनै ईं सूं सकतां-सकतां क्ही छी – देखां अनोखी तोल तो पड़ा। काम बण जावै तो संकट मटै। म्हनै क्ही- हां देखां म्हूं काटू छूं भाळ। अनोखी क्हबा लागी। कुण छै? कस्यां को छै? कतनी उमर को छै? म्हूं थोड़ो सो अैसान, थोड़ो सो सगोस, थोड़ी सी खुसी, थोड़ी सी संक्या का भेळ-साळ भाव सूं ईं की आडी झांकी तो ईंनै कांई तोल म्हारा मन का भाव कांई रूप मं पछाण्या जे म्हारी आडी झांक’र मुळकी अर म्हारा माथा पै हाथ फेर’र म्हूं बसवासी। बोली – चंता मत करै जड़ाऊ म्हूं छूं नै। थारो डर बी सांचो छै। तू दूध सूं दाझी छै ईं लेखै तू छ्याछ फूंक-फूंक’र पीरी छै। अनोखी क्हरी छी। तू दा गोबर्या का घरनै चाल। म्हूं ऊंनै लेर आरी छूं। दा गोबर्या की ज्याग गांव का खूंट पै छी। म्हांका पाड़ा सूं नरी दूरै। म्हां दोनी दा गोबर्यो अर म्हूं ऊंकी ज्याग बारै चूंतरी पै बैठ्या छा। नरी देर पाछै या अर ऊ पावणों म्हानै आता दीख्या।
ये दोनी बातां करता हांसता मुळकता आर्या छा। पावणो पैताळी-पचास साल को लोग कसीदो कढ़ी ज्यूंत्यां, धोळी फबूक धोवती, कमीज पहर्यां, मूठड़ा को स्याफो बांध्यां छो। गंगा-जमनी मूंछ्यां कै पाछै सूं धोळी बत्तीसी की मुळकण फांकतो ईं सूं बातां करतो आर्यो छो। या बी बीचा-बीचा मं ऊंकी आडी झांक’र मुळक जावै छी। ये दोनी नजीक आतां ईं म्हां दोनी बी उठ्या अर च्यारूं मनख दा गोबर्या की ज्याग मं उळग्या। आंगणां मं बछी खाट पै कथल्यो बछर्यो छो। सारा बैठ तांई दा गोबर्यो बोल्यो – आप सब बातां करो। अब म्हारो यां कांई काम? म्हनै अेक काम की याद आगी जे म्हूं कर्याऊं छूं। पावणो खाट पै बैठ तांई या बोली छी। थां दोनी बातां करो। म्हूं अबार आई। म्हनै ई को हाथ पकड़’र क्ही – न्ह, न्ह तू क्हां बी न्ह जावैगी। यां ईं रै’गी म्हांकै गोडै। आपण तीनूं ईं करैगां बाता। पावणा नै बी क्ही – न्ह, न्ह आप यां ईं बैठो। आप न्ह रैगा तो म्हां बातां कस्या करैगां। उस्या थोड़ी घणी तो म्हनै थांई बताई दी। फेर बी थांका बायना सूं बातां करबा मं म्हांनै आसानी रैगी। ईंनै क्ही – बातां कांई? आप तो आपकी बात जड़ाऊ कै सामै बता द्यो। फेर म्हानै कोई बात बूझणी होगी तो म्हां बूझलेगां। देखो मारा म्हारै दो बेटा अर अेक बेटी छै। वां की माई मर्यां पाछै म्हंनै बड़ा बेटा अर बेटी का गरण-गटेरा कर द्या। बेटी सासरै गी अर म्हूं बेटा-बू कै गोडै रै’बा लागग्यो। जीं घर नै प्हली म्हां दोनी जणा चलावै छा ऊं घर नै अब बेटा-बू चलावै छै। प्हली म्हारी बात सरै रै छी। अब वां की बात सरै रै छै। वां की बात सरै रै’बा सूं बी म्हारै कोई दुख कोई न्ह। पण बात जद बेटा की बजाय बू की चालबा लाग जावै अर म्हारी वाजब बात पै बी काण-डोड होबा लागज्या तो ……..। वां की बात काट’र या धाका-धीकी सूं बोली छी – समझगी-समझगी कांईं मत क्हो। म्हां दोनी सब समझगी। बेटी कै सासरै ब्याव छो। म्हनै क्ही भाया परस्यूं चल्यो जाजे। बू बीचा मं बात काट’र बोली – म्हां तो म्हारा काकाजी की बेटी कै सासरै जावैगां। म्हनै सोची हाल तो पथवार्यां छै।
अबार ई पग सूजग्या तो जिन्दगी की जातरा तो घणी लांबी छै। आगै कांई बी हो सकै छै। हारी-बेमारी ओर कोई अस्यो ओसर बी आ सकै छै जद म्हीं कोई दूसरा मनख की चावन्या होवै अर बेटा-बू नै न्ह समाळ्यो तो ……। उस्यां जमीं कतनीक छै आपणै? ईं नै फेर बात काटी। या ई कोई तीसक बीघा मानो। बीस बीघा मं बोरिंग कनेसन छै अर दस बीधा मं सायरै का खेत का बोरिंग सूं पाणी ले ले छां। ओर कान्कांई पूछणी होवै तो आपबी पूछल्यो? कांन्कांई छपाऊंगो तो वा अेक दन चोड़ै आवैगी ई आवैगी। ऊ म्हारी आडी झांकर बोल्यो छो पण ज्वाब ईं नै ई द्यो छो – हाल तो यांई छो अेक दो दन। काल्ह गोरण अर परस्यूं बदा। करलेगां सल्ला। ईं कै भाई-भोजाई अर माई-बाप बी तो छै। म्हांनै दा गोबर्यो भाईजी कै गोडै खनाद्यो। ऊंनै काल्ह जे बातां होई सारी भाईजी ईं बता दी। दूसरै दन भाईजी नै दा गोबर्या सूं पावणो बलवाल्यो। म्हारी जीजी म्हूं अर या पोळ मं अर भाईजी अर ऊ पावणो बारै छपर्या मं बैठ ग्या। भाईजी नै बात सरू करी – आप कै तो ज्वान बेटा-बू बताया फेर बायर की कांई खास आण पड़ी? पावणो बोल्यो – बेटा-बू अर घरहाळी मं घणो फरक रै छै मारा। या बात म्हारै समझ मं आगी। जादा फैलाबो बेकार छै। हां या बात तो छै। भाईजी बोल्या – उस्यां जमीं कतनीक होगी आपणै? या ई कोई तीसेक बीघा। बेटा-बू कै बारै अेक क्वांरो छोरो अर छोरी बी छै। छोरी सासरै गी। भाईजी नै जीजी सूं बूझी – क्हैनै तू बी कांन्कांई? करल्यो थांई। म्हूं सुण-री छूं। सुणरी छूं कांई? क्है नै फेर पाछै म्हं सूं आंवचा करैगी। थांनै या न्ह करी। थांनै वा न्ह करी।
राछ-रीछ कांई-कांई लावैगा? अर छोरी कै लेखै अमानत बी तो म्हलावैगा? हां देख कढ़ी नै बात? म्हूं तो भूल ई ग्यो छो। बता कांई-कांई लाणा छै? सबी आवैगा। कांई छै ईंकै? सारा तो छोड़्याई वां। तो बी तो? बतायां सूं ईं तोल पड़ैगो। वै दोनी जणा बातां कर्रया छा। पावणो नमून खींच्यां सुणर्यो छो। देखो, माथा, पगां अर गळा मं तो लाणा पड़ैगा। मंगळ सूतर आणो ई आणो ओर या बता देगी। बूझै नै अनोखी। म्हारी जीजी क्हरी छी। और कांई-कांई मंगावैगी? म्हंनै डर लाग्यो। क्हीं यो नट न्ह ज्या। सकतां-सकतां बोली- करल्यो थांई। यां की हेसीत मुजब ये ई बता देगा। क्हारी अनोखी? या म्हारो असारो समझ’र बोली – देख काकी ! आपणी नांक नै तो सबी रोवै छै। आपणी हेसीत सूं जादा ई करै छै अस्या काम। तो फेर क्ह द्यो थां। यां सूं। जीजी भाईजी सूं क्हरी छी। आबा हाळी मावस सूं प्हली यो काम होज्या। न्ह तो फेर चांदणी आ ज्यागी। फेर होळी को डांडो गड्यो अर जा पड़ैगी होळी मंगाळ्ण्यां तांई की। डोड-दो म्हीना मं कुण जाणै कांई भांगा पड़ै छै? भाई-भोजाई बी बलाल्या छा। सब राजी छा। डोकरा-डोकरी यूं राजी छा कै घर नै बैठी मोट्यार बेटी को घर बसग्यो। पाका खेत की सी रूखाळी मटगी। भाई-भोजाई यूं राजी छा कै आगै जार जमीं-बाड़ी मं पांती मांगती जे दाइयो मटग्यो। पावणो दोच्यार दन मं आबा की क्हर चलीग्यो छो। डोकरा-डोकरी म्हारो लाड-लड़ाबा लाग ग्या छा। भाई-भोजाई की नजर मं म्हारो मान बधग्यो छो। नुई गरस्ती का नुवा सपना मं म्हूं उड़ी-उड़ी फरबा लाग गी छी। अब म्हीं कोई बी काम न्ह उढावै छो। रोज न्हाबो-धोबो, माथा-चोटी करबो, काजळ-टींकी लगार, नुवा सा लागता कपड़ा पहरबा लागगी छी। च्यार दन मं ज्यूं-ज्यूं दन घटता जाता म्हारो मन उतनो ई उफण-उफण आतो। बारै का गोखड़ा पै बैठी गर्याळा मं बाफण्यां बछायां रै’ती। ईं चक्कर मं ई म्हूं अेक दन बारै छपर्या मं गोखड़ा पै बैठी गर्याळा मं सम्पूरण ध्यान लगायां झांकरी छी कै म्हारा कानां मं भणकार आयो – जड़ाऊ ई छै नै तू? म्हूं बछक’र होस मं आती सामै झांकर बोली – हां ! म्हारै सामै सलवार सूट मं म्हारी दाईं दडक़ी अेक रूपाळी छोरी बखर-बखर हांसती ऊभी दीखी। म्हूं ऊंका उणग्यारा पै नजर ठहरार बोली – हां म्हूं ई छूं जड़ाऊ। पण तू कुण छै अर म्हारो नांव कस्यां जाणै छै? यां कांई लेबा आई? अरै-अरै सास तो खालै। अतना सवाल अेक साथ बूझ घाल्या। म्हारी बी तो सुण। हां सुणा।हां सुणा। वा बोली – म्हारो नांव रूक्मणी छै। थांका गांव का इसकूल मं म्हारो नुयो पोस्टिंग होयो छै।
म्हनै आज ई हाजरी दी छै। कोटा सूं रोजीना आबा-जाबा की थोड़ी ई गुड़ैगी। जे हेडमाटसाब नै क्ही कै सारा गांव मं अेक ई पक्को मकान छै। मकान मं साधन बी सब छै। घर का मनख सारा ई घणा चोखा छै। वां अेक लडक़ी बी छै जड़ाऊ। जींको सगपण मटर ग्यो। वा वांई मलैगी। अर म्हूं आगी। अब तू थारा घर हाळां सूं बूझ लै। म्हीं अेक कमरो चावै छै किराया पै। ऊं का बात करबा का तरीका सूं म्हीं हांसी चालगी। वा कोचंगी होर म्हारा मूंडा की आडी झांकी। म्हनै ऊंको हाथ पकड़’र क्ही – चालो मास्टरणी जी थांई कमरो बी बताद्यूं अर म्हारा घरकां सूं बी मला द्यूं। अेक-दो दन मं ई म्हां भाइल्यां बणगी। इसकूल सूं आयां पाछै अर इसकूल जावै ज्यां तांई म्हां लारां ई खाती, लारां ई पीती अर लारां ई सोती। कोई दन म्हारा कमरा मं अर कोई दन ऊंका कमरा मं। रात मं म्हां सारी-सारी रात बातां करती रैती। बातां ई बातां मं म्हां म्हांकी जिंदगी सूं जुड़ी सारी बातां जाणगी। अेक दन रूक्मणी बोली – जड़ाऊ तू आठवीं पास छै नै? म्हनै क्ही – हां ! जे कांई होयो। तू अेक बूढ़ा कै नातै जावैगी। म्हनै क्ही – हां अेक-दो दन मं लेबा आबा हाळो छै। म्हारै तो या बात जंच न्ह री। रूक्मणी बोली। कस्यां? अस्यां ! कै तू नातै जावैगी। जा । पण थारा भाग मं कांईं रोबो ई रोबो मंडर्यो छै कीं? कस्यां? अस्यां! तू मोट्यार छै। मोट्यार कै ई जाती तो म्ही बी खुसी होती। पण बूढ़ा कै नातै जाबा मं थारै दुख ई दुख छै। कस्यां? म्हंू सावचेत होर ऊकी आंख्यां मं झांकी। अस्यां। ऊंकै बेटा-बू छै। प्हली बात तो या छै कै थनै लड़ाई तो त्यार ई मलैगी। ऊंका बेटा-बू नै स्वावैगी कीं तू? बता? हां न्ह स्वाऊं। नाळा हो जावैगां। म्हनै गढास अणा’र क्ही। रूक्मणी बोली – नाळी होर कांई कोस दो कोस दूरै बसैगी कीं? ऊंई मकान मं नाळा होबा सूं लड़ाई थोड़ी ई बझ ज्यागी। लड़ाई तो दूरै जार बसै जद मटै। दूसरी बात या छै कै बूढ़ा की कोई उमर न्ह गणी जावै।
नंदी की कराड़ पै ऊबा रूंखड़ा की कांई उमर छै? कदीं बी पळा मं कराड़ो टूट्यो अर रूंखड़ो ढस्यो। थंनै तो हाल सारो जमारो जीणो छै। जे रो – रो’र कदतांई जमारो काटैगी? अर अेक-दो छोरा-छोरी होग्या तो वांको पालण-पोसण, पढ़ाई-लिखाई सारा तू कस्यां करैगी? जीं सूं तो तू वा कर जे म्हूं क्हूं छूं। थारै समझ मं आ जावै तो। क्हनै कांई क्हरी छै? म्हूं उतावळी होर बोली। आठवीं तांई तो तू पढ़ ई री छै। दसवीं को फारम भर दै। पराइवेट। अंगरेजी अर गणित करड़ा छै जे म्हूं पढ़ा द्यूंगी। पोथ्यां किताबां म्हूं अब कै कोटै जाऊंगी जद लेती आऊंगी। फेर ऊंको कांई करूं? भावां जोळ में पड़ती म्हूं बोली। कीं को? अेक-दो दन मं लेबा आबा हाळा छै। नट जाजे। ओर कांई?
भाईजी जीजी जोरी करैगा तो? क्ह दीजे म्हारो मन बदल ग्यो। पढ़ूंगी म्हूं तो। नट जावो ऊं सूं। भाईजी-जीजी कै पाछो ई कळेस आज्यागो। भाई-भोजाई बी कस्या राजी होवैगा? दो-च्यार दन रै’गा कळेस मं। फेर म्हूं समाळ ल्यूंगी। म्हूं झूमगी पढ़ाई पै। भाईजी जीजी दो-च्यार दन अण बोल्या र्या। फेर पाछा ई लडाबा लागग्या। जद बी वै रात मं म्हीं देखबा आता म्हूं वां नै पढ़ती ई मलती फेर बी बीचा-बीचा मं वै म्हारै लेखै कळेस करता। जीजी भाईजी सूं क्हती – अजी पण कांई होवैगो ईं छोरी को? चोखो मजा को सगपण छोड़ द्यो। आपणै मर्यां पाछै कुण हेजैगो ईं नै? भाई-भोजाई तो माई-बाप सतां ई मानो। अस्यां दन कढ़ता जार्या छा। अेक दन रूक्मणी नै क्ही- यो थारो परवेस पत्तर लै। दो दन पाछै परीक्सा छै थारी। कोटै चालजे म्हारी लारां। म्हांका घरनै रीजे। थारो परीक्सा केन्दर म्हां का मकान कै पाछै ई छै। थीं थारो परीक्सा केन्दर बी दखायाऊंगी। अेक दन जद वा कोटा सूं आई तो हांसती ई आई। आतां ई बोली – मीठो मूंडो करावै तो अेक समचार सुणाऊं। हां सुणा।हां सुणा। वा बोली – म्हारो नांव रूक्मणी छै। थांका गांव का इसकूल मं म्हारो नुयो पोस्टिंग होयो छै। म्हनै आज ई हाजरी दी छै। कोटा सूं रोजीना आबा-जाबा की थोड़ी ई गुड़ैगी। जे हेडमाटसाब नै क्ही कै सारा गांव मं अेक ई पक्को मकान छै। मकान मं साधन बी सब छै। घर का मनख सारा ई घणा चोखा छै। वां अेक लडक़ी बी छै जड़ाऊ। जींको सगपण मटर ग्यो। वा वांई मलैगी।
अर म्हूं आगी। अब तू थारा घर हाळां सूं बूझ लै। म्हीं अेक कमरो चावै छै किराया पै। ऊं का बात करबा का तरीका सूं म्हीं हांसी चालगी। वा कोचंगी होर म्हारा मूंडा की आडी झांकी। म्हनै ऊंको हाथ पकड़’र क्ही – चालो मास्टरणी जी थांई कमरो बी बताद्यूं अर म्हारा घरकां सूं बी मला द्यूं। अेक-दो दन मं ई म्हां भाइल्यां बणगी। इसकूल सूं आयां पाछै अर इसकूल जावै ज्यां तांई म्हां लारां ई खाती, लारां ई पीती अर लारां ई सोती। कोई दन म्हारा कमरा मं अर कोई दन ऊंका कमरा मं। रात मं म्हां सारी-सारी रात बातां करती रैती। बातां ई बातां मं म्हां म्हांकी जिंदगी सूं जुड़ी सारी बातां जाणगी। अेक दन रूक्मणी बोली – जड़ाऊ तू आठवीं पास छै नै? म्हनै क्ही – हां ! जे कांई होयो। तू अेक बूढ़ा कै नातै जावैगी। म्हनै क्ही – हां अेक-दो दन मं लेबा आबा हाळो छै। म्हारै तो या बात जंच न्ह री। रूक्मणी बोली। कस्यां? अस्यां ! कै तू नातै जावैगी। जा । पण थारा भाग मं कांईं रोबो ई रोबो मंडर्यो छै कीं? कस्यां? अस्यां! तू मोट्यार छै। मोट्यार कै ई जाती तो म्ही बी खुसी होती। पण बूढ़ा कै नातै जाबा मं थारै दुख ई दुख छै। कस्यां? म्हंू सावचेत होर ऊकी आंख्यां मं झांकी। अस्यां।
ऊंकै बेटा-बू छै। प्हली बात तो या छै कै थनै लड़ाई तो त्यार ई मलैगी। ऊंका बेटा-बू नै स्वावैगी कीं तू? बता? हां न्ह स्वाऊं। नाळा हो जावैगां। म्हनै गढास अणा’र क्ही। रूक्मणी बोली – नाळी होर कांई कोस दो कोस दूरै बसैगी कीं? ऊंई मकान मं नाळा होबा सूं लड़ाई थोड़ी ई बझ ज्यागी। लड़ाई तो दूरै जार बसै जद मटै। दूसरी बात या छै कै बूढ़ा की कोई उमर न्ह गणी जावै। नंदी की कराड़ पै ऊबा रूंखड़ा की कांई उमर छै? कदीं बी पळा मं कराड़ो टूट्यो अर रूंखड़ो ढस्यो। थंनै तो हाल सारो जमारो जीणो छै। जे रो – रो’र कदतांई जमारो काटैगी? अर अेक-दो छोरा-छोरी होग्या तो वांको पालण-पोसण, पढ़ाई-लिखाई सारा तू कस्यां करैगी? जीं सूं तो तू वा कर जे म्हूं क्हूं छूं। थारै समझ मं आ जावै तो। क्हनै कांई क्हरी छै? म्हूं उतावळी होर बोली। आठवीं तांई तो तू पढ़ ई री छै। दसवीं को फारम भर दै। पराइवेट। अंगरेजी अर गणित करड़ा छै जे म्हूं पढ़ा द्यूंगी। पोथ्यां किताबां म्हूं अब कै कोटै जाऊंगी जद लेती आऊंगी।
फेर ऊंको कांई करूं? भावां जोळ में पड़ती म्हूं बोली। कीं को? अेक-दो दन मं लेबा आबा हाळा छै। नट जाजे। ओर कांई? भाईजी जीजी जोरी करैगा तो? क्ह दीजे म्हारो मन बदल ग्यो। पढ़ूंगी म्हूं तो। नट जावो ऊं सूं। भाईजी-जीजी कै पाछो ई कळेस आज्यागो। भाई-भोजाई बी कस्या राजी होवैगा? दो-च्यार दन रै’गा कळेस मं। फेर म्हूं समाळ ल्यूंगी। म्हूं झूमगी पढ़ाई पै। भाईजी जीजी दो-च्यार दन अण बोल्या र्या। फेर पाछा ई लडाबा लागग्या। जद बी वै रात मं म्हीं देखबा आता म्हूं वां नै पढ़ती ई मलती फेर बी बीचा-बीचा मं वै म्हारै लेखै कळेस करता। जीजी भाईजी सूं क्हती – अजी पण कांई होवैगो ईं छोरी को? चोखो मजा को सगपण छोड़ द्यो। आपणै मर्यां पाछै कुण हेजैगो ईं नै? भाई-भोजाई तो माई-बाप सतां ई मानो। अस्यां दन कढ़ता जार्या छा। अेक दन रूक्मणी नै क्ही- यो थारो परवेस पत्तर लै। दो दन पाछै परीक्सा छै थारी। कोटै चालजे म्हारी लारां। म्हांका घरनै रीजे। थारो परीक्सा केन्दर म्हां का मकान कै पाछै ई छै। थीं थारो परीक्सा केन्दर बी दखायाऊंगी। अेक दन जद वा कोटा सूं आई तो हांसती ई आई। आतां ई बोली – मीठो मूंडो करावै तो अेक समचार सुणाऊं। म्हनै क्ही – प्हली समचार तो सुणा। थारा मूंडा मं मठ्याई ठूंस-ठूंस’र भर द्यूंगी। ऊंनै म्हारी बाथ भर’र क्ही – तू परथम आई छै राजस्थान मं।
म्हारी हांसी मत उड़ावै दावा। पास होबो ई घणो कठण छै। जीं मं परथम आबो अर ऊबी राजस्थान मं? रूक्मणी नै कांधा पै लटक्या झोळा मं सूं अेक अखबार काढ’र दखायो – यो देख ईं पेज पै रीजल्ट आयो छै। अर यो थारो रोल नम्बर परथम सरेणी मं छै। पण खास बात तो या छै कै दस रोळ नम्बरां की ईं लिस्ट मं थारो रोळ नंबर सबसूं ऊपर छै। म्हनै भाग’र रूक्मणी बाथ मं भरली अर ऊंका गाल पै अेक चूमो लगाद्यो। अब तो म्हूं जीं परीक्सा मं बी बैठती टोप करती चलीगी। अर सात साल मं अेम0अे0बी0अेड कर’र थमी। अब म्हूं रूक्मणी की बर्याबर पढ़ी लिखी छी। पढ़ाई बना रूक्यां चालरी छी कै सरकार नै म्हीं थर्ड ग्रेड की मास्टरणी बणादी। जद म्हारै तांई पोस्टिंग लेटर मल्यो तो कागज मं गोपालपरो कलां को नांव टाइप होर्यो छो। म्हारा मन मं दगदगो छो कै गोपालपरा का लोग म्हीं मास्टरणी बणी देख’र कस्यो ब्वार करैगा? मन की उमंग उछळ-उछळ’र काळज्या बारै आरी छी कै आपण अब कोई कै बसीभूत कोई न्ह। आपणा पगां पै ऊभी होगी छी म्हूं। इसकूल मं हाजरी देर हेडमाट साब सूं बूझी – साब यां अणजाण गांव मं म्हूं क्हां रूं’गी? हेडमाटसाट बोल्या – असी घबराबा की बात कोई न्ह बेटा। आपणा इसकूल मं कल्याणमल जी बुजरग अध्यापक छै अर वै यां गांव मंई रै छै। दोनी जणा ई बुजरग छैै। वै थंनै वांका मकान मं अेक कमरो दे देगा। कळेस जसी कोई बात कोई न्ह। अेक दन म्हूं छोटा छोरा-छोर्यांई पढ़ारी छी। म्हूं झांकी तो अेक बायर अेक बाळक की आंगळी पकड्यां इसकूल मं आरी छी।
प्हली ऊंनै अेक अध्यापक सूं बातां करी। ऊं अध्यापक नै अेक फारम दे’र म्हारी आडी असारो कर्यो। नजीक आई तो ऊंनै म्हूं अर म्हनै वा पछाणली। वा म्हारी सासू छी। म्हंई देख’र ऊंकै काणा कांई होयो कै माथो पकड़’र जमीं पै बैठगी। फेर पसरगी। ऊंई पसरी देखर सारा मास्टर अर छोरा भाग-भाग’र ऊंकै आस-पास भेळा आण होया। पाणी का छांटा देर होस मं अणाई। वा होस मं आतां ई उठ’र म्हारी आडी झांकती इसकूल कै बारै कढग़ी। गांव मं खबर फैलगी कै इसकूल मं जे नुई मास्टरणी आई छै वा हरिचंदा की घरहाळी छै। भागर गी छी जे। गांव मं कोई आछी क्हबा हाळा बी छा तो कोई बरी क्हबा हाळा बी छा। पण बरी क्हबा हाळां कांई करता? सारा पाड़ा की बायरां म्हं सूं मलबा आई। अब तो म्हारै सुख ई सुख छो। अेक दन स्याम की रोटी खार म्हूं सोबा हाळी ई छी कै सांकळ बाजी। म्हनै बूझी – कुण छै? अेक बायर का बोलारा को आं’ट आयो। सांकळ खोल जे। म्हनै बूझी – कांई काम छै? काम छै। प्हली सांकळ खोल? यां आयां पाछै म्हंसू हाल तांई अस्यां तूकारा सूं कोई बी न्ह बोल्यो छो। म्हूं तमक’र बोली – कुण छै तू? तूकारो देबा हाळी? वा फेर बोली – तू सांकळ तो खोलऽऽऽ। म्हनै सांकळ खोल दी – कुंवाड़ खुल तांई सामै म्हारी सासू ऊबी छी।
अेक बार तो म्हूं बछकी फेर बूझी – थां? थां यां कांई लेबा आया? सब बताऊंगी। प्हली म्हलाडी तो आबा दै? ऊ’बा खैंजड़ा ई बेज पाड़ावैगी कीं? म्हां दोनी नीचै बछी दरी पै बैठग्या। नरी देर तांई वा म्हारा उणग्यारा पै अेक-टक झांकती री तो म्हनै टूंकी – क्हो नै क्हणी होवै जे? वा मसक-मसक रोबा लागगी। फेर पल्ला सूं आंख्या पूंछ’र बोली – थंसूं कांई बायना सूं माफी मांगू जड़ाऊ? म्हां तो थंई मूंडो दखाबा कै भाग बी न्ह र्या। तू आई छी तो। सूना की लावण लेर आई छी। पण म्हां ई फूटा भाग का छा जे थारी कदर न्ह करी। दुख म्हांनै थंई कम न द्यो बेटा। पण धन्न छै तू। थारा सत पै डटी री। भगवान नै थंई थारी तपस्या को फळ बी द्यो। अर म्हां? तू ग्यां पाछै बेटा म्हां मं फोड़ा पड़बू सरू होयो जे हाल तांई पड़ र्या छै। भगवान नै दयावान काळज्या का रूप मं बायर ईं अकूंत पंूजी दी छै जे जरासा दुख दरद की बात पै काळज्यो पसीज जावै छै।
म्हारै बी द्या आगी। जीं की करणी ऊंकी पार उतरणी। म्हनै सोची। फेर बूझी – जे कांई होयो म्हारै पाछै? थारो पग घर बारै कढ़तांई बणा म्हांकै तो घोर दुख का दन आग्या। बड़ी मसकल सूं हरी चंदा को घर बस्यो। ज्यात मं यो परचार होग्यो छो कै जरूर घर परवार मं कोई खोट छै। अर कै छोरा मं कान्कांई कमी छै। घर बंध्यो तो थोड़ा दनां पाछै थारा ससरा जी गुजर ग्या। ऊ तो भाग सूं छोरो होयायो। जे म्हांकै छाऽऽऽळो होग्यो। घर मं हांसी खुसी बावड़्याई। पण बारा म्हीना पाछै छोरा की माई मरगी। अब पाछा ई तीन का तीन। म्हारा हाथ पग बी थक ग्या पण फेर बी घर गरस्ती को सारो काम करूं छूं। न्ह करूं तो कुण करै? या क्हर म्हारी सासू म्हारा मंूडा की आडी झांकबा लागगी। म्हनै याई क्ही कै घणी बरी होई। अर छानी होगी। ओर क्हती बी कांई? मन नै क्ही तू ई छै सारा संकटां की जड़। क्ही तू ई छै सारा संकटां की जड़। वा नरी देर तांई म्हारी आडी झांकती री। कांन्कांई क्हबो तो चावै छी पण जाणै ऊंकी हीमत न्ह होरी छी। म्हीं नींद आरी छी। बार-बार अपास्यां आरी छी। म्हनै क्ही सोवां फेर। वा बोली – बणा थंसूं क्हबो तो चाऊं छूं पण म्हारो मूंडो ई न्ह फाटर्यो। तू क्ह तो क्ह द्यूं? हां-हां क्हो नै? पण जे क्हणो होवै ऊ बेगो सोक क्ह द्यो। म्हीं नींद आरी छै। तडक़ै बेगो उठर सारा काम सूं नमट’र इसकूल जाणो छै। थंनै आग्या देदी तो क्ह ई द्यूं छूं। पण बात थंनै कड़ी लागै तो रोस मत करजे बेटी।
क्हो-क्हो – न्ह मानू बरो। थारै समझ मं आ जावै तो तू थारा घर नै पाछी चाल। देख म्हनै थारै तांई घणो दुख द्यो। म्हूं जाणूं छूं। ऊ माफ करबा कै जोग कस्यां बी कोई न्ह। पण अब म्हूं प्हली की थारी वा सासू कोइन्ह। म्हूं थारा हाथ जोडूं छूं जड़ाऊ। न्ह, न्ह थां म्हारा हाथ मत जोड़ो। म्हूं बच्यार करूंगी। अर काल्ह ज्वाब द्यूंगी। अबार थां जावो। वा चलीगी। पण म्हारा भेजा मं अेक कीड़ो छोडग़ी। जीं नै सारी रात नींद न्ह आबा दी। स्याम की इसकूल सूं आतां ईं वा फेर आगी। आतां ईं बोली – कर्यो कीं बच्यार? हां कर्यो छै। वा रूम-रूम सूं राजी होती बोली -तो फेर कसर कांई बात की छै? चालां? छै नै अेक-दो सरतां छै। कांई छै सरतां? बतातो सणी? अेक सरत तो या छै कै म्हूं कस्या बी हाल मं नौकरी न्ह छोडूंगी। दूसरी सरत या छै कै थां म्हारा कस्या बी काम मं टांग न्ह उळझावैगा। तडक़ा की टैम पै रोटी थांई बणावैगा। म्हं सूं बूझ्यां बना घर मं कांई बी न्ह होवैगो। अर छोरा नै थां समाळैगा। ये सारी सरतां दोनी माई-बेटा कागज पै दसकत कर’र म्हीं देगा। तू चाल तो सणी बणा तडक़ै थारै जमै जस्यां ई सरतां मंडवा लीजे। पण थारो घर तो समाळ। म्हूं थाकगी अब।
भूरमल सोनी, मोबाइल : 9079979733
सामाजिक कार्यकर्ता, आर्टिस्ट, आलेख लेखन । जिला प्रशासन, जिला निर्वाचन अधिकारी ,नगर निगम, नगर विकास न्यास,लोयन्स क्लब,राव बीका जी संस्थान, बीकानेर एवं की संस्थाओं द्वारा सम्मान ।
कविता : मिनख जद पर्यावरण नहीं बचावे ला
मिनख जद पर्यावरण नहीं बचावे ला।
धरती मां पर प्रदूषण फैलावे ला।।
पीवण ने पाणी कोनी मिले ला,
पाणी पताला जावे ला।
नदी, तालाब,पोखर प्रदूषित हो जावे ला।।
माणस पाणी -पाणी करतो मर जावे ला।
बिना वृक्ष बिरखा नहीं आवे ला।।
किसान खेती न कर पावे ला।
जीवन बचावने जद मानखो
धरती पर वृक्ष लगावे ला।।
बूंद बूंद पाणी बचावे ला।
धरती रेआंगणे में हरियाली
और खुशियां छावे ला।।
मिनख जद पर्यावरण नहीं बचावे ला।
धरती सूं जीवन मिट जावे ला।।
इण सांरू मानखो जद
पर्यावरण, पेड़ और पाणी बचावे ला।।
ऋतु शर्मा, मोबाइल 9950264350
साहित्य सर्जण रे साथे समाज रे काम में भी सक्रिय, राजस्थानी-हिन्दी में बरोबर कहाणी कविता लिखै। मंच संचालण रो खासो अनुभव, लोक संस्कृति री चेतना जगावण वास्ते बणायोड़ी गणगौर समिति रा अध्यक्ष, युवा उद्यमी। सरला देवी स्मृति अर कर्णधार सम्मान सूं सम्मानित।
कहाणी : छियां
शैला टाबरां ने बस सूं उतारया ई हा क स्कूल में काम करणियो राहुल आय’र बोल्यो क थानै प्रिंसीपल मैडम बुलाया है। राहुल बियां तो स्कूल रो कर्मचारी हो, पण नीं जाणे क्यों उण रो देखणो श्यामली ने नीं सुहावतो हो। प्रिंसीपल मैडम रे कमरे कांनी जांवती शैला घणी राजी ही, क्यूंके उण ने आप रे काम पर घणो भरोसो हो। मन सूं काम करती। उण रो काम हो टाबरां ने उणां रे घरां तांई छोडणो अर लाणो जिम्मेदारी रो काम हो, क्यूंके उण ने ठाह राखणी पड़ती क कोई गाडी-घोड़ा तो साम्हीं सूं नीं आवै। अजे तांणी उण री किणी टाबर रे माइत कांनी सूं कोई शिकायत नीं आई। उण ने आपरे काम माथै गुमेज हो। वा प्रिंसीपल रे कमरे कांनी बधती घणी राजी ही। प्रिंसीपल किणी सूं बात करे ही। थोड़ी ताळ में प्रिंसीपल उणं ने बुलाय लीवी। शैला ने देखतां ई प्रिंसीपल बोली, ‘शैला, थांरो काम घणो सांतरो है पण सुणी है थारो विगत ठीक नीं है, काल ई किणी शिकायत करी है…सॉरी म्हांनै अबै थारो हिसाब करणो पड़सी।’‘म्हैं समझी नीं मैडम…’‘इण में समझण री कांई बात है शैला, तू थारे विगत ने तो जाणती ई हुवेली। बस, बे ही बातां थारी अबखाई बणगी। सुरसती रे मिंदर में अे सै कियां चालै…?’‘शैला कीं समझी, कीं नीं समझी पण प्रिंसीपल मैडम उण हिसाब कर दियो। वा लिफाफे ने काठो पकड़’र निकळी तो लाग्यो जियां मारग घणो लंबो हुयग्यो है। राहुल बारै खड़ो मिळियो, ‘वो पूछण खातर साम्हीं आयो, पण शैला आपरो मारग बदळ लियो…’ स्कूल में नौकरी लाग्यां पछै तो उण ने लागतो जाणै सुख रा दिन नैड़ै आयग्या है। अचाणचक पाछा वे ई घोड़ा अर वे ही मैदान।बापू री श्यामली रे शैला बणन री भी अेक कहाणी ही। शैला ने आज श्यामली याद आवे ही। बापू री तो श्यामली ई ही। बापू रे गयां पछै उण माथै चढिय़ो कर्जो अर ब्याज माथै ब्याज भारी पड़बा लाग्यो। घर में कीं खावण रो ही जुगाड़ नीं हो तो फेर चुकांवता कियां। पैली खेत गया, फेर बाखळ अर देखतां ही देखतां घर रे घर में किरायेदार हुयग्या। इण बीखे ने देखतां मां री बीमारी बधण लागी। खाली-खाली निजरां सूं भाई ने देखती। मां जाणती सौ कीं पण कांई कर सकती। सिलाई कर-कर दोनूं कियां ई घर रो गाडो गुडक़ांवता। मां चावै ही क श्यामली वास्ते कोई घर-वर मिळ जावै तो हाथ पीळा कर दे। पण भगवान ने कीं दूजो ही मंजूर हो। अेक दिन जमना ताई घरां आई अर मीठे री एक डब्बी देंवती बोली, ‘ले बेटी…’श्यामली री मां बोली, ‘पम्मी री सगाई कर दी कांई?’‘ अरे किसी सगाई। म्हारी पम्मी तो कमाऊ पूत सूं भी बेसी कमावे। स्हैर सूं आज ई आई है। थांरै खातर खास आ डब्बी लेय’र आई है।’‘मां फेर आपरी चिंतावां लिया बैठगी। जमना कोई घर-वर देख ले तो श्यामली ने परणाय दूं।’‘कांई तू भी परणावण री चिंता करे। म्हारी भी बेटी परणावण सारु है, पण…’ ‘पण कांई?’‘काळजे भाटो तो राखणो पड़ेला, पण जूण सुधर जासी थारी। बेटो चोखी पढ़ाई करसी तो श्यामली रा मांगा साम्हीं आसी…’‘साच्याणी, स्हैर सूं छोरो आय’र श्यामली रो हाथ नीं मांगे तो म्हनै केय दिये।’‘देख श्यामली, जमना ताई कांई केवे है…’ मां बोली तो श्यामली कीं पडु़त्तर नीं दियो। ‘अरे केवण री कांई बात है। तू जे हां कर देवे तो श्यामली किसी मना करसी।’ जमना श्यामली साम्हीं देखती बोली। ‘आप ने जियां ठीक लागे…’ ‘तो ठीक है फेर, अब पम्मी रे सागे थारा कपड़ा भी घाल देसां। बठै ई रेवो अर काम करो।’
‘पण मां आप सूं दूर…’
‘तो कांई हुयो। बेटियां तो हुवै ई परायो धन। आज नीं तो काल, सासरे जावणो ई है। बठै मां किसी आवेली…फेर जियां थारै सागे पम्मी है, अठे म्हैं हूं…थारी मां रे सागे…हरजस गांवतां ई आ जूण निकळनी है…’ जमनाताई बोली।
श्यामली तो जाणे कद सूं इयां ई चांवती ही। पण कोई बात सिरो नीं झालती। आज तो घरे बैठां ई गंगा आयगी। पम्मी रा बढिय़ा कपड़ा, खसबू, गैणां, सेंडलां, मेकप रा समान अर बटवे में ठूंसियोड़ा रिपिया। श्यामली अर पम्मी सागे पढ़ी अर आज उण रा रौब देखतां ई श्यामली ने लागतो क अे सब उण रे कने क्यों नीं है।
जमना ताई आई तो इयां लाग्यो जियां उण रा सपना पूरा हुवण आळा है। जाणै सैं की तै हो। पम्मी तो त्यार ही। दो दिन में ही श्यामली स्हैर जावण री त्यारी कर ली। स्हैर तो बियां ई चकाचौंध करे। श्यामली ने तो पैलपोत सैर री हवा लागी ही। वा उमाव सूं भरी सडक़ां पर भागती-दौड़ती कारां में ही उळझगी ही। पम्मी सूं निजरां मिळती तो दोनूं मुळक जांवती।
गांव सूं सैर में आया तो पम्मी रो छोटो सो फ्लेट देखतां ई उण ने जाणे पंख लागग्या। पम्मी बतायो क ओ वा मोल लियो तो श्यामली री आंख्यां फाटगी। मन ई मन सोचे ही इसो कांई करे पम्मी। पम्मी जांणगी उण रे मन री बात। साफ-साफ बतायो क कांई करै। श्यामली रे सरीर में तो जाणे लकवो मार ग्यो। कीं देर तो वा सरणाटे में ई रैयी। पण फेर श्यामली ने पम्मी समझायी, ‘बडे स्हैरां में अेकली लुगायां वास्ते आपरी देह ने रुखाळणो घणो दोरो काम…’
श्यामली रे अेकर तो मन में आई क कह देवे नीं रेवणो स्हैर में। पण फेर मां रो चैरो घूम्यो। वा पम्मी रे खोळे में माथो राख’र रोवण लागी। पम्मी उण रे माथे में हाथ फेरती रैयी। फेर बोली, ‘अब म्हारी बात मान, सिंझ्या सागे चालसां, बाळ भी बांको नीं हुवैला, रुपया मिळसी जका अलायदा…’
‘पण करणो कांई हुवेला…’
‘डांस…फिल्म्यां में बडी-बडी हीरोइनां करे, वे भी पइसां खातर करे…’
श्यामली ने नाचण रो घणो कोड हो। घूमर, कालबेलिया अर पणिहारी में उणरी गैरी रुचि ही। पम्मी उण ने याद करांवती बोली, ‘बियां ई नाचणो है…’
सिंझ्या वास्ते दोनूं त्यार हुयगी। श्यामली ने लेय’र पम्मी बार माथै पूगी तो मैनेजर री निजरां ने श्यामली सह नीं सकी। पम्मी उण ने लेयने मांय गई तो धुएं अर बास सूं भरियोड़ी बार में श्यामली चेताचूक हुवण लागी। पम्मी वास्ते कोई नंूवी बात नीं ही। वा नाचण ढूकी तो नोटां री निछावरां हुवण लागी। दो-तीन बार तो पम्मी श्यामली ने इसारे सूं बुलायी, वा नीं आई तो खुद ही मस्त हुयनै नाचण लागी। उण रे ऊपर हुंवती निछावर ने अंवेरण खातर दो-तीन छोरा हा, वे नोट भेळा करण में लागियोड़ा हा। बार बंद हुवण रे बाद पम्मी थकियोड़ी आई तो देख्यो श्यामली डरूं-फरूं खड़ी ही। नोट भेळा करण आळा छोरा पम्मी रे आगे पइसा राख दिया। पम्मी रिपिया गिणिया अर कीं नोट छोरां ने झलाय’र श्यामली ने लेय’र आगे बधगी।
पाछी दोनूं फ्लेट में आयी तो श्यामली साफ केय दियो क वा उण रे सागै काम नीं कर सके। पम्मी समझावण री कोसिस करी, पण वा नीं मानी। पम्मी बोली, ‘सोच ले, थारे माथै थारे भाई अर मां री जिम्मेदारी है…पाछी जायनै कांई मूंडो दिखावेली अर करेली कांई।’
श्यामली ने लाग्यो जियां वा बुरी तरै फंसगी है। पण पम्मी पैली तो उण री भायली ही। वा उण ने समझायो, पण फेर सोच’र बोली जिया थाी मरजी। ‘ओ बडो स्हैर है, कोई न कोई काम मिळ ई जासी, तू म्हारे सागे रेय सके जद तांई चावै, मैं थने बार में चालण वास्ते कदैई नीं बोलू…’
श्यामली सोचती जावे ही। दो महीनां पैली ई तो श्यामली आप रे खातर अेक कमरो लियो हो। उण ने कांई ठाह ही क इयां हुय जासी। श्यामली खाथा-खाथा पग उठांवती जावै ही। उण ने ठाह नीं हो क आगे कांई हुवणो है, पण वा जाणे ही पम्मी रे सागे रेवण रो ओ फळ मिळियो है।
वा सोचे ही पम्मी फगत इण खातर गळत हुय सके क वा बार में नाचे अर वो जको उण ने बार में देख्यो, कोई उण ने नीं पूछियो क तू कियां गयो। उण ने लाग्यो क प्रिंसीपल मैडम जे ओ सवाल पूछती तो स्यात साच कीं ओर अरथां में साम्हीं आंवतो। पण किण ने दोस। फेर सारी सजावां दोस करण आळां ने ई तो नीं मिळै। उण रो कांई दोस।
शैला साम्हीं कदै मां तो कदै भाई रो चैरो आवण लाग्यो। सोचती-सोचती घरां आयगी। उण ने लाग्यो दुनिया रा सारा दरवाजा बंद है। दुनिया रा सारा मरद उण ने बीं रात बार में देख चुक्या है। उण री पिछाण बदळ चुकी है। अब वा फगत अेक लुगाई नीं रैयी है। उण रे सांम्हीं पम्मी रा चितराम मंडण लाग्या। उण ने लाग्यो क लोग नोट उछाळे है, छोरा नोटां ने भेळा करण में लाग्योड़ा है। वा जोर से चिरळाई। उण रे कमरे में कोई नीं हो। शैला रा कंठ सूखे आ। तिस रे कारण बेहाल ही। आपरी जगां सूं उठी अर चरू सूं पाणी लेय’र पीवण लागी। कंठां सूं पाणी उतरियो तो कीं जान में जान आई। अब कांई हुवेला? कांई करेला? जिसा सवाल उण ने फेरूं घेरण लाग्या।
मोबाइल फोन घूं-घूं करतो सुणीज्यो। वा देख्यो, गांव सूं फोन आयो है। फोन मां करियो हो, ‘हां…मां!’ साम्हीं सूं मां कीं बोली। पडु़त्तर में शैला बोली, ‘काल दिनूगे मनी-आर्डर भेज देसूं…’
शैला मोबाइल में नंबर लगाया, ‘हलो…पम्मी…’
भुवालका जनकल्याण ट्रस्ट से पुरस्कृत होने पर बीकानेर में मधु आचार्य ‘आशावादी’ का नागरिक अभिनंदन
वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार व साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ का नागरिक अभिनंदन समारोह बुधवार को बीकानेर के पीएन पैलेस में ‘मधुरम’ कार्यक्रम के तहत हुआ। यह कार्यक्रम हाल ही में आचार्य को भुवालका जन कल्याण ट्रस्ट, कोलकाता द्वारा साहित्य के क्षेत्र में महती योगदान के लिये मिले सम्मान के लिए आयोजित किया गया। कार्यक्रम में श्रीडूंगरगढ़ विधायक गिरधारीलाल महिया, नोखा विधायक बिहारीलाल बिश्नोई, नगर विकास न्यास के पूर्व अध्यक्ष मकसूद अहमद, पूर्व विधायक डॉ.विश्वनाथ, भाजपा नेता सत्यप्रकाश आचार्य, भवानीशंकर आचार्य, विजय आचार्य, व्यवसायी व समाजसेवी राजेश चूरा, जननारायण व्यास कॉलोनी थाना प्रभारी अरविंद भारद्वाज ने आचार्य का अभिनंदन किया।




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