गु्रप ऑफ 23 ने राहुल गाधी को अध्यक्ष स्वीकार करने से किया इंकार,पढ़ें पूरी खबर

लॉयन न्यूज,बीकानेर। कांग्रेस में मचे नेतृत्व को लेकर घमासान एक बार फिर जून तक टाल दिया गया हैं। दरअसल 23 नेताओं के गुट,जिसने संगठन की डूबती हुई हालत को लेकर कांग्रेस अध्यख सोनिया गांधी को पत्र लिखा था। जिसमें कहा गया है कि राहुल को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करने से एक बार फिर से इंकार कर दिया हैं। दो दिन पूर्व वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिये हुए कांग्रेस वर्किग कमेटी की मीटिंग में उन्होंने अपने ऐतराज ओर शर्ते रख दी थी। हालांकि जनवरी या फरवरी में होने वाले संगठन चुनाव जाहिर तौर पर आगामी विधानसभा चुनावों के आधार पर टाले गये हैं, लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि सोनिया गांधी ने चुनावों को आगे खिसकाने के आदेश दिया हैं। क्योंकि शीर्ष नेताओ में इस मुद्दे पर सर्वसम्मति का अभाव था कि अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांध के कार्यकाल खत्म होने के बाद पार्टी का अध्यक्ष कौन बनना चाहिए।

पार्टी की सैंट्रल इलेक्शन अथॉरिटी ने मई में संगठन चुनाव कराने का कलैंडर तैयार कर लिया था। लेकिन कुछ नेताओं ने सीडब्ल्युसी की मीटिंग में इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे पश्चिम बंगाल,आसाम,केरल,तमिलनाडू तथा पुंडुचेरी के विधानसभा चुनावों की तैयारियां प्रभावित होगी। सीईए को संगठनात्मक चुनावो के लिए जून के द्धितीयाद्र्ध में नया कार्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी हैं।

राहुल गांधी पार्टी की कमान संभालने के प्रति अपनी अनिच्छा उसी समय से जता रहे है जब जुलाई 2019 में उन्होंने लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार को स्वीकार करते हुए इस्तीफा दे दिया था। विद्रोही नेताओ ंने मीटिंग में ही उन नेेताओं से भिड़ गए जो कि फिर से राहुल को अध्यक्ष बनाना चाहते हैंं। उन्होनें इसका साफ तौर पर विरोध किया ओर कहा कि इस विषय पर निर्णय लेने की काम सोनिया गांधी पर छोड दिया जावे। विद्रोही नेताओं में से एक आनंद शर्मा ने कहा कि राहुल पार्टी के नेता है चाहे वे किसी औपचारिक पद पर हो या नहीं हो। सीडब्ल्युसी की मीटिंग से उभर कर आई मुख्य बात यह है कि फिलहाल कांग्रेस बिना पतवार की नैया ही बनी रहेगी तथा राहुल की अनिश्चयपूर्ण सोच से पार्टी को जबरदस्त नुकसान हुआ हैं।

विरोध कर रहे नेता राहुल की इस बात से नाराज है कि एक तरफ राहुल प्रत्यक्ष रूप से अध्यक्ष के लिए खुल सामने नहीं आ रहे है ओर दूसरी तरफ से वे अप्रत्यक्ष रूप से अध्यक्ष की तरह काम कर रहे हैं। विरोध करने वाले नेताओं को यह स्वीकार्य नहीं हैं। दोनो ग्रुप उस समय एक दूसरे से उलझ गए जब विद्रोही नेताओं ने राहुल को चुनौती दी कि वे बिना किसी पद के चुनावाधीन राज्यो में पार्टी के लिए वोट मांगे। पार्टी के अंदरूनी सूत्र राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर यह दोष गढ़ रहे है कि अशोक गहलोत ने आनंद शर्मा,पी.चिदम्बरम और गुलाम नबी आजाद जैसे कुछ नेताओं का विरोध किया, जो इस बात पर जोर दे रहे थें कि संगठन के चुनावों के साथ ही साथ,सीडब्ल्यूसी के चुनाव भी होने चाहिए। जो पिछले दो दशक से हुए ही नहीं हैं।

अशोक गहलोत इस बात पर उखड़ गए तथा बोले कि इस मांग का यह अथ्र्र निकलता है कि पार्टी के इन नेताओं का विश्वास पार्टी अध्यक्ष से उठ गया है तथा उनकी शह के कारण ही महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग अब उनसे आंतरिक चुनावों की मांग उठा रहे हैं। गहलोत पर पलटवार करने वाले नेताओं में सबसे पहले आनंद शर्मा है जिन्होनें यह जानना चाहा कि आखिर पार्टी को मजबूत करने के लिए सुधारों की सलाह देने वाले लोगों का अपमान क्यों किया जा रहा हैं। शर्मा ने याद दिलाया कि वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ काम कर चुके हैं। किन्तु फिर भी उनकी दशकों की सेवा के बाद भी उनकी निष्ठा पर अप्रत्यक्षत: सवाल खड़ा किया जा रहा हैं। सूत्रों की माने तो जब पुरानी व अनुभवी नेता अम्बिका सोनी ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ऐसी अंदरूनी लड़ाईयों से पार्टी का भला नही होगा, तब जाकर यह टकराहट समाप्त हुई हैं।

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