8 साल पहले 6 नए एम्स (ऑल इंंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) के साथ खुला एम्स जोधपुर आज रिसर्च और मेडिकल सांइस में नई बुलंदियां छू रहा है। दिल्ली एम्स के बाद यह देश का नंबर 2 एम्स है। ऐसे में यह नीट में अच्छी रैंक लाने वाले स्टूडेंट्स की पसंदीदा जगह बन चुका है।
कोविड के दौरान भी अपनी नई खोज और बेहतरीन प्रबंधन के बूते एम्स ने कई उदाहरण पेश किए। लेकिन एम्स से सबसे अधिक फायदा हमें भविष्य में मिलने वाला है। मेक इन इंडिया कैंपेन के तहत जोधपुर एम्स आने वाले समय में बायो मेडिकल डिवाइसेज तैयार करने का एक बड़ा हब बनेगा।
इनोवेशन सेल के माध्यम से यहां के डॉक्टर्स भी डिवाइसेज बना पाएंगे। एक तरह से एम्स इन डिवाइसेज को तैयार करने का प्रोसेस डवलप करेगा। अभी तक बायो मेडिकल डिवाइसेज का आयात करना पड़ता है। इस कारण इस पर लागत भी अधिक आती है और इलाज का खर्चा भी बढ़ जाता है।
यही नहीं आने वाले सालों में एम्स में हार्ट ट्रांसप्लांट के अलावा अन्य बॉडी पार्ट भी ट्रांसप्लांट हो सकेंगे। इसका खर्चा प्राइवेट अस्पतालों की तुलना में काफी कम होगा। अभी यहां किडनी ट्रांसप्लांट किया जा रहा है। हार्ट ट्रांसप्लांट करने वाला यह प्रदेश का दूसरा सरकारी इंस्टीट्यूट होगा। इससे पहले जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज में हार्ट ट्रांसप्लांट किया जा रहा है।
अन्य राज्यों के छात्र आ रहे हमारे एम्स में, बेस्ट डॉक्टर्स देने का ग्राफ बढ़ेगा
नीट यूजी के बाद मेडिकल कॉलेजों के लिए चुने जाने वाले छात्रों के बारे में धारणा यही है कि वे अपने ही राज्य का एम्स या मेडिकल कॉलेज चुनते हैं। जोधपुर एम्स में राजस्थान के साथ अन्य राज्यों के छात्र भी एडमिशन ले रहे हैं। दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज को छोड़कर भी छात्र यहां आए। भाषाई दिक्कत होने के बाद भी तेलंगाना जैसे राज्य से भी छात्र यहां आ रहे हैं। इसके अलावा गुजरात, हरियाणा, मध्यप्रदेश, बिहार आदि राज्यों से छात्र जोधपुर एम्स में दाखिला ले रहे हैं।
छात्रों का भरोसा हमारे एम्स पर बढ़ रहा है। राजस्थान की मरुभूमि में अनेक चुनौतियों के बावजूद इस संस्थान ने कीर्तिमान स्थापित किए हैं। 2012 बैच से निकले 5 स्टूडेंट्स अमेरिका में इंटर्नशिप करके आए हैं। संस्थान के छात्र रहे डॉ. अभिजीत सिंह ने तो वहां के डॉक्टर्स की लिखी पुस्तक में अपना नाम भी दर्ज कराया है। पहले बैच के 30 प्रतिशत स्टूडेंट्स का पीजी आई चंडीगढ़, एम्स में पीजी में चयन हुआ है। इससे यह भी साफ है कि आने वाले सालों में राजस्थान मेडिकल शिक्षा का मजबूत केंद्र बनकर उभरेगा।
फिलहाल प्रदेश में 15 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, जबकि 15 को केंद्र की मंजूरी मिल चुकी है। इसके अलावा 3 जिलों में मेडिकल कॉलेज खोलने का प्रस्ताव भी केंद्र को भेज दिया गया है। अभी इन 15 कॉलेजों में 2800 से अधिक मेडिकल सीटें हैं। जल्द नए कॉलेज खुलने के बाद यह संख्या 5000 के पार चली जाएगी। इसके बाद हमारा राजस्थान देश को बेस्ट डॉक्टर्स देने के ग्राफ में और भी ऊंचा स्थान पाएगा।
कोविड के बीच 2020-21 का एमबीबीएस बैच शुरू करने वाला पहला संस्थान बना एम्स
कोविड के बीच एम्स जोधपुर 2020-21 सत्र के एमबीबीएस बैच को सबसे पहले शुरू करने वाला संस्थान बना। अभी तक प्रदेश के दूसरे मेडिकल काॅलेज अपने यहां नए सत्र का बैच शुरू नहीं कर पाए हैं। वहीं एम्स जाेधपुर का बैच शुरू हाेने के बाद दूसरे नेशनल प्राइड के संस्थानाें ने अपने बैच शुरू करने की कवायद की।
आगे बढ़ने की गारंटी; यहां से पासआउट स्टूडेंट सुपर स्पेशलिटी पढ़ाई को चुनते हैं
एम्स के एमबीबीएस साल 2012 बैच के 50 में से 41 स्टूडेंट्स पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स के लिए चुने गए हैं। साल 2013 बैच के 37 छात्र एम्स/पीजीआई/जिपमेर में हैं और कुल 58 छात्र पीजी कर रहे हैं। वहीं साल 2014 के 40 छात्र पीजी के लिए चुने गए। इन स्टूडेंट्स में से 27 पीजीआई/एम्स/जिपमेर/निमहांस के लिए चुने गए। साल 2015 बैच के छात्र अभी इंटर्न हैं। पांच स्टूडेंट्स का चयन आईएनआई-सीईटी में हो गया है। यानी एम्स से एमबीबीएस करने के बाद भी अधिकांश छात्र अपनी प्रैक्टिस करने की जगह पीजी व उसके बाद सुपर स्पेशलिटी की पढ़ाई करते हैं। एम्स जोधपुर में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स शुरू हो चुका है।
रिवर्स टेलीमेडिसिन टेक्निक डवलप की
कोविड-19 के दौरान एम्स ने रिवर्स टेलीमेडिसिन टेक्निक डवलप की है। इस टेक्निक में डॉक्टर घर पर रहेगा और मरीज अस्पताल में होगा। इसकी मदद से दोनों के बीच कम्यूनिकेशन हो पाएगा। डॉक्टर इलाज को स्क्रीन पर देखकर सर्पोटिंग स्टाफ को निर्देश दे पाएगा।
12-15 स्टूडेंट्स को हर साल आईसीएमआर से मिलती है स्कॉलरशिप
बायोकेमिस्ट्री विभाग के डॉ शैलेन्द्र द्विवेदी को जापान की तरफ से उनके कैंसर पर किए गए शोध के लिए 1 लाख येन (करीब 72 हजार रुपए ) दिए गए हैं। यूरोलॉजी विभाग के सीनियर रेजिडेंट डॉ सुरेश गुप्ता को चीन ने सात दिन की ट्रेनिंग के लिए ग्रांट प्रदान की है। फिलहाल संस्थान के तीन स्टूडेंट्स यूएसए में पढ़ रहे हैं।
यहां के डॉ. अभिजीत सिंह बराथ न्यूरोसाइंसेस में पीएचडी कर रहे हैं। डॉ. रघुमॉय घोष सिंगापुर से पीजी कर रहे हैं। दवाओं की डिलीवरी के लिए यहां के छात्र तन्मय मोतीवाला ने रोबोट तैयार किया है। एम्स दिल्ली में 64 एनुअल आईपीएचसीओएन में डॉ. थोटा राजशेखर ने पहला पुरस्कार जीता। इसी तरह डॉ. जिगिश रूपारेला ने स्कलबेसकॉन साल 2019 में दूसरा पुरस्कार पाया। हर साल आईसीएमआर द्वारा आयोजित स्टूडेंटशिप में लगभग 12-15 स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप मिल जाती है। डॉ. ईशा को भी गायनी की काॅन्फ्रेंस में पहला पुरस्कार मिला है।
कोरोनाकाल में सबसे असरदारः पीपीई किट व रोबोट बनाया, 68 लैब्स को जांच करना सिखाया
- कोरोनाकाल में भी जोधपुर एम्स की असरदार भूमिका सामने आई। एम्स ने वायरस से बचाने के लिए पीपीई किट को कस्टमाइज्ड तरीके से डिजाइन किया। बनवाकर सभी को दिया।
- कोरोना से लड़ने के लिए डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के लिए प्रोटेक्टिव बॉक्स बनाया और पेटेंट कराया। एक सारथी स्ट्रेचर भी बनाया। {डब्ल्यूएचओ के सॉलिडिट्री ट्रायल में भाग लिया। आयुर्वेद यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर आयुष की 64 दवा का ट्रायल एम्स में हुआ। आईसीएमआर के ट्रायल एम्स में हुए।
- मरीजों तक खाना, दवा आदि पहुंचाने के लिए एक रोबोट बनाया। यहां करीब दो दर्जन से अधिक रिसर्च पेपर पब्लिश किए जा चुके हैंं।
- राजस्थान की 30 लैब को आरटीपीसीआर जांच करना सिखाया। गुजरात की 38 लैब में आरटीपीसीआर करना सिखाया गया।
- राज्य के अस्पतालों में बने आईसीयू में ड्यूटी कर रहे 150 से अधिक मेडिकल ऑफिसर्स को ट्रेनिंग देकर आईसीयू केयर के बारे में बताया।
- राजस्थान और बिहार के 1 हजार से अधिक डॉक्टर्स, नर्सेज और पैरा मेडिकल स्टाफ को कोराेना से निपटने के लिए ट्रेनिंग दी।
- स्कूलों-कॉलेजों में कोरोना के चलते व्यवहार में बदलाव के लिए कार्यक्रम के माध्यम से अभियान चलाया।
- स्टूडेंट्स को पढ़ाने, रिसर्च करने व मरीजों के इलाज में बेहतर कार्य करने के साथ ही आमजन को कोरोना के प्रति जागरूक भी किया गया।
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