सियासी दलबदलुओं की लंबी फेहरिस्त, काेई पास तो कोई फेल

हॉर्स ट्रेडिंग! यानी सरकार गिराने और बनाने के लिए नेताओं की खरीद-फरोख्त, राजस्थान के सियासत में यूं तो यह शब्द नया नहीं है, लेकिन बीते एक साल में यहां इस फिकरे का इस्तेमाल शायद सबसे ज्यादा हुआ है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बार-बार बयान दे रहे हैं कि उनकी सरकार को अस्थिर करने के लिए भाजपा हॉर्स ट्रेडिंग कर रही है। हालांकि राजस्थान की राजनीति पर नजर डालें तो यहां नेताओं की आवाजाही नई बात नहीं है।

पिछले दिनों घनश्याम तिवाड़ी की भाजपा में वापसी हुई। वहीं लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा के साथ गठबंधन करने वाले आरएलपी नेता हनुमान बेनीवाल अब भाजपा से जाऊं-जाऊं की रट लगा रहे हैं। यूं तो राजस्थान की राजनीति में नेताओं की आवाजाही का इतिहास पुराना है लेकिन पिछले एक दशक में इस चलन ने रफ्तार पकड़ी है। ज्यादातर मामलों में दलबदल का हश्र निराशजनक ही रहा।

दलबदलुओं का दशकों का इतिहास; कभी सरकार बचाई तो कभी गिराई

राजस्थान में भी दलबदलुओं का इतिहास पुराना रहा है। राजस्थान में दलबदल के दो सफल प्रयोग हुए। पहला हुआ 1990 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को 85 तथा जनता दल को 54 सीटें मिलीं थीं। इसके बाद जनता दल के विधायकों को तोड़ भाजपा ने भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में सरकार बनाई। दरअसल लालकृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा के दौरान बिहार में हुई गिरफ्तारी से उपजे राजनीति हालातों के चलते राजस्थान में अक्टूबर 1990 में जनता दल ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। शेखावत सरकार अल्पमत में आ गई, लेकिन 6 नवंबर 1990 को जनता दल में विभाजन हो गया।

इस दल के 20 सदस्यों ने जनता दल डी नामक अलग दल बना लिया। कुछ दिन बाद ही इस दल के सदस्यों की संख्या 26 हो गई। यह दल भाजपा के साथ सरकार में शामिल हो गया। सरकार बच गई। नवंबर 1993 में विधानसभा चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। इसके बाद 95 सदस्यों वाली भाजपा ने निर्दलीयों के सहयोग से भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में सरकार बनाई।

छह सदस्यों वाले जनता दल में विभाजन हो गया। इसके तीन सदस्य भारतीय जनता दल बनाकर सरकार में शामिल हो गए। 2008 व 2018 में दलबदल की फिर कहानी दोहराई गई। बहुमत से कुछ ही दूर रही कांग्रेस ने निर्दलीयों के सहयोग से पहले अशोक गहलोत के नेतृत्व में सरकार बनाई उसके बाद बसपा के सभी 6 विधायकों को अपने खेमे में मिला लिया।

राजस्थान के दल बदलने वाले नेताओं की सूची
सियासी चर्चा यह भी है कि तिवाड़ी के पीछे कांग्रेस में गए कुछ और भाजपा नेताओं की घर वापसी जल्द होगी। ऐसे दर्जनों नेता हैं जिन्होंने दल बदला और सफल रहे लेकिन ऐसे नेताओं की फेहरिस्त भी कम नहीं है जिन्हें अपमान का घूंट पीकर लौटना पड़ा। बीते दो दशकों में करीब 40 से ज्यादा नेताओं ने अपनी निष्ठाएं बदलीं। इनमें सुभाष महरिया, अभिनेष महर्षि, विश्वेंद्र सिंह-जसवंत यादव,सुरेंद्र गोयल, ममता शर्मा, किरोड़ी मीणा, प्रहलाद गुंजल,शैलेंद्र जोशी, देवीसिंह भाटी, राजेंद्र राठौड़, राजकुमार रिणवा, मानवेंद्र सिंह, राजेंद्र गुढ़ा के नाम शामिल हैं।
लौटे : वे नेता जिनकी घर वापसी हुई

  • घनश्याम तिवाड़ी : वसुंधरा राजे से नाराजगी के चलते घनश्याम तिवाड़ी और मानवेंद्र सिंह ने विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया था। संघ विचार धारा वाले तिवाड़ी को कांग्रेस में तवज्जो नहीं मिली। सत्ताधारी कांग्रेस ज्वाइन करने के बाद भी उनका सियासी अज्ञातवास खत्म नहीं हुआ। उन्हें फिर से भाजपा का हाथ थामना पड़ा।
  • सुभाष महरिया : वसुंधरा राजे के कहने पर कांग्रेस को छोड़ भाजपा में आए लेकिन दो साल पहले फिर से भाजपा छोड़ कांग्रेस में चले गए।
  • डॉ. किरोड़ी लाल : खुद की पार्टी बना चुनाव लड़ा हार के बाद फिर भाजपा का दामन थामा। अब राज्यसभा सांसद हैं।
  • प्रहलाद गुंजल : भाजपा को छोड़ 2008 में निर्दलीय चुनाव लड़ा फिर 2013 में भाजपा में शामिल हो गए।
  • शैलेंद्र जोशी : कांग्रेस छोड़ भाजपा आए और कुछ समय बाद वापस कांग्रेस में लौट गए।

मिली तवज्जो : पार्टी छोड़ी तो मंत्री बन गए

  • जसवंत यादव : अलवर कांग्रेस के अध्यक्ष रहे जसवंत यादव को भाजपा ने रातों रात तोड़ कांग्रेस के सांसद प्रत्याशी नवल किशोर के सामने चुनावी मैदान में उतारा। यादव ने नवल किशोर शर्मा को हराया। बाद में वसुंधरा राजे की सरकार में जसवंत यादव को कैबिनेट मंत्री का पद मिला।
  • विश्वेंद्र सिंह : भरतपुर राज परिवार के विश्वेंद्र सिंह पहले भाजपा से सांसद थे लेकिन 2008 की बगावत में उन्होंने भाजपा से इस्तीफा देकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली। मौजूदा सरकार में विश्वेंद्र सिंह को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला। लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत के बाद उनकी मंत्री पद से छुट्टी हो गई।
  • राजेंद्र राठौड़ : जनता दल छोड़ भाजपा का दामन थामा। इसके बाद वे भाजपा सरकार की हर सरकार में मंत्री बने।
  • राजेंद्र गुढ़ा : दो बार बसपा को छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए। पिछली गहलोत सरकार में मंत्री बने। इस बार मंत्रिमंडल फेरबदल में कुछ मिल सकता है।


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