सरकारी जमीन पर निगमकर्मियों के कब्जे को कोर्ट ने माना अवैध, हटाने के आदेश

शहर की पुरानी कचहरी के पीछे कीमती सार्वजनिक जमीन पर नगर निगम के कर्मचारियों ने ही कब्जा कर लिया। इस मामले को लेकर शिकायतें हुईं, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। मजबूरन स्थानीय लोगों को सामने आना पड़ा। उन्होंने कोर्ट में केस किया तो अतिक्रमण हटाने के बजाए निगम ने यह कह दिया कि आप कौन होते हैं केस करने वाले? आखिर इस मामले में कोर्ट ने न्याय किया। केस करने वालों की हिम्मत को सराहा और आदेश दिए कि अतिक्रमण हटाया जाए। कोर्ट ने फैसले में नगर निगम कर्मियों पर तल्ख टिप्पणी भी की है।

पुरानी कचहरी के पीछे नगर निगम का सामुदायिक भवन है जिसके पास सार्वजनिक जमीन खाली थी। सामाजिक कार्यों में इसका उपयोग होता था। निगमकर्मी राजेश उर्फ कुक्कू और अमित आजाद ने अगस्त 17 में इस जमीन पर अवैध निर्माण शुरू कर दिया। पहले यह जमीन यूआईटी की थी और बाद में नगर निगम को ट्रांसफर हुई इसलिए स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत अधिकारियों से की। इसके बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की। अतिक्रमियों ने बाउंड्री बनवा टीनशेड डाल दिए। साथ ही लोहे का दरवाजा लगा दिया।

अतिक्रमी के खिलाफ गया उसका हलफनामा
एक ओर राजेश उर्फ कुक्कू आजाद ने पुश्तैनी समय से कब्जा होने की बात कही। दूसरी ओर शपथपत्र में लिखा कि उसने बाउंड्री बनवाई, टीनशेड डाला और गेट लगवाया। ऐसे में कोर्ट ने माना कि उसी की साक्ष्य से साबित नहीं हो रहा कि पूर्वजों के समय निर्माण किया गया हो, बल्कि नगर निगम कर्मचारी होने का लाभ उठाकर जमीन पर कब्जा कर अवैध निर्माण किया जाना स्पष्ट साबित हो रहा है। इसके अलावा नक्शों में सामुदायिक भवन के पूर्व में खुली जमीन और उसके बाद एक मंदिर है। ऐसे में यह पूरी जमीन सामुदायिक भवन, सामाजिक उपयोग और उपभोग की होना साबित होता है।
जज ने दावा करने के साहस की सराहना की
फैसले में एडीजे संख्या एक के जज जमीर हुसैन सैयद ने लिखा कि किसी सार्वजनिक संपत्ति में समाज के प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत हित भी होता है। सरकारी सार्वजनिक भूमियों पर किसी न किसी अनुचित पद या प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए कब्जा किया जाता है, तो आमजन उसके विरोध में नहीं आते। वादियों ने सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण को हटाने और रोकने के लिए अपने व्यक्तिगत हित बताते हुए दावा करने का साहस किया। केवल यह अनुतोष मांगा की नगर निगम और यूआईटी प्रतिवादियों के अतिक्रमण को हटाएं और निर्माण कार्य करने से रोकें तो इस कार्य के लिए सराहना की जानी चाहिए।

शिकायत पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने पर मजबूरन चार आदमियों को लड़ना पड़ा केस

शिकायत पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने पर मजबूरन चार आम आदमियों को केस करना पड़ा। वीरेंद्र इकलेरिया, पूरन मच्छो, विनोद सारवान और लक्ष्मण ने कोर्ट के समक्ष प्रकरण रखा तो कोर्ट ने सुनवाई शुरू की। केस में नगर निगम और यूआईटी दोनों पक्षकार हैं। दोनों ने मौके पर अतिक्रमण होना माना, लेकिन आम लोगों द्वारा किए केस को खारिज करने की मांग की। दलील दी कि केस करने से पहले उनसे अनुमति नहीं ली गई।

जिसे खारिज करते हुए कोर्ट ने फैसला करते हुए लिखा कि आम आदमी निगम और यूआईटी को यह निर्देशित कराने का अधिकार रखते हैं कि वे प्रतिवादियों (निगमकर्मियों) द्वारा किए अतिक्रमण को हटाकर उन्हें पाबंद करें। कोर्ट ने फैसले में नगर निगम कर्मियों पर तल्ख टिप्पणी की है। राजेश उर्फ कुक्कू आजाद ने कोर्ट ने खाली जमीन को पुश्तैनी बताया। दूसरी तरफ इसे साबित करने के लिए कोर्ट में ना तो कोई दस्तावेज पेश किए, ना ही कोई गवाही करवाई। इस पर कोर्ट ने लिखा कि खाली जमीन सार्वजनिक उपयोग और उपभोग की रही है। किसी नगर निगम के कर्मचारी को इस बात का लाभ उठाने नहीं दिया जा सकता है कि वह सार्वजनिक जमीन पर अपना अवैध अतिक्रमण कर ले।



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अतिक्रमण करने वालों ने बाउंड्री बनाकर टीनशेड डाला


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