लांबड़ा प्रकरण में भील आदिवासियों को हटाने के लिए प्रशासन ने पुलिस का पहली बार इस्तेमाल किया। यह आरोप अनुसूचित जाति जनजाति एकता मंच बाड़मेर के संयोजक लक्ष्मण बडेरा ने धरने के पांच महीने पूरे होने पर प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया।
बडेरा ने आरोप लगाया कि गडरारोड के उपखंड अधिकारी महावीरसिंह जोधा व तहसीलदार सवाईसिंह व आरआई छैलसिंह राठौड़ ने लांबड़ा गांव के दबंगों के साथ लांबड़ा के भील आदिवासियों को गांव से बेदखल करने की साजिश रची थी। बडेरा ने आरोप लगाते हुए कहा कि गडरारोड के तहसीलदार द्वारा वर्ष 2019 में 55 लोगों पर राजस्थान राजस्व भू अधिनियम 1956 की धारा 91 के तहत 1088 बीघा जमीन से अतिक्रमण हटाने के फैसले दिए थे लेकिन उन फैसलों पर अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल नहीं किया और उनके कब्जे आज भी लगातार जारी होने के बावजूद गडरारोड के उपखंड अधिकारी व तहसीलदार ने कोई कार्यवाही नहीं की। बडेरा ने आरोप लगाया कि गडरारोड के प्रशासन की भेदभावपूर्ण कार्यवाही के विरोध में अनुसूचित जाति जनजाति एकता मंच बाड़मेर द्वारा 27 जुलाई 2020 से बेमियादी धरना देकर विरोध किया जा रहा है।
एकता मंच के ज्ञापन के बाद लांबड़ा गांव की गोचरभूमि पर ताकतवर लोगों के अतिक्रमण चिन्हित किए और अगस्त 2020 में तहसीलदार गडरारोड ने गोचरभूमि से अतिक्रमण हटाने का फैसला दिया था। फैसले के चार महीने के बाद भी प्रशासन ने तहसीलदार गडरारोड के फैसले की पालना में कोई कार्यवाही नहीं की। बडेरा ने आरोप लगाया कि 15 जुलाई को 14 भील आदिवासियों को तहसीलदार ने पुलिस के जरिए तहसील कार्यालय में लाकर बैठा दिया। गरीब भील आदिवासियों को हटाने के फैसले के 21 दिन बाद 15 जुलाई को तहसीलदार ने पुलिस व जेसीबी व ट्रैक्टर लाकर भील आदिवासियों की महिलाओं व बच्चों को जबरन घर से खींचकर बाहर निकालकर अपमानित कर घर से बेघर कर दिया था लेकिन गांव के ताकतवर लोगों को न्यायालय तहसीलदार के फैसले की पालना में हटाने की बात करने पर प्रशासन ना नुकर करके ताकतवर अतिक्रमियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते है।
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