‘आयुक्त साहब, मंदिर का ढांचा तो सीज कर दिया फुटपाथ-सड़क के अवरोधक कब हटाएंगे?’

हाईकोर्ट की नाराजगी के बाद नगर निगम दक्षिण ने अरोड़ा सर्किल से पीली टंकी तक थ्री लेन सड़क के बायीं तरफ निर्माणाधीन मंदिर पर नोटिस चस्पां कर सीज कर दिया। साथ ही लोगों को इस मंदिर में मूर्ति स्थापना या अन्य किसी भी धार्मिक कार्यक्रम नहीं करने की हिदायत देते हुए वार्ड के सफाई प्रभारी को इसकी पालना सुनिश्चित करने के लिए पाबंद किया।

इधर, क्षेत्रवासियों ने सवाल खड़े कर कहा कि फुटपाथ पर बन रहे मंदिर के ढांचे को तो निगम ने सीज कर आदेशों की पालना कर ली, लेकिन करीब एक साल पहले हाईकोर्ट के उन आदेशों की पालना कब सुनिश्चित होगी, जिसमें फुटपाथ को लोगों व राहगीरों के लिए मुक्त रखने और पोल की आड़ में खड़े अवरोधकों को हटाने का कहा गया था।

वहीं अब खाली करवाई गई फुटपाथ पर दुबारा कोई काबिज हुआ तो उसके लिए कौन दोषी होगा? सर्विस लेन व बरामदों में काबिज व्यापारियों को कब हटाया जाएगा? बिना पार्किंग व बिना इजाजत बन रही बहुमंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स को सीज कर तब तक सीजमुक्त नहीं करेंगे, जब तक सीज इमारत में पार्किंग बहाल नहीं कर दी जाती, इसकी व्यवस्था कब सुनिश्चित होगी? किसी भी वार्ड में अवैध इमारत के लिए दोषियों को कब तक अनदेखा किया जाता रहेगा? कब तक शपथ पत्र पर सीज इमारतों को खोलकर उन्हें व्यापार करने का प्रमाण पत्र दिया जाता रहेगा?

हाईमास्ट लाइट बीच रास्ते में, हादसे पर हादसे, नहीं शिफ्ट कर पा रहा निगम
लंबे समय से प्रतापनगर शॉपिंग सेंटर के नजदीक लगी हाईमास्ट लाइट का पोल बीच रास्ते में है। सड़क को चौड़ा करने के बाद डिवाइडर को तो शिफ्ट कर दिया, लेकिन हाईमास्ट लाइट का यह पोल डिवाइडर से दो फीट पहले ऐसा ही खड़ा है। इसको लेकर शिकायतें भी हुईं, लेकिन निगम ने सभी शिकायतों को अनसुना कर दिया। तब से लेकर अब तक हादसे हो रहे हैं।

एक साल में 150 अवैध निर्माण, 50 से ज्यादा सीज, अधिकांश शपथ पत्र पर हो चुकी सीज मुक्त
लॉकडाउन से अब तक जोधपुर के तीनों विधानसभा इलाकों में करीब 150 (आवासीय निर्माण को छोड़कर) व्यावसायिक निर्माण हो गए, यह तो खुद निगम की ओर से करवाए गए सर्वे में खुलासा हुआ था, तब निगम ने 5-7 ऐसी इमारतें तो सीज की थीं, लेकिन उनमें से भी अधिकांश सीज मुक्त हो चुकी हैं।
ऐसी कार्यशैली, सड़क पर बिना इजाजत बने भवन को नियमित करने डीएलबी भेज दी पत्रावली
निगम की कार्यशैली से यू तो पूरा शहर पीड़ित है ही, लेकिन कभी-कभी राजनीतिक दबाव के आगे ऐसे भी उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जिनसे उसकी पूरी कार्यशैली संदेह के घेरे में आ जाती है। अंध स्कूल के सामने नाले के एक तरफ दो साल पहले अवैध इमारत का नियमन करने के बाद कुछ माह पहले दूसरी तरफ भी अवैध इमारत खड़ी हो गई।

हैरानी वाली बात तो यह है कि इसको लेकर कुछ लोगों ने तत्कालीन आयुक्त (उत्तर व दक्षिण) एसके ओला को शिकायत पर शिकायत की, इसके बावजूद इमारत बनती रही। इसके बाद इमारत को सीज किया गया, लेकिन दबाव के चलते सड़क पर बनी (योजना क्षेत्र) इस इमारत को गिराने की बजाय कच्ची बस्ती में नियमन की सिफारिश डीएलबी को भिजवा दी।



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'Commissioner, when the structure of the temple has been sealed, when will we remove the blockage of the footpath?'


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