भाजपा सरकार में जिन्हें घोटाला माना था, कांग्रेस में जनहित बन गए, एसीबी ने जेडीए के इन कार्यों की फाइनल रिपोर्ट भी पेश की
डीडी वैष्णव/कमल वैष्णव | जोधपुर
राजनीति का घोटाला। यही है जेडीए में हुए कथित भ्रष्टाचार का मूल। अशाेक गहलोत सरकार के पिछले कार्यकाल में जेडीए के माध्यम से हुए विकास कार्याें में गड़बड़ी मानते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मुकदमें दर्ज किए थे, गिरफ्तारियां की थी। तत्कालीन जेडीए चेयरमैन को आरोपी मानते हुए अपने दफ्तर बुला-बुलाकर घंटों पूछताछ की थी। अब उसी एसीबी ने कथित गड़बड़ियों को जनहित में किए गए कार्य मानकर एफआर पेश कर दी। इधर, फिर से कांग्रेस सरकार का राज है तो जेडीए ने भी इन्हें जनहित के काम करार देने के बाद ठेकेदारों को भुगतान करने और किए गए कार्याें को सही ठहराने पर अपनी मुहर लगाकर बोर्ड की अनुशंसा के साथ सरकार को भेजने की तैयारी कर ली है। अब एसीबी कोर्ट इन एफआर और कथित भ्रष्टाचार की अंतिम रिपोर्ट पर अपना फैसला देगी। मुमकिन है कि सीधे तौर पर तत्कालीन चेयरमैन राजेन्द्र सोलंकी को इस पूरे मामले मे क्लिनचिट न मिले और कुछ लोगों के साथ उनके खिलाफ भी जांच जारी रहे। जेडीए खुद को भ्रष्टाचार के दाग से मुक्त तो कर चुका है लेकिन उस दाैरान हुए 999 कार्यों के भुगतान के लिए करीब एक हजार करोड़ रुपए का बोझ उतारना आसान नहीं होगा। दरअसल, 2013 में गहलोत सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में तत्कालीन जेडीए चेयरमैन राजेंद्रसिंह सोलंकी की अध्यक्षता वाली दो बोर्ड बैठक में अंधाधुंध स्वीकृतियां जारी हुई थी। सरकार बदलते ही वसुंधरा सरकार ने 13 अगस्त, 23 व 24 सितंबर 2013 की इन बोर्ड बैठकों में स्वीकृत किए कार्यों को घोटाला मानकर एसीबी जांच के बाद प्रकरण दर्ज करवाए गए। प्रकरणों में एसीबी ने जांच के बाद चालान तक पेश किए थे। सोलंकी सहित कई इंजीनियर्स व अफसरों की गिरफ्तारियां हुई थी। अब फिर सरकार बदली, गहलोत सरकार-3 के सत्ता में आते ही इन कार्यों की परिभाषा तय करने के लिए कमेटी बना दी गई। कमेटी ने इन्हें घोटाला नहीं, जनहित में किए गए विकास कार्य बताया। कमेटी की रिपोर्ट को ही आधार बनाते हुए गत 12 नवंबर को जेडीए कार्यकारी समिति (ईसी) की बैठक में तीन श्रेणी के इन कार्यों के भुगतान की अनुशंषा की गई है। जेडीए बोर्ड की बैठक में रखने के बाद इन्हें स्वीकृति के लिए सरकार को भेजने का फैसला किया गया है। इसी में 545 गैर राजकीय भूमि, 436 अधिक व अतिरिक्त वित्तीय स्वीकृति तथा 18 स्थान बदलने के कार्य शामिल हैं।
गाज किस पर राजेंद्रसिंह साेलंकी सहित कुछ पर चल सकती है जांच
क्या होगा जेडीए बोर्ड की बैठक में उक्त प्रकरणों को अनुमोदित कर सरकार को भेजेंगे
इसका असर जेडीए का दामन पाक साफ हुआ तो 1 हजार करोड़ पेमेंट का बोझ पड़ेगा
घाेटाले से जनहित तक का सफर
} सरकार बदलते ही सबसे पहले इन कार्यों को जायज ठहराने के लिए आयुक्त की अध्यक्षता में सात सदस्यों वाली कमेटी गठित की गई।
} इस कमेटी की 13 व 14 मार्च 2019 को शिथिलता बरतने का निर्णय किया।
} इस पर ईसी की 20 फरवरी 2020 की बैठक में इसे यूडीएच को भेजने का निर्णय किया गया।
} इस आधार पर 5 जून को यूडीएच ने उक्त कार्यों की समीक्षा व आंकलन के लिए तीन सदस्य वाली कमेटी गठित की।
} इसमें जेडीए के डायरेक्टर (इंजीनियरिंग) को संयोजक व अध्यक्ष बनाकर पीडब्ल्यूडी के सिटी एक्सईएन व कलेक्टर के प्रतिनिधि के रूप में लेखाधिकारी को शामिल किया गया।
} 14 सितंबर 2020 को यूडीएच ने एसीबी में अटके 15 प्रकरणों के कार्य गैर राजकीय भूमि पर लोक हित में कराया जाना माना।
} कहा कि किसी परिवार या व्यक्ति विशेष को लाभ नहीं हुआ हैं। जेडीए बोर्ड में अनुमोदन के बाद प्राधिकरण के स्तर पर भुगतान की कार्यवाही की जा सकती हैं।
} अतिरिक्त व अधिक वित्तीय स्वीकृति तथा जिन कार्यों का स्थान बदला गया था, उन्हें भी लोक हित में व किसी परिवार व व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाना नहीं माना गया।
} कमेटी की अनुशंषा और प्राधिकरण स्तर पर अनुमोदन के बाद राज्य सरकार को भेजने को कहा गया।
} यूडीएच के निर्देश पर बुलाई गई ईसी की बैठक में तीन श्रेणी के सभी 999 कार्यों की अनुशंषा कर दी गई।
तीन चेयरमैन व दो जेडीसी बदल चुके
इस बीच जेडीए में पांच आईएएस बदल चुके हैं। इनमें तीन चेयरमैन, जो संभागीय आयुक्त थे। ललित गुप्ता, बाबूलाल कोठारी व डॉ. समित शर्मा शामिल हैं। गौरव अग्रवाल व मेघराजसिंह रतनू शामिल हैं। संभवत: अग्रवाल ने ईसी में ये प्रकरण रखने से मना किया था। उनका भी कुछ ही माह में तबादला हो गया था। जबकि दिवाली से पहले रतनू को एपीओ कर दिया गया था।
एसीबी कोर्ट तय करेगा - वो गिरफ्तारियां गलत थीं या केस
जेडीए में विकास कार्यों में करोड़ों के घाेटाले के आरोप लगाते हुए एसीबी ने चार केस दर्ज किए गए थे। भाजपा सरकार ने जांच कराई और पूर्व व तत्काली मुख्यमंत्रियों के बीच एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी हुए। इन केस में एसीबी की टीमों ने कुल 14 अधिकारियों-कर्मचारियों, जनप्रतिनिधि, ठेकेदारों को गिरफ्तार भी किया। तत्कालीन जेडीए अध्यक्ष राजेंद्र सोलंकी भी गिरफ्तार किए गए।
तीन केस में ही उन्हें 10, 5 व 2 दिन के रिमांड पर लेकर पूछताछ ही की। इसके बाद कई दिनों तक वे न्यायिक अभिरक्षा में रहे। बाद में वे कोर्ट से जमानत लेकर बाहर आए। उन्हीं चारों मामलों में अब एसीबी ने भ्रष्टाचार नहीं (जनहित में किए गए काम) मानते हुए कोर्ट में अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी है। यानि, जिन चार केस में इतने लोग गिरफ्तार किए गए थे, वो गिरफ्तारियां गलत थीं या केस? यह फिलहाल कोर्ट को तय करना है।
अगर कोर्ट में चारों केस में एफआर मंजूर हो जाती है तो यह पूरा मामला ही खत्म होकर राजनीति का घोटाला बनकर रह जाएगा। अगर कोर्ट कुछ एफआर मंजूर और कुछ को नामंजूर करती है तो तत्कालीन चेयरमैन सोलंकी सहित करीब डेढ़ दर्जन लोगों के खिलाफ जांच जारी रह सकती है।

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