महावीर नगर, केशवपुरा, भीमगंज मंडी, दादाबाड़ी, विज्ञान नगर, तलवंडी लॉकडाउन की ओर; 932 में से 500 एक्टिव केस यहीं
शहर में काेराेना के कुल एक्टिव केस में से 53 प्रतिशत मामले 6 क्षेत्राें से हैं। इन इलाकाें में पिछले 1 महीने से यही स्थिति बनी हुई है। दीवाली के बाद ताे इन इलाकाें की पाॅजिटिविटी रेट लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इन इलाकाें में सावधानी न बरती गई ताे यहां लाॅकडाउन लग सकता है। प्रदेश सरकार की नई गाइड लाइन के अनुसार काेराेना संक्रमण राेकने के लिए हॉटस्पॉट एरिया में दाेबारा लाॅकडाउन लगाया जा सकता है।
सीएमएचओ डाॅ. बीएस तंवर ने बताया कि इस वक्त हमारे यहां करीब 932 एक्टिव केस हैं, जिनमें से 500 मरीज महावीर नगर, केशवपुरा, भीमगंजमंडी, दादाबाड़ी, तलवंडी और विज्ञान नगर क्षेत्राें से हैं। इन छह में से भी सबसे ज्यादा मरीज केशवपुरा और महावीर नगर से हैं। इन इलाकाें में पिछले कुछ दिनाें में लगातार नए केस आए हैं और इसी वजह से एक्टिव केस यहीं ज्यादा हैं।
कलेक्टर उज्ज्वल राठाैड़ ने कहा कि इन इलाकाें में जिस हिसाब से नए मरीज आ रहे हैं, वाे चिंताजनक है। यहां मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हमारी टीम इन इलाकाें की माॅनिटरिंग कर रही है। अगले एक हफ्ते में स्थिति में सुधार न हुआ ताे यहां सख्त लाॅकडाउन लगाया जाएगा। इस दाैरान आवश्यक सेवाओं के अतिरिक्त सारी दुकानें बंद रहेंगी। ऐसी स्थिति न हाे इसलिए इलाकों में खासतौर पर काेराेना प्राेटाेकाॅल का पालन करना जरूरी है। सार्वजनिक स्थानाें पर मास्क लगाकर ही निकलें और साेशल डिस्टेंसिंग का पालन करें।
काेविड वार्ड में सबसे ज्यादा भर्ती रहने का रिकॉर्ड, 73 दिन से ऑक्सीजन पर चल रही महिला की सांसें
काेराेना के कारण मरीजाें में नए काॅम्प्लिकेशन आ रहे हैं। अब ये बीमारी कई मरीजाें काे ऑक्सीजन डिपेंडेंट बना रही है। नए अस्पताल के काेविड वार्ड में ऐसे कई मरीज एडमिट हैं, जाे लंबे समय से कृत्रिम ऑक्सीजन पर सांसें ले रहे हैं। यहां भर्ती एक महिला का ताे सबसे ज्यादा दिन तक भर्ती रहने का रिकाॅर्ड बन गया है।
यह 69 साल की महिला पिछले 73 दिन से एडमिट हैं, अभी वेंटीलेटर पर हैं। इनकाे 22 सितंबर काे एडमिट कराया गया था, तब से अब तक उनकी ऑक्सीजन डिपेंडेंसी खत्म नहीं हुई। डाॅक्टराें के मुताबिक, यह काेटा मेडिकल काॅलेज में काेविड के इतिहास में पहला मामला है, जब काेई राेगी इतने लंबे समय तक एडमिट रहा है।
वहीं, रायपुरा निवासी 63 साल के वृद्ध 27 सितंबर काे एडमिट हुए थे अाैर करीब 66 दिन भर्ती रहने के बाद 3 दिसंबर काे उनकी माैत हाे गई थी। इन दाेनाें ही मरीजाें के सीटी स्कैन बताते हैं कि इनके लंग्स बहुत ज्यादा संक्रमित हाे गए थे। अभी भी काेविड वार्ड में ऐसे करीब 40 राेगी हैं, जाे 10 से 30 दिन से ऑक्सीजन पर चल रहे हैं।
इन मरीजाें की हालत ऐसी है कि डाॅक्टर इनकी ऑक्सीजन डिपेंडेंसी कम करने के लिए जैसे ही ऑक्सीजन सपाेर्ट सिस्टम हटाते हैं ताे इनका सेचुरेशन तेजी से गिरने लगता है और इन्हें फिर से ऑक्सीजन सपाेर्ट पर लेना पड़ता है। कई मरीज ऐसे भी हैं, जाे डिस्चार्ज हाेकर घर ताे चले गए, लेकिन उन्हें बार-बार कृत्रिम ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है।
एक्सपर्ट व्यू } श्वास नली की झिल्लियां डैमेज होने से लंबे समय तक देनी पड़ रही ऑक्सीजन
भास्कर ने मेडिसिन, एनीस्थिसिया व श्वास राेग विशेषज्ञाें से विस्तार से समझा कि आखिर कोविड मरीजाें की ऑक्सीजन पर निर्भरता क्याें बढ़ रही है-
- क्याें हाेती है ऑक्सीजन की जरूरत: नाॅर्मल इंसान अपने लंग्स से वातावरण में माैजूद 21 प्रतिशत ऑक्सीजन के दम पर स्वस्थ जीवन जीता है। लेकिन काेविड में श्वास की नलियाें की वह झिल्लियां डैमेज हाे जाती हैं, जाे गैस एक्सचेंज करती है। इन झिल्लियाें में फाइब्राेसिस हाे जाता है, जिससे गैस एक्सचेंज की क्षमता कम हाे जाती है और कृत्रिम ऑक्सीजन सपाेर्ट देना पड़ता है। लंबे समय तक यह स्थिति रहने से राेगी के हार्ट समेत अन्य अंगाें पर भी दुष्प्रभाव बढ़ने लगते हैं और मल्टीपल ऑर्गन फेल्याेर हो सकता है।
- कैसे दी जाती है कृत्रिम ऑक्सीजन: काेविड गाइडलाइन के हिसाब से राेगी को 5 लीटर से लेकर 80 लीटर ऑक्सीजन प्रति मिनट दी जाती है। यदि लगातार ऑक्सीजन देने पर भी सेचुरेशन मेंटेन नहीं हाे ताे नाॅन इनवेसिव वेंटीलेशन और वेंटीलेटर सपोर्ट देना पड़ता है। एक्सपर्ट के मुताबिक, कई मरीज हमेशा बेड पर लेटे रहते हैं। ऐसे मरीजाें की ऑक्सीजन डिपेंडेंसी दिनाेंदिन बढ़ती चली जाती है। ऑक्सीजन डिपेंडेंसी घटाने में ज्यादा राेल राेगी का हाेता है। लेकिन ज्यादातर राेगी ऐसा नहीं कर पाते।
सामान्य सूजन से कैसे अलग है फाइब्राेसिस
सामान्य निमाेनिया में भी लंग्स की नलियाें में सूजन आती है, लेकिन वह एंटी फाइब्राेटिक दवाइयाें से ठीक हाे जाती है। कोराना में ये सूजन फाइब्राेसिस का रूप ले लेती है, यानी नलियाें में सिकुड़न आ जाती है, जोे लंबे समय तक रहती है और इसी वजह से मरीजाें की कृत्रिम ऑक्सीजन पर डिपेंडेंसी बढ़ जाती है। डाॅक्टर यह तक कह रहे हैं कि इससे लंग्स की क्षमता ताउम्र कम हाे सकती है।
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