कोरोना काल में स्कूल बंद रहने के कारण फीस को लेकर उठे विवाद का अभी तक हल नहीं निकला है। इससे प्रदेश के 80 लाख विद्यार्थियों के अभिभावक और 50 हजार निजी स्कूल संचालक परेशान है। सरकार ने इस मामले पर यह कहते हुए पहले ही अपना पल्ला झाड़ लिया कि मामला कोर्ट में लंबित है। इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते। हमने फीस का प्रारूप तय कर कोर्ट में पेश कर दिया है।
अभिभावक भी कोर्ट के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। इसलिए वे फीस जमा नहीं करा रहे। उधर, फीस नहीं आने के कारण निजी स्कूलों की आर्थिक स्थिति चरमराती जा रही है। वे ना तो शिक्षकों को वेतन दे पा रहे हैं और ना ही ऑनलाइन कक्षाओं को सुचारू रख पा रहे हैं। अभिभावक और निजी स्कूल संचालक चाहते हैं कि फीस विवाद का जल्दी हल निकल आए। फीस को लेकर निकाले गए आदेशों के खिलाफ पिछले दिनों निजी स्कूल संचालकों ने आंदोलन भी किया था। अब अभिभावकों का आंदोलन चल रहा है।
यह है विवाद : प्रदेश के निजी स्कूल मार्च से बंद है और सरकार ने अब 31 दिसंबर तक स्कूल खोलने पर रोक लगा रखी है। अभिभावक यह कहते हुए फीस नहीं देना चाहते हैं कि जब स्कूल बंद है तो वे फीस का भुगतान क्यों करे। जबकि निजी स्कूल संचालकों का कहना है कि फीस से ही स्कूलों का संचालन होता है। अगर फीस ही नहीं आएगी तो स्कूल चलाना मुश्किल हो जाएगा। फीस के बिना वे 11 लाख से अधिक शिक्षक-कर्मचारियों को वेतन का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं।
सरकार ने सीबीएसई में 70% व आरबीएसई में 60% ट्यूशन फीस का फॉर्मूला पेश किया
सरकार ने कोर्स कटौती के आधार पर 9वीं से 12वीं कक्षा तक सीबीएसई स्कूलों को 70 फीसदी ट्यूशन फीस लेने और राजस्थान बोर्ड के स्कूलों को 60 फीसदी ट्यूशन फीस लेने का फार्मूला तय कर कोर्ट में पेश कर दिया था। अभिभावक इस फार्मूले के आधार पर भी फीस जमा नहीं करा रहे। सरकार ने कहा था कि पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों को स्कूलों में अभी नहीं बुलाया गया है। इसलिए इन कक्षाओं के संबंध में स्कूल खुलने पर निर्णय लिया जाएगा। पाठ्यक्रम में जितनी कटौती होगी। उसी आधार पर शुल्क में कटौती कर दी जाएगी।
निजी स्कूल संचालकों ने यह गिनाई परेशानियां : स्कूल संचालकों का कहना है कोरोना काल में उन्होंने नई तकनीक को अपनाकर बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का काम किया है। लेकिन फीस नहीं आने से हमारे सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। सरकार ना तो फीस विवाद का हल निकाल रही है और ना ही उनके लिए किसी तरह के आर्थिक पैकेज का एलान कर रही है। ग्रामीण इलाकों में कई निजी स्कूलों के बंद होने की नौबत तक आ गई है।
^फीस विवाद का हल नहीं निकलने से अभिभावक और स्कूल संचालक दोनों को ही नुकसान हो रहा है। इसका जितनी जल्दी हल निकले सभी के हित में रहेगा। इससे अभिभावक भी फीस जमा कराने का मन बना सकेंगे। अगर फीस जमा हो जाए तो वे अधिक अच्छे तरीके से ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था कर सकेंगे और निजी स्कूलों के 11 लाख कर्मचारियों के सामने खड़ा हुआ वेतन का संकट भी दूर हो सकेगा।
- अनिल शर्मा, प्रदेशाध्यक्ष, स्कूल शिक्षा परिवार
कोरोनाकाल में अभिभावकों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। वे फीस जमा कराने की स्थिति में नहीं है। मार्च से स्कूल बंद पड़े हैं। अगर स्कूल संचालक फीस लेना चाहते हैं तो यह फीस सरकार वहन करे। शिक्षा के बजट से निजी स्कूलों के लिए आर्थिक पैकेज का एलान करे, ताकि स्कूल संचालक व अभिभावक दोनों को राहत मिल सके।
- दिनेश कांवट, संयोजक, पेरेंट्स वेलफेयर सोसायटी
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