(आनंद चौधरी). रेगिस्तान की रेतीली हवा जो कभी आंधी का सबब थी आज बिजली पैदा कर रही है। परमाणु, तापीय और सौर ऊर्जा के बाद पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भी राजस्थान तेजी से आगे बढ़ रहा है। राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (एनआईडब्ल्यूई), एमएनआरई और जीओई के आकलन के अनुसार राजस्थान में एक लाख 27 हजार 756 मेगावाट पवन ऊर्जा की क्षमता है।
2025 तक राजस्थान में 8000 मेगावाट पवन ऊर्जा उत्पादन होने की संभावना है। इस समय प्रदेश में 4913.90 मेगावाट पवन ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है। राजस्थान में सर्वाधिक पवन ऊर्जा संयत्र जैसलमेर में लगे हैं। इसी कारण जैसलमेर को पंखों की नगरी कहा जाता है। राजस्थान की 95% पवन ऊर्जा का उत्पादन जैसलमेर कर रहा है। ज्यादातर पवन ऊर्जा संयंत्र निजी क्षेत्र ने लगाए हैं।
राज्य की पहली निजी क्षेत्र की पवन विद्युत परियोजना 2001 में जैसलमेर के बड़ा बाग में स्थापित की गई थी। इसके बाद राजस्थान पवन ऊर्जा का हब बन गया। पवन ऊर्जा उत्पादन के मामले में वर्ष 2009 में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के बाद राजस्थान पांचवें नंबर पर था जो अब दूसरे नंबर पर पहुंच गया है।
राजस्थान में पवन ऊर्जा की संभावना को देखते हुए जैसलमेर के लोद्रवा में देश का दूसरा पवन ऊर्जा पार्क स्थापित किया गया है। पहला आंध्रप्रदेश के कडप्पा जिले के गांडिकाटा में स्थापित किया गया था। राजस्थान में 8 साल पहले 18 जुलाई 2012 को पवन ऊर्जा नीति बनाई गई। शुरुआत में चंद किलोवाट की पवन चक्कियां थीं। अब तीन मेगावाट क्षमता की आ चुकी हैं।
राजस्थान में यहां हैं पवन चक्कियां
- सोढ़ा बांधन, जैसलमेर
- जैसलमेर
- पोहरा, जैसलमेर
- हर्ष पर्वत, सीकर
- अमरसर, जैसलमेर
- देवगढ़, प्रतापगढ़
- बीठडी, जोधपुर
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