जंगलों के आसपास की जमीनें और यहां की आबादी का वन और वन्यजीवों के साथ तालमेल बिठाना हमेशा से चैलेंज रहा है। शहर के एक वाइल्ड लाइफर इस चैलेंज पर पार पाने की दिशा में जो पहल किए हुए हैं, वो देशभर के जंगलों के लिए मिसाल बन गया है। ये शख्स राजस्थान स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड के मेंबर सुनील मेहता हैं।
इनके कोई चार साल से किए जा रहे ये प्रयास महाराष्ट्र के ताडोबा (अलीजंजा) टाइगर रिजर्व और उमरेड करहांडला (गोठन गांव) वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के आसपास न केवल ‘मेन-एनिमल कॉन्फ्लिक्ट’ को रोकने का जादुई प्रयास साबित हो रहे हैं, बल्कि जंगलों के आसपास लोगों को यहीं पर रोजगार और भविष्य का सपना दिखा रहे हैं।
इनके इन प्रयासों को देखने के लिए मध्यप्रदेश के सीनियर वन मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह, प्रमुख सचिव, सीईओ ईको टूरिज्म बोर्ड, चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन सहित कान्हा-बांधवगढ़-पेंच के फील्ड डायरेक्टर वाली 14 सदस्यीय वन विभाग की टीम शनिवार-रविवार को पहुंचे हैं।
इस बात इस मायने में खास हो जाती है कि मध्यप्रदेश के जंगलों का मैनेजमेंट देशभर में अव्वल मान फॉलो किया जाता रहा है। दूसरी ओर गांव की जमीनों को जंगल के लिए गोद लेकर लोगों और वन्यजीव दोनों के लिए उपयोगी बनाने का चैलेंज राजस्थान के भी सामने है। लेकिन यहीं पर इस फार्मूले पर काम नहीं हो रहा।
मेरे अनुभव और काम प्रदेश में आएं तो खुशी होगी
^महाराष्ट्र में किसानों को भरोसे में लिया, उनको भविष्य के लिए दिखाए सपने सच होने लगे तो भरोसा जन्मा। यही बात अब मध्यप्रदेश को भाई है। उन्होंने सहयोग को आमंत्रित किया है। राजस्थान में वन विभाग और सरकार लोगों और बाघों की खातिर अनुभव काम लेती है तो हमेशा तत्पर हूं।
-सुनील मेहता, सदस्य, स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड
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