आधुनिकीकरण की योजना तो बनी, लेकिन क्रियान्विति का सालों बाद भी इंतजार

(सुनिल कुमार जैन) अजमेर जिले की वस्त्र नगरी ब्यावर स्थित एतिहासिक महालक्ष्मी मिल के आधुनिकीकरण का काम सालों से अटका पडा है। करीब सात साल पहले केन्द्र सरकार ने 167 करोड़ रुपए की योजना भी मंजूर की और करीब चार साल पहले यहां लगी मशीनों को हटाने व चिमनी को ध्वस्त करने का काम भी किया गया, लेकिन इसके बाद यह कार्य आगे ही नहीं बढा।
ब्यावर में लक्ष्मी, महालक्ष्मी एवं एडवर्ड मिल से देश व प्रदेश में ब्यावर की एक विशेष पहचान थी। तीनों ही मिलों में हजारों लोग काम करते थे। व्यापार भी चर्म पर था। धीरे-धीरे कर यहां की तीनों ही मिल बन्द हो गई। 1935 में स्थापित महालक्ष्मी मिल का नेशनल टेक्सटाइल कारपोरेशन ने 1962 में अधिग्रहण किया। घाटे में चलने के कारण 1992 में वीआरएस शुरू हुई, तब यहां पर 1200 कार्मिक थे। वर्ष 2012 में इसके नवीनीकरण की योजना तैयार की। इसके तहत पहले चरण में पुरानी मशीनों को हटाने व चिमनी ध्वस्त करने का काम किया गया। दूसरे चरण में भवन निर्माण का काम शुरू होना था, लेकिन सालों बाद भी यह काम आगे नहीं बढ़ पाया। आज यहां पर केवल 3 स्थाई कार्मिक रह गए है।

महालक्ष्मी मिल का प्रशासनिक भवन

फाइलों में दफन योजना
महालक्ष्मी मिल के आधुनिकीकरण के लिए नेशनल टेक्सटाइल्स कारर्पोरेशन ने 167 करोड़ की योजना को केन्द्र सरकार ने सैद्धान्तिक मंजूरी भी दे दी। योजना के पहले चरण पुराने भवन को तोडक़र समतल कर दिया गया। पुरानी मशीन भी नीलाम हो गई। इसके बाद आधुनिककरण का काम होना था लेकिन यह योजना फाईलों में ही दफन होकर रह गई।

यह होना था उत्पादन
बताया जाता है कि मिल के आधुनिकीकरण के तहत इसमें सेना में काम आने वाला कपड़ा व उच्च गुणवता युक्त निर्यात किए जाने वाला कपड़ा तैयार करने की योजना थी। इसमें सेना के लिए कपड़े की आपूर्ति होने से टर्नओवर अच्छा होने का सपना था।

अब बचे है तीन कार्मिक
महालक्ष्मी मिल के श्रम कल्याण अधिकारी कैलाश गहलोत का कहना है कि वर्तमान में स्थाई रूप से यहां तीन कार्मिक ही है और नौ संविदा पर है। मिल के नवीनीकरण की योजना तो बनी और उसकी के अनुरूप पहले चरण का काम हुआ लेकिन बीते छह सालों से आगे कुछ नहीं हुआ। यह कार्रवाई मुख्यालय स्तर पर ही चल रही है।



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महालक्ष्मी मिल का मुख्य गेट


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