निजी वन विकास के नाम पर सरकारी जमीन डकारने वालाें पर 8 साल बाद भी कार्रवाई नहीं,राजस्व मंडल के आदेश फाइलों में दबे
निजी वन विकास के लिए सरकार से करोड़ों रुपए की बेशकीमती जमीन लेकर डकारने का मामला आठ साल पहले राजस्व मंडल के सामने आया था। मंडल की एकलपीठ ने तब इसे बेहद गंभीर मानते हुए हुए जमीन की खातेदारी निरस्त कर दी थी। रजिस्ट्रार को निर्देश दिए गए थे कि प्रदेश में जहां भी ऐसे मामले हैं, उन्हें मंगवाया जाए ताकि जमीन वापस सरकार के खाते में दर्ज कर कब्जा लिया जा सके। लेकिन न तो रिकार्ड आया और न ही जमीन वापस सरकार को मिल पाई है। उलटे इतने सालों में जमीन पर प्लाटिंग कर लोगों को भूखंड बेच दिए गए और कॉलोनियां बसा दीं।
अजमेर में करीब 33 साल पहले निजी वन विकास के लिए निशुल्क जमीन दी गई थी। वन विकास के मद्देनजर 25 साल के लिए दी गई जमीन पर वन विकसित होना तो दूर, एक पौधा तक नहीं लगा। जिन लोगों को जमीन दी गई थी, उन्होंने सरकार के ही अफसरों से मिलीभगत कर जमीन अपने नाम खातेदारी में दर्ज करवा ली और प्लाट काट दिए।
राजस्व मंडल के सामने एक मामला आया तो सुनवाई करने वाले सदस्य भी हैरान रह गए कि किस तरह अधिकारियों ने कानून को ताक पर रखकर अपने चहेतों को लाभ पहुंचाया। मंडल के तत्कालीन सदस्य आरसी गुप्ता की एकलपीठ ने सरकार की याचिका मंजूर करते हुए वन विकास की एक जमीन पर दी गई खातेदारी को निरस्त कर दिया और आदेश दिया कि अधीनस्थ अदालतों में इस तरह के मामले चल रहे हैं उनके
रिकार्ड मंडल में मंगवाए जाएं। जिला कलेक्टर अजमेर को भी निर्देश दिए गए थे कि इस तरह के मामले अगर जानकारी में आते हैं तो तत्काल मंडल में रेफरेंस प्रकरण पेश करें ताकि जमीन सरकारी खाते में दर्ज की जाकर कब्जा लिया जा सके। लेकिन आठ साल में इस गंभीर मुद्दे को कागजों में दफन कर दिया गया। यहां तक कि जो मामले जानकारी में आ गए थे उनकी जमीनों पर भी सरकार कब्जा नहीं ले सकी और अब वहां प्लाट काट कर कॉलोनियां तक बस चुकी हैं।
पुष्कर में ही थे सात से ज्यादा मामले
पुष्कर में इस तरह के सात मामले सामने आए थे जिसमें निजी वन विकास की जमीन हड़प ली गई। एक मामले में तो कलेक्टर ने आवंटन निरस्त किया और राजस्व अपील प्राधिकारी ने मिलीभगत कर खातेदारी अधिकार ही दे दिए। उपखंड अधिकारी ने 21 जून 1990 को पुष्कर के गनाहेड़ा निवासी रामसिंह को निजी वन विकास के लिए गनाहेड़ा में 8 बीघा जमीन दी थी।
रामसिंह ने दी गई जमीन पर पौधरोपण नहीं किया। कलेक्टर अजमेर ने 9 मई 1992 को इस आधार पर आवंटन निरस्त कर दिया। रामसिंह ने करीब 20 साल बाद कलेक्टर के आदेश के खिलाफ राजस्व अपील प्राधिकारी अजमेर की अदालत में प्रथम अपील पेश कर दी। रामसिंह की अपील को मंजूर करते हुए राजस्व अपील प्राधिकारी ने 1 नवंबर 2011 को कलेक्टर का आदेश निरस्त कर दिया।
यहां तक तो राजस्व अपील प्राधिकारी का कानूनी क्षेत्राधिकार था, लेकिन उन्होंने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर कानून को ताक पर रखते हुए निजी वन विकास की जमीन पर रामसिंह का लंबा कब्जा मान लिया और कहा कि दी गई 8 बीघा जमीन के खातेदारी अधिकार रामसिंह को दिए जाएं, जबकि निजी वन विकास के लिए दी गई जमीन के किसी भी सूरत में खातेदारी अधिकार नहीं दिए जा सकते हैं।
राजस्व मंडल ने इसी आदेश को निरस्त किया था। इसी तरह के अन्य मामलों में कार्रवाई नहीं हो पाई क्योंकि प्रकरण मिलीभगत से फाइलों में दबे रह गए। अब भी इस मामले की जांच हो तो बड़ा खुलासा हाे सकता है और सरकार को बेशकीमती जमीन वापस मिल सकती है।
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