काेराेना का संक्रमण शुरू हाेने के बाद बुखार, जुकाम, सांस की तकलीफ के इलाज में काम आने वाली और एंटी बॉयोटिक दवाओं की मांग बढ़ी है। वहीं, लॉकडाउन की वजह से इनका उत्पादन ज्यादा नहीं हो सका। इससे दवाओं के रेट में इजाफा हुआ है। अब इन दवाओं की मांग भी बढ़ने लगी है। श्रीगंगानगर जिले में पैरासिटामॉल व विटामिन सी की गोलियों के रेट 50 से 54 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं।
अन्य दवाओं के रेट में भी इजाफा हुआ है। अब गले में मामूली तकलीफ, हल्का सा बुखार... और बगैर किसी डॉक्टर की सलाह के पैरासिटामॉल, एजिथ्रोमायसिन, विटामिन-सी, डेक्सामेथासोन, ऑग्मेंटेन, हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन जैसी गोलियां और कफ सिरप भी गटकने का चलन बढ़ा है। यह ‘कोरोना का खौफ’ ही है जो लोगों से ऐसा करवाता जा रहा है। डॉक्टर को दिखाए बगैर सेल्फ मेडिकेशन, जिसने ‘पैनिक बाइंग’ की स्थिति पैदा कर दी। इस वजह से दवाओं की कमी भी हुई और उनके रेट भी बढ़ गए।
हाईड्रोक्सोक्लोरोक्वीन (ठंड लगकर बुखार आने पर दी जाती है)
पहले मांग बढ़ी अब सामान्य हुई : एक बार डब्ल्यूएचओ ने इसे कोरोना रोगियों को देने की अनुशंसा की। तब सरकार ने इसकी कमी होने की आशंका जाहिर करते हुए एक बार खुले में बिक्री विद ड्रा करते हुए सरकारी अस्पतालों को सप्लाई दी। बाद में डब्ल्यूएचओ ने कहा कि कोरोना में यह खास असरदार नहीं है, बल्कि किडनी को डैमेज करती है। उसके बाद इसकी सेल सामान्य हुई और ये गाेलियां बाजार में मिलने लगी। विटामिन-सी कोरोना काल में सबसे ज्यादा बिकी जिन्हें कोई लक्षण नहीं थे, वे भी इसे खा रहे हैं।
रेट कंट्रोल का असर: मास्क की कीमत आधे से भी कम : मार्च से पहले मास्क और सेनेटाइजर की खरीद नाम मात्र होती थी। कोरोना संक्रमण शुरू होने के बाद अप्रैल में इन दोनों वस्तुओं की मांग बढ़ी। तब बाजार में मास्क व सेनेटाइजर के रेट एकदम बढ़े। एन-95 मास्क 300 रुपए और सेनेटाइजर की 100 एमएल की शीशी 180 रुपए तक भी बिकी।
केमिस्ट गौरव मित्तल के अनुसार इसके बाद मास्क व सेनेटाइजर का स्थानीय उत्पादन होने लगा। सरकार ने इन दोनों को आवश्यक वस्तुओं की सूची में शामिल करते हुए रेट कंट्रोल किया। अब एन-95 मास्क की की कीमत आधे से भी कम करीब 125 रुपए तक रह गई है। बाजार में 100 एमएल सेनेटाइजर 50 रुपए में मिलने लगा है। श्रीगंगानगर जिले में शुगर मिल की ओर से बनाया गया अल्कोहल बेस्ड सेनेटाइजर भी खुले बाजार के रेट घटाने में मददगार बना। इसकी 180 एमएल सेनेटाइजर की शीशी 50 रुपए की है। बाजार में इस सेनेटाइजर की 2 लाख से ज्यादा शीशियों की बिक्री हो चुकी है।
बाहर से कच्चा माल न आने से बढ़ी कीमतें
ज्यादातर दवाएं बनाने का कच्चा माल पहले चीन से आता था। कोरोना संक्रमण के बाद चीन से कच्चे माल की आपूर्ति रुक गई। वहीं, काेरोना का संक्रमण बढ़ने पर इसके लक्षणों से होने वाली तकलीफ में राहतकारी दवाओं की मांग बढ़ी। इससे एक बार पैरासिटामॉल, एजिथ्रोमायसिन और एंटी वायरल दवाओं की एक बार कमी हो गई थी। लॉकडाउन में फैक्ट्रियां बंद होने से इनका उत्पादन भी नहीं हुआ। इससे दवाओं की कीमतें बढ़ी हैं। अब कमी नहीं है लेकिन बढ़े रेट बरकरार हैं। बाजार में कालाबाजारी की स्थिति नहीं है।
प्रवीण धींगड़ा, केमिस्ट।
अब कोई कमी नहीं है
शुरू में कुछ दवाओं की कमी की वजह ज्यादा खरीद और उत्पादन में कमी रही थी। तब जिन लोगों की रूटीन दवा चलती थी, उन्होंने भी यह सोचकर दवा स्टॉक कर ली कि बाद में मिले न मिले। लॉकडाउन खुलने के बाद अब दवाओं की आपूर्ति सामान्य हो गई है। जहां तक दवाओं के रेट बढ़ने का सवाल है ये मांग और पूर्ति के अलावा कच्चे माल के रेटों पर भी निर्भर करता है। रेटों पर केंद्र सरकार नियंत्रण कर सकती है।
दलजीत सिंह उप्पल, सहायक औषधि नियंत्रक, श्रीगंगानगर।
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