सोना पकड़ने गई टीम सुमेर को स्वतंत्र गवाह बनाकर ले गई थी, कार्रवाई से पहले ही गोली लगी, गवाह न बन पाने से न सुरक्षा, न मदद
ये कहानी शुरू होती है 18 सितंबर से डीआरआई जोधपुर की टीम बिलाड़ा के पास सोना पकड़ने गई थी। इस कार्रवाई के स्वतंत्र गवाह के रूप में वह सेंट्रल गुड्स एंड सर्विस टैक्स (सीजीएसटी) के कंटीजेंट (ठेका कर्मचारी) सुमेर सैन को साथ ले गई थी। वहां टीम ने ज्वैलर शिवनारायण अग्रवाल की गाड़ी रोकी।
गाड़ी में बैठे लोगों से टीम की खींचतान हुई ताे ज्वैलर के सुरक्षा गार्ड मनोहर सिंह ने लाइसेंसी पिस्टल से फायरिंग कर दी। एक गाेली डीआरआई की गाड़ी का पिछला कांच तोड़ते हुए सीट पर बैठे स्वतंत्र गवाह सुमेर सैन की पीठ में जा घुसी। वह लहूलुहान गाड़ी में पड़ा रहा और टीम 2-3 किमी दूर भाग गई। बाद में पुलिस आई और उसे अस्पताल ले गई।
- घायल सुमेर को जोधपुर के एमडीएम अस्पताल लाया गया। डाक्टरों ने उसे एम्स ले जाने काे कहा। एम्स में डॉक्टरों ने एक्स-रे किए तो पता चला कि गोली फेफड़ों और खून की धमनी के पास अटकी हुई है और पसलियों की हड्डी को फ्रैक्चर कर दिया है।
- इलाज कर रहे डाॅ. महावीर ने बताया कि गोली निकालना अभी खतरनाक हो सकता है, इसलिए छह हफ्ते इंतजार करने के बाद देखेंगे। अभी गोली निकालते हैं तो पसली की हड्डी बिखर जाएगी।
- एक माह बाद एम्स ने चेक कराया, लेकिन गोली अभी भी नहीं निकलेगी।
- चूंकि सुमेर को कार्रवाई से पहले ही गोली लग गई थी, इसलिए वह तकनीकी रूप से गवाह नहीं बन पाया। ऐसे में गवाहों की सुरक्षा के लिए बने कानून का लाभ भी नहीं मिल रहा।
सीजीएसटी का ये तर्क स्थायी कर्मी नहीं था, इसलिए मदद का प्रस्ताव नहीं भेजा है
सुमेर सीजीएसटी में 8500 रुपए मासिक पर कंटीजेंट यानी ठेके का कर्मचारी है। सीजीएसटी ने ही उसे डीआरआई के साथ भेजा था। अब सीजीएसटी कमिश्नर आलोक गुप्ता कहते हैं कि वह कंटीजेंट था, कोई स्थाई कर्मचारी नहीं, इसलिए सीजीएसटी उसकी मदद के लिए कोई प्रस्ताव नहीं भेज रही है। डीआरआई को भेजना चाहिए। उधर, डीआरआई ने अभी तक तो कोई प्रस्ताव नहीं भेजा है। कहते हैं, कर्मचारी कल्याण कोष से मदद दिलाने का प्रयास हो रहा है।
एक्सपर्ट कमेंट: गवाहों की सुरक्षा की 3 श्रेणियां, पर ये सुमेर पर लागू ही नहीं होतीं
गवाहों पर खतरे को 3 श्रेणियों में रखा गया। पहला- जांच के दौरान या बाद में गवाह या परिजनों के जीवन पर गंभीर खतरा हो। दूसरा- जांच या ट्रायल के दौरान गवाह की प्रतिष्ठा, सुरक्षा व संपत्ति को खतरा हो। तीसरा- जांच या ट्रायल के वक्त उत्पीड़न का खतरा हो। ये तीनों सुमेर लागू नहीं। इसलिए उसे लाभ नहीं होगा।
- पीसी सोलंकी, वकील, हाईकोर्ट
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