कपड़ा इंडस्ट्री उधारी में चला रही व्यापार लेकिन हर महीने की 7 तारीख तक जमा कराना होगा टीसीएस 0.1%, नतीजा- तरलता का बढ़ेगा संकट

किसी तरह का आर्थिक सुधार, टैक्स या नए प्रावधान सरकार की ओर से आता है तो उसके फायदे नुकसान होते हैं, लेकिन फाइनेंस एक्ट 2020 में इनकम टैक्स कानून की धारा 206सी में एक उपधारा (1 एच) भी जोड़ी है। इसे टीसीएस(टैक्स कलेक्टर एट सोर्स) कहा है।

यह उद्योग जगत के लिए नई परेशानी का कारण बन रहा है। क्योंकि इसके अनुसार अगर बिक्री का मूल्य 50 लाख रुपए से अधिक है या पिछले साल के दौरान कुल बिक्री 50 लाख रुपए से अधिक था उसमें विक्रेता को खरीदार से 0.1 फीसदी की दर से कर वसूलना होगा। (कोरोना की वजह से साल 2020-21 में 0.075 फीसदी की दर से)।

एक विक्रेता को केवल तभी कर जमा करना होगा, जब उसका टर्नओवर पिछले वित्तीय वर्ष में 10 करोड़ रु से अधिक हो। इसके अलावा अन्य औपचारिकता भी बढ़ा दी है। इसके तहत इसमें साल के 12 चालान और चार बार रिटर्न भरने होंगे।

सालभर में किसी तरह की गलती होने पर पैनल्टी भुगतनी होगी। टीसीएस की जटिलताओं, टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर प्रभाव के बारे में आईसीएसआई भीलवाड़ा के पूर्व सचिव सीएस नितिन मेहता एवं चार्टेड अकाउंटेंट महेश डाड से जानते है कि क्यों उद्योग जगत में इसे लेकर आक्रोश व्याप्त हो रहा है।

स्पष्टीकरण के लिए नोटिफिकेशन निकाला और उलझ गई टीसीएस की गणित

नए प्रावधान में बहुत सारी कमियों एवं संशय होने के कारण यह जटिल प्रक्रिया बन गई है। इसी भ्रम की स्थिति दूर करने के लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने 29 और 30 सितंबर को स्पष्टीकरण के लिए नोटिफिकेशन जारी किए। लेकिन इस नोटिफिकेशन से और अधिक भ्रम पैदा हो गया।

कोरोना महामारी के इस संकट में व्यापारियों और लघु-मझोले उद्यमियों को सरकार से मदद मिलने का इंतजार था, उल्टे नए टैक्स लगा कर, नए रिटर्न एवं नई अनुपालना को लगा कर उद्योग जगत को और मुश्किल मे डाल दिया है।

सीबीडीटी ने स्पष्ट किया है कि टीसीएस का नया प्रावधान जो लागू किया गया है वह मान्यता प्राप्त शेयर बाजारों में होने वाले जिंस या प्रतिभूतियों के सौदों पर लागू नहीं होगा। यह प्रावधान बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्रों और ऊर्जा बचत प्रमाणपत्रों के लेनदेन पर भी लागू नहीं होगा।

टीसीएस में इन्हें नहीं किया गया शामिल

तीन श्रेणी में छूट दी है। अगर खरीदार पर आयकर अधिनियम की अन्य धाराओं के अंतर्गत टीडीएस या फिर टीसीएस कलेक्ट किया हो। अगर खरीददार स्वयं केंद्रीय सरकार या फिर राज्य सरकार हो। ऐसा व्यक्ति जो केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो। इन तीनों श्रेणी में टीसीएस के प्रावधान लागू नही होंगे। साथ ही यह प्रावधान सेवा प्रदाता पर भी लागू नहीं होंगे यह प्रावधान केवल माल की बिक्री पर ही लागू होंगे।

इसलिए लाए थे प्रावधान, हो गया उल्टा प्रभाव...

जहां सरकार की मंशा बड़े एवं संदिग्ध खरीद फरोख्त के सौदों को सामने लाकर अंकुश लगाना है। इस नए प्रावधान से मुश्किलों का सामना व्यापारी वर्ग को करना पड़ेगा। इस बात से कोई दो राय नहीं है कि यह टीसीएस एक तरह का एडवांस पेमेंट ऑफ टैक्स का काम करेगा।

लेकिन नए रिटर्न भरना, नए चालान भरना एवं साथ ही उनको समय पर अनुपालन कराना उद्योग जगत के एक नया बोझ लिए है। करसलाहकारों का मानना है कि सरकार के पास इससे भी बेहतर उपाय हो सकते थे जिससे कि इस तरह के संदिग्ध ट्रांजेक्शन को पहचान सकते है। लेकिन उन्होंने टीसीएस को अपना विकल्प बनाया।

समस्या: गुणवत्ता आधारित पालन हो...

टेक्सटाइल इंडस्ट्री इस समय वैसे ही तरलता के अभाव से पीड़ित है। जो माल बिक रहा है वह दो-दो तीन-तीन महीने की उधारी पर बिक रहा है। टीसीएस हर महीने 7 तारीख तक जमा कराना पड़ेगा। इससे तरलता की समस्या को और बड़ा बनाएगा। सरकार को चाहिए कि वह क्वांटिटी आधार पर पालन ना कराकर गुणवत्ता आधारित पालन कराएं।



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