निगम-ठेकेदार की खींचतान में टिपर चालकों को नहीं मिला वेतन, नतीजा-31 वार्डों में 5 दिन से नहीं उठा कचरा
नगर निगम और ठेकेदार की खींचतान में आधे शहर की सफाई व्यवस्था ठप हो गई है। इसका नतीजा 31 वार्डों की जनता भुगत रही है, जहां 5 दिन से डोर-टु-डोर कचरा कलेक्शन की व्यवस्था ठप है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि ठेकेदार के 4 महीने के बिल निगम में अटके हैं, जिससे टिपर चालकों को वेतन नहीं मिल रहा है। कई बार शिकायत के बावजूद वेतन नहीं मिला तो टिपर चालक हड़ताल पर चले गए। निगम के अधिकारी और ठेकेदार एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
नगर निगम का उत्तर और दक्षिण निगम में विभाजन के बावजूद डाेर-टु-डाेर कचरा कलेक्शन की व्यवस्था अभी तक पुराने वार्डाें और एक ही नगर निगम के हिसाब से चल रही है। भुगतान उत्तर से हाेगा या दक्षिण से हाेगा, यह तय हाेने में काफी समय लग गया। इधर, कुछ ठेकेदार फर्म ने समय पर बिल नहीं दिए। इस कारण तीनों फर्माें का 4 से 6 माह का 2.50 से 3 करोड़ का भुगतान अभी तक नहीं हुआ।
इनमें से 1 ठेका फर्म ने अपनी लेबर काे 4 माह से भुगतान नहीं दिया ताे उन्हाेंने 5 दिनाें से हड़ताल कर रखी है। इस कारण 31 वार्डों से कचरा नहीं उठ रहा है। मामला यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल तक पहुंचने के बावजूद सोमवार तक नगर निगम की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई। अभी भी ठेका फर्म और नगर निगम एक-दूसरे पर आराेप-प्रत्याराेप कर पल्ला झाड़ रहे हैं।
नगर निगम में डाेर-टु-डाेर कचरा कलेक्शन का ठेका मार्च में पूरा हाे गया। नए वित्तीय वर्ष में ठेका करने से पहले ही काेराेना महामारी फैल गई और लाॅकडाउन हाे गया। नगर निगम का बंटवारा भी उत्तर-दक्षिण में हाे गया। निगम नए ठेके हाेने तक माैजूदा फर्माें काे ही एक्सटेंशन देता रहा। बिल पास करने की लंबी प्रक्रिया और ठेकेदाराें द्वारा समय पर बिल नहीं देने के कारण समय पर भुगतान नहीं हुअा।
टिपर चालक बोले-सैलेरी न मिलने से खर्च चलाना मुश्किल, शिकायत का भी फायदा नहीं
इनमें से सबसे ज्यादा 31 वार्डाें वाली अनुराग शर्मा की फर्म ने उनके टिपर चालकाें व हैल्पर काे 4 माह से वेतन नहीं दिया। वेतन के लिए वाे कई बार ठेकेदार से लेकर निगम आयुक्त वासुदेव मालावत से भी मिल चुके हैं। वेतन के बिना परेशान हाेने लगे तथा परिवार चलाना मुश्किल हाे गया ताे उन्हाेंने हड़ताल कर दी।
सभी 93 टिपर बाड़े में ही खड़े कर दिए। कर्मचारियाें का कहना है कि निगम और ठेकेदार के बीच काेई भी विवाद हाे हमें ताे मामूली वेतन मिलता है। चार माह से हमारी क्या हालत हाे रही है, इस बारे में न निगम साेच रही है न ठेकेदार।
निगम के बंटवारे के बाद बिगड़ी व्यवस्था : तीन में से दाे फर्माें का भी निगम पर बकाया चल रहा है। 24 वार्डाें की व्यवस्था वाले धर्मा चाैधरी की फर्म का 6 माह का करीब 1.50 कराेड़ रुपए बकाया है। वहीं 10 वार्डाें वाली विशाल विजय की फर्म का करीब 30 लाख रुपए बकाया चल रहा है। चाैधरी व धर्मा का कहना है कि पहले समय पर भुगतान हाे रहा था। बिल भी समय पर पास हाे रहे थे, लेकिन जब से निगम का बंटवारा हुआ उसके बाद से लेटलतीफी शुरू हुई।
वेरीफिकेशन में देरी से भी बिल अटके: समय पर भुगतान का मामला पहले भी उठा था। तब निगम ने व्यवस्था बनाई थी कि पिछले माह का बिल 5 तारीख तक दे दिया जाए, उसके बाद 10 से 15 दिनाें के बीच निगम से भुगतान कर दिया जाएगा। वर्तमान में निगम में 2 से 3 माह के बिल एक साथ दिए जा रहे हैं। उन बिलाें काे वेरिफाई करने के लिए निगम कर्मचारी समय लगाते हैं। कई टिपर चालकाें की शिकायत भी हाेती है, ताे उन पर पैनल्टी भी लगती है। वाे पैनल्टी उनके बिलाें से काटनी हाेती है।
मैंने जून, जुलाई व अगस्त के बिल दे रखे हैं। मेरा करीब 90 लाख रुपए का भुगतान बकाया है। जून-जुलाई के बिल अगस्त में दिए थे और अगस्त के सितंबर में दिए थे। पिछला भुगतान नहीं हुआ इसलिए सितंबर के बिल नहीं दिए हैं। राेज टिपर चलाने के लिए डीजल और मेंटेनेंस लिए भी रकम चाहिए। - अनुराग शर्मा, ठेकेदार
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