कोरोना महामारी में अभी मास्क ही वैक्सीन है, लेकिन एक छोटी सी लापरवाही भारी पड़ सकती है। इस्तेमाल किए मास्क का प्रोपर तरीके से डिस्पोज नहीं करने से संक्रमण फैल सकता है और पर्यावरण को भी खतरा है। कोरोनाकाल में देखा जा रहा है कि सुबह-शाम घूमने वाले लोग मास्क, ग्लव्स उतारकर रोड के किनारे, गलियों में, घर के बाहर गार्डन में, खाली पड़े प्लाट, डस्टबिन के अंदर की बजाय आसपास फेंक रहे हैं, जो गलत है। ऐसा करके हम खुद को बचा नहीं रहे है, बल्कि दूसरों की जिन्दगी को भी मुश्किल में डालने का काम कर रहे हैं।
ये कचरा नहीं, बीमारी है
आम लोगों के अलावा कोरोना वायरस के इलाज, जांच और संदिग्ध व संक्रमित लोगों को क्वाॅरेंटाइन के दौरान अनेक चीजों का इस्तेमाल होता है। इनमें ज्यादातर इस्तेमाल के बाद मेडिकल वेस्ट कहलाती हैं। देश के हर राज्य से रोजाना औसतन 1.5 से 2 टन कोविड-19 वेस्ट निकल रहा है। राजस्थान में भी यही हाल है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कोविड संबंधी मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के निर्देश दिए हैं।
नेशनल डिजीज कंट्रोल सेन्टर ने आइसोलेशन वार्ड, कलेक्शनसेन्टर्स, टेस्टिंग लैब के लिए अलग-अलग रंग के और डबल-लेयर्ड बैग या डिब्बे रखे जाने चाहिए। साथ ही उन डिब्बों पर हर कचरे से संबंधित लेबल लगाना अनिवार्य है।
कोई भी फेंके तो टोकिए : हैल्थ केयर सिस्टम से संबंधित सभी विभागों को बायोमेडिकल वेस्ट पीले बैग में इकट्ठा करना होगा। बाद में उसे बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसेलिटी में भेजना होगा। होम क्वॉरेंटाइन किए गए लोगों को भी बायोमेडिकल वेस्ट अलग करके पीले बैग में रखना है।
स्थानीय प्रशासन की ओर से तैनात किए गए वेस्ट कलेक्शन स्टाफ को ये पीला बैग देना है। ...लेकिन देखने में आ रहा है कि ऐसा कुछ हो नहीं रहा। सड़कों के किनारे कचरे के ढेर में मास्क, ग्लव्स पड़े नजर आते हैं। होम क्वॉरेंटाइन लोगों के मेडिकल वेस्ट निस्तारण की कोई निगरानी नहीं। इसलिए जब भी आप किसी को मास्क या अन्य मेडिकल वेस्ट फेंकते देखें तो टोकें जरूर।
एक्सपर्ट पैनल; एसएमएस अस्पताल के अतिरिक्त अधीक्षक एवं आरयूएचएस के कोविड प्रभारी डॉ.अजीत सिंह, एसएमएस के पूर्व अधीक्षक व अस्थमा रोग विशेषज्ञ डॉ.वीरेन्द्र सिंह तथा रुक्मणि बिरला हॉस्पिटल के मेडिसन विभाग के निदेशक डॉ.सुशील कालरा
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