हाईकोर्ट ने गृह निर्माण सहकारी समितियों के भूखंडों व जमीनाें में होने वाली धोखाधड़ी को रोकने के लिए जेडीए को कहा है कि वह ऐसा मैकेनिज्म या वेबसाइट डवलप करे जिससे कि भूखंड खरीदने के समय ही लोगों को वैधता की पूरी जानकारी मिल सके। कोर्ट ने कहा- कोई जीवनभर की कमाई से जमीन खरीदता है, उसे बाद में पता चलता है कि जो जमीन खरीदी वह या तो सरकारी है या उसके कई पट्टे हैं।
इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए जेडीए कोई प्रभावी मैकेनिज्म बनाए और इस पर होमवर्क करे। वहींं अदालत ने कहा कि पुलिस, जेडीए, नगर निगम, सहकारिता व पंजीयक विभागों में भी आपस में समन्वय होना चाहिए। सीजे इन्द्रजीत महान्ति व जस्टिस प्रकाश गुप्ता की खंडपीठ ने यह मौखिक टिप्पणी गृह निर्माण सहकारी समितियों में जमीनों से जुड़े धोखाधड़ी के मामलों में लिए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान मामले में बुधवार को सुनवाई करते हुए की।
कमिश्नर से पूछा- धोखाधड़ी केस की जांच जल्दी क्यों नहीं?
जयपुर पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव कोर्ट में उपस्थित हुए। अदालत ने उनसे पूछा कि जमीन सौदों में धोखाधड़ी से जुड़े केसों में जल्द सुनवाई क्यों नहीं होती है। जिस पर पुलिस कमिश्नर ने कहा कि सिविल केस चल रहे होते हैं। इस पर कोर्ट ने उनसे पूछा कि क्या सिविल केसों में पुलिस कार्रवाई रोकने के लिए स्टे है, तो पुलिस कमिश्नर ने मना कर दिया। जिस पर कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को कहा कि वे केवल सिविल दावा दायर होने के आधार पर ही अपनी आपराधिक कार्रवाई को नहीं रोकें जब तक कि कोर्ट का रोक आदेश नहीं हो। ऐसे में पुलिस को मामले में जल्दी अनुसंधान पूरा करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र अनूप ढंड़ ने कहा कि पुलिस मामले में निष्पक्ष जांच नहीं कर रही। दूसरी ओर एक पक्षकार के अधिवक्ता विमल चौधरी ने कहा कि जेडीए ने 27 जुलाई 1996 के परिपत्र से गृह निर्माण सोसाटियों को भूखंड बेचान पर रोक लगा रखी है। सोसायटी के अधिकतम सौ सदस्य ही हो सकते हैं और 31 मई 1994 के बाद जमीन का कोई भी हस्तांतरण केवल जेडीए द्वारा ही किया जाएगा। अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले की आगामी सुनवाई 22 सितंबर को तय की।
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