पल्लेदारी करते हुए समाज बदलने की ठानी, 75 साल पहले 20 बालिकाओं से स्कूल शुरू कर आर्य बन गए नारी शिक्षा के अग्रदूत

(बृजमोहन शर्मा) केडलगंज में पल्लेदारी करते हुए छोटी उम्र का एक युवा समाज काे बदलने केे संकल्प के साथ मेहनत और लगन से काम करता है। पिता का साया सिर पर नहीं है। नाना के साथ रहते हुए आर्य समाज से जुड़ा । इस युवा ने अपने मेहनत में राजर्षि कालेज से बीकाॅम की और इस दाैरान काॅलेज के प्रीमियर भी बने। बाद में एमकाॅम व एलएलबी के साथ इनकम टैक्स में डिप्लाेमा किया। अपना संकल्प पूरा करने के लिए शहर में लड़कियाें की शिक्षा के लिए एक स्कूल खाेला।
1945 में खाेले गई आर्य पुत्री पाठशाला में शुरू में 20 बच्चियाें से इसकी शुरुआत की। अब आर्य कन्या विद्यालय समिति के अंतर्गत वैदिक विद्या मंदिर यानि आर्य कन्या स्कूल के नाम से कार्य करने वाले इस स्कूल की 12 शाखा है। 1945 से अब तक यह स्कूल 50 हजार से अधिक बालिकाओं काे शिक्षित कर शिक्षा की अलख जगा चुका है। नारी शिक्षा की शहर में अलख जगाने वाले यह युवा काेई और नहीं स्वतंत्रता सेनानी स्व. छाेटू सिंह आर्य थे। उनकी पहचान भी लड़कियों की शिक्षा के अग्रदूत नाम से शहर में है। आज उनका जन्मदिन है।
आर्य ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़चढ़ कर भाग लिया। इसके बाद राजनीति में भी सक्रिय रहे। पार्षद बने, विधायक बने। यूआईटी के चेयरमैन बने। आर्य नगर व लाजपत नगर काॅलाेनियाें उन्हीं के चेयरमैन रहते हुए विकसित की गई। कई सामाजिक आंदोलनों में उन्होंने भागीदारी की । शिक्षा के साथ समाजसेवा के क्षेत्र में उनकी विशेष पहचान थी। महात्मा गांधी व आर्य समाज के सिद्धांतों पर चलते हुए इन्होंने समाज सेवा के लिए योगदान किया।
इस तरह संघर्ष में आगे बढ़े
आर्य का जन्म 11 अगस्त 1921 को हुआ। उनके पिता गिरवर मल एवं माता नंदो देवी थी। वे 6 वर्ष के थे। तभी पिता का देहांत हाे गया। नाना महाशय मूलचंद आर्य के सानिध्य में रहकर आर्य समाज एवं आर्य वीर दल में सक्रिय हो गए । आर्य वीर दल में व्यायाम करते हुए वे सशक्त हाे गए कि एक क्विंटल गेहूं की बाेरी काे कंधे पर रखकर सीधे वाहन में पहुंचा देते । मेहनत के साथ पढ़ाई भी जारी रखी।
आज इनके संस्थानों में चार हजार बालिकाएं पढ़ रहीं
शहर में आर्य समाज के प्रचार प्रसार में आर्य के सहयोग से 1945 में आर्य पुत्री पाठशाला खोली। इस स्कूल केे नियमाें और सुरक्षा का असर यह हुआ कि शहर के लाेग अपनी बच्चियों काे पढ़ने भेजने लगे। बालिका शिक्षा काे लाेग बढ़ावा देने लगे । इस स्कूल में बालिका शिक्षा काे इतना बढ़ा मिला कि लाेग अपने बच्चियाें काे यहां पढ़ने भेजना सम्मान का प्रतीक मानते थे।

वर्तमान में 4000 लड़कियां अध्ययनरत हैं । गुरुकुल पद्धति का छात्रावास भी है । 23 फरवरी 2007 को उनका देहांत हुआ पर इससे पहले उन्होंने जीवन के वे लक्ष्य प्राप्त किए जिनका उन्होंने संकल्प लिया। वर्तमान में उनके पुत्र अशाेक आर्य व प्रदीप कुमार आर्य इस कार्य को आगे बढ़ा रहे है।

स्वतंत्रता आंदाेलन में भागीदारी
1939 में मास्टर भोलेनाथ के संपर्क में आए एवं प्रजामंडल में सक्रिय हो गए । 9 अगस्त 1942 में “अगस्त क्रांति” में आर्य की तोड़फोड़, डाकखाने को जलाने , तार घर के तार काटने , कंपनी बाग में गणगौर की सवारी में रखी फर्राश खाने की दरी में आग लगाने आदि में भूमिका रही। 1945 से 1947 तक स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के आह्वान पर पढ़ाई छोड़ दी । हरिजन सेवा संघ के अध्यक्ष बनने पर सुगना बाई की धर्मशाला के पास राम लक्ष्मण मंदिर में अन्नकूट का आयोजन किया।

हजारों हरिजन एवं शहर के नागरिक शामिल हुए। 1946 को “गैर जिम्मेदार मिनिस्ट्रो कुर्सी छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका रही। आर्य 1945 एवं 1950 में छात्र जीवन में ही म्युनिसिपल कमेटी के सदस्य बने। 1952 से 1962 तक अलवर शहर से विधायक, 1967 से 1970 तक यूआईटी के चेयरमैन रहे। आर्य के बड़े भाई रामजी लाल आर्य भी नगर परिषद के 7 वर्षों तक चेयरमैन रहे ।



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