प्रदेश में चल रहे सियासी संकट पर एक्सपर्ट की राय, राजस्थान कांग्रेस में विचारधारा की जगह अन्तर्कलह का तांडव

राजस्थान सामन्ती पृष्ठभूमि का प्रदेश रहा है। हालांकि आजादी के बाद सामन्तों के प्रभुत्व की पार्टियों और स्वतन्त्र पार्टियों का उदय और अस्त अल्पकालिक था। पंचायती राज में सत्ता के विकेन्द्रीकरण का श्रीगणेश 2 अक्टूबर, 1959 कोे तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू ने नागौर में किया था।

संसदीय प्रजातन्त्र में राजनीतिक दलों में विवादों, शिकायतों और दुविधाओं का हल संवाद और नेतृत्व के निर्देशन के अनुसार दायरे में रहकर ही ढूंढ़ना पड़ता है। राजस्थान इस परम्परा का अनुकरणीय प्रदेश रहा है। 1954 में जयनारायण व्यास को 38 वर्षीय मोहन लाल सुखाड़िया ने चुनौती दी। बहुमत सुखाड़िया के साथ था और व्यास सीएम पद से त्यागपत्र देकर तांगे में सामान रखकर घर रवाना हो गए। सुखाड़िया ने इसके बाद उनके घर जाकर आशीर्वाद लिया।

कुम्भाराम आर्य ने मोहनलाल सुखाड़िया का पार्टी में विरोध किया और बहुमत के आधार पर आर्य नेे सुखाड़िया का नेतृत्व स्वीकार किया। हरिदेव जोशी के विरुद्ध राम निवास मिर्धा ने हार स्वीकार की। कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा भी बरकततुल्ला खान, जगन्नाथ पहाडि़या, शिवचरण माथुर सरीके को मुख्यमंत्री बनाया और विधायक दल ने उन्हें स्वीकार भी किया। सचिन पायलट को 2014 में राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस को सफलता मिली।

अशोक गहलोत सीएम व पायलट डिप्टी सीएम बने। पायलट ने विधायक दल में समस्याओं को रखकर गहलोत के नेतृत्व को चुनौती नहीं दी। कई बार पायलट ने सरकार के निर्णयों की आलोचना भी की। नेतृत्व ने इसे संसदीय परम्परा के अनुरूप नहीं समझा। फिर पायलट और उनके साथ अन्य 19 विधायकों ने गहलोत के नेतृत्व को चुनौती दी।

तीन दिन तक राजनीतिक घमासान चला। पायलट समर्थक मानेसर में होटल में बाड़ाबंदी कर रखी है। दो बार विधायक दल की औपचारिक मीटिंग हुई। पायलट और उनके साथियों को मीटिंग में अपनी बात रखने के लिये कहा गया। लेकिन उन्होंने इसे नकार दिया।

तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो अशोक गहलोत और सचिन पायलट अलग प्रकार के व्यक्तित्व हैं। लोकसभा चुनाव के लिये सचिन के पिता राजेश पायलट को राजीव गांधी ने स्थापित किया। 36 वर्ष की आयु में सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। फिर 2018 में डिप्टी सीएम।

सीएम बनने की आकांक्षा स्वाभाविक है परन्तु इस तरह का मोलतोल बाजार में हो सकता है, राजनीति या सामाजिक सन्दर्भों में नहीं। गहलोत ने विद्यार्थी जीवन से राजनीति में पैर रखा। तीसरी बार सीएम बने। गांधीवादी, स्वदेशी और ईमानदार नेता की छवि है।

राजनीति में गहलोत एक प्रकार से कांग्रेसी परम्परा के पोषक हैं। विधायक दल की बैठकें आहूत कर नेतृत्व के मुद्दे पर विचार किया गया। पायलट व समर्थकों द्वारा बैठकों का बहिष्कार करना उस परम्परा का अपमान है, जो जयनारायण व्यास, रामनिवास मिर्धा, और अन्य प्रतिस्पर्धियों ने स्थापित की थी।

बीजेपी की भूमिका की इस पूरे घटनाक्रम में भी चर्चा रही है। गहलोत व उनके साथियों ने बीजेपी पर आरोप लगाया है कि खरीद-फरोख्त द्वारा चुनी हुई सरकार को अस्थिर किया जा रहा है। इसमे शासकीय एजेंसियों द्वारा जांच भी करवाई जा रही है। बीजेपी ने आईटी द्वारा 40 प्रतिष्ठानों पर छापामारी की है। इनके मालिक गहलोत के हमदर्द माने जाते हैं।

बड़ा सवाल क्या सचिन पायलट सीएम बन पाएंगे? 14 जुलाई की बैठक में पायलट को उपमुख्यमंत्री व अध्यक्ष पद से मुक्ति दे दी गई है। पायलट समर्थक मंत्रियों को भी हटा दिया गया है। राजस्थान मे ऐसी परिस्थिति से होने वाले परिणामों का मूल्यांकन आवश्यक है। यह कैसी राजनीति है? विचारधारा का स्थान क्यों नहीं दिखता? क्या ऐसी स्थिति दक्षिणपंथी विचारधारा को बदलेगी? जातिवाद की भूमिका को भी देखना होगा।



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लेखक प्रो-चांसलर, जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी और पूर्व कुलपति, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर हैं।


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