प्रदेश की कांग्रेस सरकार इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। बीकानेर निगम की कमेटियों पर हाईकोर्ट की रोक लगने से सियासत एक बार फिर कठघरे में है।स्वायत शासन विभाग ने 30 जून को बीकानेर नगर निगम की कार्य संचालन कमेटियों की घोषणा की थी।
मेयर सुशीला कंवर राजपुरोहित ने विभाग के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती देते विभाग के फैसले को अविवेकपूर्ण बताया था। बहस के बाद हाईकोर्ट ने विभाग के आदेश पर रोक लगाते हुए प्रिंसिपल सेक्रेटरी, निदेशक और निगम कमिश्नर को नोटिस जारी कर 10 अगस्त तक जवाब मांगा है।
हाईकोर्ट में मेयर का पक्ष रखते हुए उनके वकील श्याम लदरेचा ने कहा, बीकानेर नगर निगम ने 90 दिन में कमेटियों का गठन करके सूचना कमिश्नर के मार्फत राज्य सरकार को प्रेषित की थी। परंतु राज्य सरकार के अधिकारी उस पर कुंडली मारकर बैठ गए। इस पर कार्रवाई करने के बजाय स्वयं की कमेटियों का गठन कर दिया।
उन कमेटियों में 90 पर्सेंट से अधिक कांग्रेस के सदस्य शामिल किए, जबकि बीकानेर निगम में बोर्ड भाजपा का है। उसके बाद विभाग ने प्रदेश के निकायों को एक आदेश भेजकर कमेटियों के गठन के प्रस्ताव मांगे। यह आदेश बीकानेर निगम को नहीं भेजा। क्योंकि, बीकानेर के प्रस्ताव पहले से ही विभाग में लंबित थे।
एडवोकेट लदरेचा ने कहा कि म्युनिसिपल एक्ट में प्रावधान है कि कोई भी सरकार कमेटियों का गठन अपने स्तर पर नहीं कर सकती। प्रस्ताव नगर निगम से ही मंगवाने होंगे। सरकार केवल अनुमोदन करती है। कमिश्नर को कोई ऐतराज है तो वह नोट ऑफ डिसेंट लगाकर वापस मेयर को भेजता है। ताकि मेयर उस एतराज को दूर करे। लेकिन कमिश्नर ने ऐसा करने के बजाय सरकार से मार्ग दर्शन मांग लिया। अधिवक्ता ने कहा, डिसेंट नोट पर सरकार को 30 दिन में निर्णय लेना होता है। अन्यथा वह पारित माना जाता है।
पुरानी कमेटियां एक बार वापस अस्तित्व में आईं
स्वायत्त शासन विभाग की ओर से घोषित कमेटियों पर रोक लगने के बाद पुरानी कमेटियां एक बारगी अस्तित्व में आ गई है। हालांकि कानूनी लड़ाई अभी बाकी है और अंतिम फैसला कोर्ट का ही मान्य होगा। विधि विशेषज्ञों के अनुसार निगम की 7 फरवरी की साधारण सभा की प्रोसिडिंग कमिश्नर को समय पर जारी करनी थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
कांग्रेसी पार्षदों की मांग पर राज्य सरकार से मार्गदर्शन मांग लिया। नोट ऑफ डिसेंट तक नहीं लगाया। विधिवेत्ताओं के अनुसार, सरकार यदि ऐसे मामलों में 30 दिन में कोई निर्देश नहीं दे तो प्रस्ताव मंजूर माने जाते हैं। सरकार ने करीब 180 दिन बाद नई कमेटियां बना दी, लेकिन निगम की कमेटी को लेकर कोई फैसला नही किया।
इधर, भाजपा पार्षदों में खुशी
स्वायत्त शासन विभाग की ओर से गठित कमेटियों पर हाईकोर्ट की रोक पर भाजपा पार्षदों में प्रसन्नता है। उप महापौर राजेन्द्र पंवार, पुनीत शर्मा, प्रदीप उपाध्याय ने इसे सत्य की जीत बताया है। पूर्व महापौर नारायण चौपड़ा ने भी हाईकोर्ट की रोक को सच की जीत बताई। भाजपा नेता रवि शेखर मेघवाल ने कहा कि सरकार ने लोकतंत्र की हत्या की थी। हाईकोर्ट ने स्टे लगाकर सरकार को आइना दिखाया है।
- सरकार ने जो कमेटियां घोषित की थी, उस पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई है। मेयर का प्रस्ताव कायम है। सरकार ने उस पर कोई फैसला नहीं दिया। क्योंकि कमिश्नर ने उस पर नोट ऑफ डिसेंट नहीं भेजा था। मेयर की कमेटियां वापस अस्तित्व में आ गई हैं। सरकार का आदेश ही गलत था। -आरके दास गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता
- कमेटियों को लेकर स्वायत्त शासन विभाग ने फैसला कमिश्नर की रिपोर्ट पर ही किया था। हाईकोर्ट में अभी सरकार का पक्ष बाकी है। अदालत का फैसला शिरोधार्य है। -जावेद पड़िहार, पूर्व नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेसी पार्षद
- तत्कालीन डीएलबी डायरेक्टर उज्ज्वल राठौड़ द्वारा राज्य सरकार के दबाव में लिए गए असंवैधानिक एवं षडयंत्रकारी फैसले का यह करारा जवाब है। हमने कानूनी रूप से माननीय उच्च न्यायालय में अपनी बात रखी। उच्च न्यायालय ने संज्ञान लेते हुए इस असंवैधानिक आदेश पर रोक लगा दी है। यह सत्य की जीत है। बीकानेर की 8 लाख जनता द्वारा चुनी गई सरकार की जीत है। -सुशीला कंवर राजपुरोहित, मेयर
3 बिंदुओं में समझें पूरा मामला
1. निकायों को चलाने के लिए कार्य संचालन कमेटियों की व्यवस्था क़ानून में दी हुई है। निगम का नवगठित बोर्ड इनका निर्माण करता है। बीकानेर के भाजपा बोर्ड ने 7 फरवरी की साधारण सभा मे 17 कमेटियों का गठन किया था। कांग्रेस पार्षदों के हंगामे के बीच महापौर उनका वाचन नहीं कर सकी और 8 मिनट में सभी प्रस्ताव पारित करने की घोषणा करके सभा समाप्त कर दी।
2. कांग्रेसी पार्षदों के एतराज पर 10 दिन बाद तत्कालीन कमिश्नर ने राज्य सरकार को मार्गदर्शन के लिए लिखा। स्वायत्त शासन विभाग ने एक माह तक कोई निर्णय नहीं किया। मेयर ने पत्र भी लिखे। बाद में मेयर ने कमेटियों के गठन का आदेश स्वंय के हस्ताक्षर से जारी कर दिया।
3. स्वायत्त शासन विभाग ने 17 कमेटियों का गठन किया। खास बात यह रही कि इन कमेटियों में सभी अध्यक्ष तो कांग्रेसी पार्षद थे ही 90 फीसदी से अधिक सदस्य भी कांग्रेसी पार्षद बना दिये। एक, दो कमेटियों में जो पार्षद अध्यक्ष था वही मेम्बर भी था। निगम के इतिहास में यह राजनीतिक घटनाक्रम पहली बार घटा।
जनपीड़ा...कमेटियों की राजनीति, विकास गौण
नगर निगम में बीजेपी बोर्ड का गठन हुए छह माह हो गए। कार्य संचालन कमेटियां ही अब तक विवाद में पड़ी हैं। महापौर, कमिश्नर और कांग्रेसी पार्षदों की लड़ाई में शहर का विकास गौण हो गया है। निर्माण कार्यों के टेंडर नहीं लग पा रहे। भाजपा और कांग्रेसी पार्षदों के बीच ही गुटीय राजनीति हावी है। ऐसे में कोई काम नहीं हो पा रहा है। भ्रष्टाचार चरम पर है। हाल ही में भवन निर्माण स्वीकृति के एक मामले में डीलिंग क्लर्क ट्रैप हो चुका है।
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